breaking news New

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - कैसे तोड़ी जाएगी कोरोना संक्रमण की चैन

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - कैसे तोड़ी जाएगी कोरोना संक्रमण की चैन

-सुभाष मिश्र
वैश्विक महामारी कोरोना ने अपने बदलते चरित्र के साथ पूरी दुनिया में अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है। चीन के बुहान शहर से शुरू हुई इसकी यात्रा अनवरत जारी है। देशों की सीमाओं को सील करके, देश के भीतर लॉकडाउन करके लोगों को कितने लंबे समय तक घरों के भीतर बिठाया जा सकेगा? जो जहर हवाओं में घुलने लगा है, वो भला कैसे रूकेगा। पूरी दुनिया के लोगों का टीकाकरण करके ही उसमें इस वायरस से लडऩे की क्षमता विकसित करनी होगी। वर्तमान में हमारे अपने देश में टीकाकरण के जो मौजूदा हालात हैं, उसमें हमें ढाई से तीन साल लग सकते हैं। देश की वर्तमान आबादी एक अरब 40 करोड़ है जिसमें से अभी तक 114 दिन में 17 करोड़ लोगों को ही टीका लगा है।

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने पिछले दिनों कोरोना वैक्सीन के निर्माण और बौद्धिक संपदा (कापीराईट) संबंधी फार्मूले को सभी देशों के बीच शेयर करने का सुझाव किया था। उन्होंने कहा है कि हमारा बौद्धिक संपदा सुरक्षा में दृढ़ विश्वास है लेकिन इस महामारी को समाप्त करने हम दृढ़ का समर्थन करते हैं। फाइजर और माडर्ना जैसी विश्व प्रसिद्ध कंपनियां अपना फार्मूला शेयर नहीं करना चाहती। वह 34 मिलियन खुराक दान करना चाहती हैं। फाइजर भारत को 70 लाख मिलियन डालर से अधिक कोरोना वायरस उपचार दान कर रहा है।  

कोरोना वैक्सीनेशन को बढ़ाने के लिए क्रांतिकारी नीतिगत बदलाव की जरूरत है। पूरी दुनिया की आबादी 750 करोड़ के आसपास है और अभी तक कुल 117 करोड़ लोगों का पहला टीकाकरण हुआ है। दूसरे डोज की गति धीमी है। दुनिया में 13 कंपनी वैक्सीन बना रही हैं और उन्हें निर्माण व उपयोग की मंजूरी मिल चुकी है। बौद्धिक संपदा कानून के अनुसार पेटेंट की व्यवस्था लागू है जिसके चलते आज केवल ये कंपनी अपने सीमित संसाधनों से ही वैक्सीन का निर्माण कर पाएंगी। जब तक वैश्विक रूप से पेटेंट का त्याग विश्व कोरोना महामारी समाप्त करना वैक्सीनेशन को तुरंत बढ़ाने के लिए फौरन क्रांतिकारी कदम नहीं उठाए जाएंगे तब तक रास्ता नहीं निकलेगा।

इस विश्व महामारी को नियंत्रण करने के लिए जरूरी है कि कोरोना की वैक्सीन को संपूर्ण विश्व में पेटेंट के दायरे में बाहर कर दिया जाए और राष्ट्रीय अंतराष्ट्रीय व्यवस्था में बदलाव लाया जाए। कानूनों में संशोधन के लिए अध्यादेश लाए जाए। वैसे अध्यादेश लाने के मामले में तो हम विश्वगुरु कहलाने लायक हंै। हमने तमाम विरोध के बावजूद कोरोना की परवाह नहीं करते हुए भी बहुत से अध्यादेश लाए हैं।

यदि पेटेंट हटाने में अड़चनें हो तो कम से कम वर्तमान निर्माता कंपनियों से अन्य उत्पादकों को ब्रांड नेम की फ्रेंचाईजी दिलवाने की व्यवस्था बनाई जा सकती है। याने कोविशील्ड या कोवैक्सीन का नाम नहीं बदला जाएगा केवल निर्माता का नाम बदला जाएगा।  

