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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - ब्राह्मणों को रिझाने की कोशिश

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - ब्राह्मणों को रिझाने की कोशिश

-सुभाष मिश्र
हमारे देश की जातिगत व्यवस्था में अपने ज्ञान, कर्म और पूजा पाठ और ईश्वर के प्रतिनिधि के रुप में ब्राह्मण को श्रेष्ठ समझा जाता रहा है। किसी समय काम के आदार पर बनाई गई जाति व्यवस्था कब धीरे-धीरे, ऊंच-नीच में बदल गई, यह पता हीं नहीं चला। वोट की राजनीति ने मनुष्य को धर्म, जाति में तब्दील कर दिया। चुनाव के दौरान सीटों के बंटवारे में जाति, धर्म अब सबसे महत्वपूर्ण फैक्टर बन गया है। उत्तरप्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर जातिगत समीकरण बिठाए जाने लगे हैं। केन्द्रीय मंत्रिमंडल के हालिया विस्तार में भी क्षेत्रीय संतुलन के साथ-साथ जातिगत संतुलन का भी ध्यान रखा गया। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण वोटरों को लुभाने के लिए बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और भाजपा सभी ब्राह्मण सम्मेलन और सम्मान समारोह करते दिख रहे हैं। पूजा-पाठ करके, मंदिरों में पुजारी के रुप में ईश्वर सेवा करने वाले पंडितजी की भी आर्थिक हालत खस्ता है। लॉकडाउन के चलते लंबे समय से बंद मंदिरों के कपाट और भक्तजनों की कम होती संख्या ने कथा-पूजा में लगे पंडितों के सामने भारी संकट खड़ा कर दिया है। मंदिरों के कपाट लम्बे समय से बंद रहने के कारण पुजारियों व सेवादारों के सामने अपने परिवार का पेट पालने का संकट खड़ा हो गया है। छोटे-छोटे मंदिरों के पुजारी और सेवादार वहां आने वाले चढ़ावे पर निर्भर होते हैं। मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार ने इस वित्तीय वर्ष में मठ-मंदिरों और पुजारियों को मानदेय देने के लिए 8 करोड़ रुपये जारी किए हैं।

भारतीय समाज में प्राचीन काल से मौजूद जाति व्यवस्था सामंती संस्कृति के विकास के साथ सुदृढ़ होती गयी थी। लेकिन उसके विरुध्द प्रतिवाद का इतिहास भी पुराना है। भक्ति आंदोलन अपने मूल स्वरूप और अखिल भारतीय विस्तार में सामाजिक समानता का आंदोलन था। संत साहित्य में जाति-आधारित भेदभाव के विरुद्ध तीखी प्रतिक्रिया मिलती है। दक्षिण में बसवन्ना, पश्चिम में महाराष्ट्र के संतों या उत्तर में नाथ-सिद्ध साधकों तथा कबीर की भूमिका पर विचार करें तो यह देख पाना मुश्किल नहीं होगा कि जातिगत विषमता का प्रतिरोध भिन्न-भिन्न कालखण्डों में और अलग-अलग स्तरों पर सतत सक्रिय रहा है। आधुनिक युग में पश्चिमी शिक्षा और उदारवादी विचारों के प्रसार के साथ इसकी तीखी आलोचना शुरू हुई। महात्मा फुले, श्री नारायण गुरु, पेरियार, अम्बेडकर आदि ने निम्न वर्ण के लोगों की जागृति का अभियान छेड़ा। परिणाम स्वरूप राष्ट्रीय जागरण के एजेंडे पर बीसवीं शताब्दी में जाति-उन्मूलन को भी प्रमुखता से रखा गया। सामाजिक अस्पृश्यता के विरुद्ध गाँधीजी के आह्वान को इस संदर्भ में देखा जाना चाहिये।

ज़ाहिर है, बीसवीं शताब्दी में जाति प्रथा को एक सामाजिक बुराई के रूप में देखा जाने लगा। भारतीय संविधान में समतामूलक समाज के जिस आदर्श की कल्पना की गई है, उसकी अवधारणा स्वाधीनता संग्राम के दौर में ही सामने आई थी। लेकिन जातिप्रथा के विरुद्ध व्यापक जागरण के बावजूद उसे समाप्त करने का कार्यभार अब भी अधूरा है। सामाजिक व्यवहार में ऊपरी तौर पर जाति की पकड़ ढीली पड़ी है। फिर भी मानसिकता के स्तर पर उच्चवर्ण का एक हिस्सा अब भी उच्चता ग्रन्थि से ग्रस्त है और वर्णक्रम में नीचे के पायदान की जातियों को हेय दृष्टि से देखता है। इधर राजनीतिक कारणों से अस्मिता की उठान के चलते जाति के आधार पर सामुदायिक गोलबंदी की रणनीति अपनाने  के बाद भारत में लोकतंत्र एक प्रतिगामी संस्कृति की गिरफ़्त में आ चुका है। कहने की ज़रूरत नहीं कि जाति के नाम पर वोट माँगना स्वतंत्र भारत की राजनीतिक संस्कृति के भीतर एक परिपाटी बन चुका है या जातिगत संगठनों और खाप पंचायतों की पकड़ लगातार मज़बूत होती जा रही है। इससे हमारे देश के सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर नकारात्मक ढंग से हस्तक्षेप किया है। अस्मिता की राजनीति सिफऱ् बौद्धिक विमर्श के क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गयी है। सामाजिक इंजीनियरिंग के रूप में अब वह हमारे राजनीतिक व्यवहार को नियंत्रित करने लगी है। इससे बनने वाली मानसिकता यदि आरक्षण-विरोध को स्वर्ण वर्ग के हाथों में निम्नवर्गीय जनता के खिलाफ एक हथियार के रूप में थमा देती है तो इसमें अचरज नहीं होना चाहिये। ज़ाहिर है, क्षुद्र राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए अस्मिता को औज़ार बनाने का सबसे बड़ा खतरा यही दिखाई देता है कि इससे सामाजिक विद्वेष बढ़ता जा रहा है। अजीब है कि आरक्षण का विरोध करने वाली मानसिकता ने किसी भी सूरत में सत्ता से सबको रोजग़ार मुहैया करने की मांग कभी नहीं की। क्या आरक्षण माँगने की बजाए रोजग़ार नहीं माँगा जाना चाहिए? रोजग़ार देने में अक्षम सरकार ही अपनी कमज़ोरी छिपाने की ख़ातिर देश की बढ़ती हुई जनसँख्या को बोझ मानने लगी है, जबकि अब तक वह देश कि युवा आबादी को वरदान कहकर गौरवान्वित करती थकती नहीं थी।

कहना ज़रूरी है कि जाति उन्मूलन के कार्यभार को भारतीय राजनीति भुला चुकी है। वह जाति को राजनीतिक लामबंदी के अमोघ हथियार में तब्दील कर तात्कालिक लाभ भले हासिल कर ले, देश के दीर्घकालिक हितों की पूर्ति और समतामूलक समाज का लक्ष्य दूर खिसकता चला जाएगा। भारतीय संविधान में वर्णित सामाजिक न्याय की अवधारणा जाति-उन्मूलन से चरितार्थ होगी। इसे याद रखना ज़रूरी है।
बसपा प्रमुख मायावती ने खुलकर ब्राह्मणों से साथ देने की अपील की है। ब्राह्मणों का साथ मिलने से 2007 में सत्ता हासिल कर चुकीं मायावती ने एक बार फिर ब्राह्मणों से अपील कर भाजपा की परेशानी बढ़ा दी है क्योंकि राज्य में करीब 15 फीसदी ब्राह्मण हैं। प्रदेश के करीब 18 से 20 जिले ऐसे हैं, जहां 20 प्रतिशत या उससे अधिक ब्राह्मणों की आबादी है। गोरखपुर, गोंडा, बलरामपुर, बस्ती, अयोध्या, संत कबीर नगर, देवरिया, जौनपुर, अमेठी, रायबरेली, वाराणसी, कानपुर, प्रयागराज, उन्नाव, कन्नौज, भदोही, झांसी, मथुरा, चंदौली जिलों में ब्राह्मणों की संख्या अच्छी है। बसपा ने सोशल इंजीनियरिंग करके ब्राह्मणों को साथ लिया। बसपा ने सतीश चंद्र मिश्र की अगुआई में ब्राह्मण सम्मेलन किया और 86 ब्राह्मण चेहरों को टिकट दिया। जिससे ब्राह्मण बसपा के साथ चले गए और मायावती की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी। इस चुनाव में ब्राह्मण बड़ी संख्या में विधायक चुने गए। पिछले विधानसभा चुनाव में यूपी में 56 ब्राह्मण चेहरे विधायक चुने गए थे, जिसमें से 44 भाजपा के थे।  