अमीर देशों में बची अतिरिक्त वैक्सीन को तत्काल अधिक संक्रमित देशों में पहुंचाने की व्यवस्था की जाए। अमेरिका में कोविशील्ड की 6 करोड़ खुराक रखी है, उसे हासिल किया जाए। जो वैक्सीन निर्माता अभी निर्माण प्रक्रिया के अंतिम चरण में हैं उन्हें फास्ट ट्रैक पर लाया जाए और अविलंब उनकी वैक्सीन मार्केट में उतारी जाए। ऐसी विदेशी वैक्सीन जो कि महंगी हो उसे प्राइवेट अस्पतालों को निर्बाध रूप से आयात कर सशुल्क लगाने की अनुमति दी जाए। इससे समर्थ व्यक्ति इन्हें ले भी सकेंगे और सरकारी टीकाकरण व्यवस्था पर दबाव कम होगा।

बच्चों के पृथक व सुरक्षित टीकाकरण को तत्काल आरंभ करें अन्यथा वायरस का अगला शिकार बच्चे बड़ी तेजी से हो सकते हैं। टीकाकरण जितना जरूरी है उससे ज्यादा जरूरी है तेजी से लगना, वरना कहीं ऐसा वेरिएंट ना आ जाए जो कि टीके से भी बेअसर न हो और तांडव मचा दे। वैसे भी अभी जो टीके लग रहे हैं उसकी इम्युनिटी की क्षमता एक साल बढ़ाई गई है। ऐसे में अगले साल फिर उतनी ही जनसंख्या टीकाकरण के लिए तैयार हो जायेगी।
एक भी कोरोना का मरीज अगर दुनिया में छूट गया तो समझो सुरक्षा चक्र टूट गया।  

वैक्सीन बनाने की दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया की सांसें भी हमारे अपने देश में वैक्सीन उपलब्ध कराने में फूल रही है। यही हाल भारत बायोटेक का भी है। पूरे देश में टीकाकरण के लिए सुबह से लगी लंबी-लंबी लाईनें इस बात का गवाह है कि मांग के अनुरूप कोरोना के टीके उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। राज्य सरकारें छोटे बच्चे की तरह केंद्र से टीके दिलाने की जिद कर रही है और केंद्र के लिए अभी ये काम आसमंा से चांद तारे तोड़ लाने जैसे हो गया है। समय रहते वैक्सीन बनाने का आर्डर नहीं देकर जो चूक केंद्र सरकार ने की है उसका खामियाजा देश भुगत रहा है। पिछले साल जब अक्टूबर में हमारे देश में पहली बार कोरोना वायरस के लक्षण मिले थे तो डब्ल्यूएचओ ने इसे वैरिएंट ऑफ इंटरेस्ट की श्रेणी में रखा था। अब हमारे देश में कोरोना के वैरिएंट की 1.617 महामारी के रूप में मौजूद है। अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देश हमें वैरिएंट आफ कन्सर्न मान रहे हैं। जो पूल वायरस से ज्यादा खतरनाक संक्रमण होता है। अब एक मई 2021 में 18 से 44 वर्ष आयु समूह के लोगों को टीके लगाए जा रहे हैं जिनकी संख्या 60 करोड़ से अधिक है जो रोज टीके के लिए लाईन में लगकर निराश होकर घर लौट रहे हैं। टीके कब लगेंगे यह बताना फिलहाल किसी के बस की बात नहीं है। लाईनों में लगने का अभ्यास देश की युवा पीढ़ी फिलहाल अपनी जान बचाने के लिए सुबह से जान पर खेलकर लाईन में लग रही है।

टीकों की राजनीति को एक तरफ रखकर पूरी दुनिया को और खासकर हमारे अपने देश को जमीनी सच्चाई समझकर टीकाकरण का एक ऐसा कार्यक्रम बनाने की जरूरत है जो देश के नागरिकों के गिरते हुए आत्मविश्वास को वापस लाकर पूरी दुनिया के सामने आज जो हमारी बदनामी हो रही है, उसे रोककर नागरिक जीवन को सुरक्षित कर सके। विश्व गुरू बनने की चाहत बुरी नहीं दे पर उसके लिए वैसा रोल भी तो प्ले करना पड़ेगा।