बसपा के अलावा सपा और कांग्रेस भी ब्राह्मणों को लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने जनेऊ धारण किया है और अब उनके दौरों में मंदिरों में जाने का कार्यक्रम शामिल होता है। कांग्रेस की तरफ से यूपी की कमान संभाल रहीं प्रियंका गांधी भारतीय पोशाक में ज्यादा दिखती हैं। गले में रुद्राक्ष की माला भी धारण करती है। ब्राह्मणों को रिझाने के लिए यूपी की सियासत में होड़ पिछले साल ही शुरू हो गई थी, जब समाजवादी पार्टी ने सत्ता में आने पर सूबे में परशुराम की मूर्ति लगाने का वादा किया।

1990 के दशक में, भाजपा, जिसे उच्च जातियों की पार्टी कहा जाता था, ने उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह, मध्य प्रदेश में उमा भारती और गुजरात में नरेंद्र मोदी जैसे पार्टी में पिछड़ी जाति के नेताओं के उत्थान की प्रक्रिया शुरू की। भाजपा विचारक के. गोविंदाचार्य ने इस आंदोलन को भाजपा के सोशल इंजीनियरिंग के प्रयास के रूप में परिभाषित किया। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा के अभूतपूर्व उदय के दूसरे चरण में, पार्टी का सोशल इंजीनियरिंग प्रयोग अब तक कम प्रभावशाली जातियों और उप-जातियों की भागीदारी पर टिका है, जिससे भारत में जाति की राजनीति के पारंपरिक चिकित्सकों को पीछे छोड़ दिया गया है।  

जाति आधारित आरक्षण भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 के साथ आया जो धर्म, जाति, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भारतीयों के साथ भेदभाव को रोकता है। लेकिन अनुच्छेद 15 (4) में यह कहते हुए संशोधन किया गया है कि इस अनुच्छेद में कुछ भी राज्य को किसी भी सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े नागरिकों या एससी और एसटी की उन्नति के लिए कोई विशेष प्रावधान करने से नहीं रोकेगा। इस प्रकार संविधान एक साथ समानता की दो परस्पर विरोधी धारणाओं का प्रतीक है, एक व्यक्तिगत अधिकारों पर आधारित है और दूसरा समूह अधिकारों पर आधारित है। इसके अलावा मंडल आयोग या सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा वर्ग आयोग की स्थापना 1979 में जनता पार्टी सरकार द्वारा प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई के तहत भारत के सामाजिक या शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान करने के लिए की गई थी। यह मूल रूप से जाति के संदर्भ में पिछड़े वर्गों को परिभाषित करता है। व्यक्तिगत वर्ग विशेषताओं के बजाय जाति सदस्यता महत्व का विषय बन गई। इस प्रकार औसत प्रति व्यक्ति आय के बजाय वर्ग में निम्न सामाजिक रैंकिंग ओबीसी सूची में शामिल होने का मानदंड बन गई। इस प्रकार इसने जाति सदस्यता के लिए वर्ग लाभों की पहचान के लिए जिम्मेदार बनना संभव बना दिया, इस प्रकार सामाजिक रैंकिंग औसत प्रति व्यक्ति आय के बजाय धारणा का विषय बन गई। इस प्रकार जाति और वर्ग क्रॉस कटिंग पहचान बन गए।

मायरोन वेनर ने कहा है कि रूढि़वादिता अभी भी जारी है, हालांकि जाति के वैचारिक आधार को कमजोर कर दिया गया है। फिर भी जाति सामाजिक परिवर्तन का एक साधन बन गई जिसके परिणाम स्वरूप जातिवाद का उदय हुआ, पहले से बहिष्कृत समूहों का सह-चयन भी हुआ और इस राजनीतिक लामबंदी ने गंन्दी पहचान की राजनीति को जन्म दिया।