संपादकीय : प.दीनदयाल के विचारों को भाजपा ने कितना आगे बढ़ाया! अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पार्टी उन्हें क्यों भूल जाती है!

संपादकीय : प.दीनदयाल के विचारों को भाजपा ने कितना आगे बढ़ाया! अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पार्टी उन्हें क्यों भूल जाती है!
इस देश में पूरी तरह भाजपा की सरकार तीन बार ​बनी. एक स्व.अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व में और दो बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में. लेकिन आप दोनों प्रधानमंत्रियों के उन भाषणों का अवलोकन कीजिए जो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उन्होंने दिए. आपको निराशा हाथ लगेगी. चाहे बाजपेयी रहे हों या अब मोदी, दुनियावी मंचों पर प.दीनदयाल को दोनों ने याद नही किया जबकि उपाध्याय ने एकात्म मानववाद दर्शन दिया. फिर वे पार्टी के शिखर पुरूष हैं. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी या सरदार पटेल की तरह पं.दीनदयाल का दर्शन भी दुनिया को पता चलना चाहिए. इसी तरह मुखर्जी जी को भी याद किए जाने की जरूरत है. मुगलसराय स्टेशन पर हुई प.दीनदयाल की हत्या के आरोपी आज त​क नही पकड़े गए क्योंकि इस हत्याकाण्ड की जांच ईमानदारी के साथ नही हो सकी. ना बाजपेयी सरकार में और ना ही अब की मोदी सरकार में.


भारतीय जनसंघ के सह-संस्थापक दीनदयाल उपाध्याय की विचारधारा को केंद्र में सत्ताधारी भाजपा अपना आदर्श बताती है. पार्टी और उसकी सरकारें उनके विचारों को अपनी नीतियों और कार्यक्रमों में शामिल करने की बात भी जोर-शोर से करती रही हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कहते रहे हैं कि केंद्र सरकार पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों पर चलते हुए समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाने का काम कर रही है. लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है?

दीनदयाल उपाध्याय के विचारों को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है. एक हिस्से में वे विचार हैं, जिन पर विवाद की स्थिति है या फिर आम सहमति नहीं है. इसमें धर्म राज्य, सांस्कृतिक सर्वोच्चता, राष्ट्रवाद और अखंड भारत जैसे विचार आते हैं. दूसरे हिस्से में वे विचार हैं जो सहज स्वीकार्य हैं, जिनका आधार व्यापक जनहित है. दूसरे हिस्से के विचारों के मामले में दीनदयाल उपाध्याय को महात्मा गांधी और राम मनोहर लोहिया की धारा का विचारक कहा जाता है. इनमें राजनीतिक शुचिता, भाषायी स्वराज, अर्थव्यवस्था, नियोजन, श्रमिक कल्याण, मशीनीकरण जैसे विषय शामिल हैं. इन्हीं मुद्दों पर वे तत्कालीन नेहरू सरकार की सख्त आलोचना करते थे.

केंद्र या राज्यों में सत्तासीन भाजपा सरकारों के फैसलों को देखें तो पता चलता है कि उन्होंने आर्थिक सुधारों के नाम पर सबसे पहले श्रमिक हितों पर चोट करने का ही काम किया है. अब सवाल उठता है कि अगर वे आज होते तो केंद्र सरकार को लेकर क्या सोच रहे होते. यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है कि क्योंकि इन मुद्दों पर मौजूदा केंद्र सरकार ने पिछली सरकारों की नीतियों को ही आगे बढ़ाया है. कई जानकारों के मुताबिक पंचवर्षीय नियोजन की व्यवस्था को खत्म करने के सिवाय आर्थिक नीतियों में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया है या कहें कि पहले से जारी नीतियों को और तेजी से लागू किया गया है. आलोचकों की मानें तो यह सरकार भी पिछली सरकारों की तरह हर क्षेत्र को पूरी तरह से बाजार के भरोसे छोड़ने की राह पर चल रही है. कुल मिलाकर कहें तो भाजपानीत सरकार की अब तक की आर्थिक-सामाजिक नीतियों और कार्यक्रमों में दीनदयाल उपाध्याय के विचारों की झलक बहुत कम दिखाई देती है.

पंडित दीनदयाल उपाध्याय राजनीति में अवसरवाद के सख्त विरोधी थे. 22 अप्रैल 1965 को मुंबई के अपने भाषण में उन्होंने दलबदलू नेताओं की जमकर आलोचना की थी. उन्होंने कहा था, ‘दुष्ट, दुष्ट ही रहेगा, चाहे पार्टी अच्छी हो या बुरी.’ लेकिन आज उनके विचारों की दुहाई देने वाली भाजपा पर इसका कोई असर नहीं दिखाई देता. आज वह दूसरे दलों नेताओं का स्वागत करने को प्राथमिकता देती है. उसने कांग्रेस मुक्त भारत नारा जरूर दिया् था लेकिन, कांग्रेस या उन दूसरी पार्टी से आने वाले नेताओं को लेकर वह कोई परहेज नहीं दिखाती जिन्हें वह भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा बताती है.

सरकार के स्तर पर लगभग ऐसा ही हाल आर्थिक विचारों को अपनाने का है. दीनदयाल उपाध्याय स्वदेशी समर्थक और मशीनीकरण के विरोधी थे. वे केवल वही मशीनें चाहते थे जो श्रमिकों की सहायता करें, न कि उनका रोजगार छीनें. उपाध्याय व्यापार में एकाधिकार की मुखालफत करते थे और महात्मा गांधी की तर्ज पर ट्रस्टीशिप के सिद्धांत को मानते थे. वे जवाहरलाल नेहरू की केंद्रीकृत नियोजन व्यवस्था के आलोचक थे. उनका मानना था कि इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार नहीं पहुंच पाता. वे कंपनियों में शेयर होल्डर्स की व्यवस्था को गलत मानते थे. उनका तर्क था कि शेयर खरीदने वाला व्यक्ति तो लाभांश और स्वामित्व में हिस्सेदारी पाता है लेकिन उसी संगठन में काम करने वाले मजदूर को कोई अधिकार नहीं मिलता है. वे मजदूरों की स्वामित्व में भागीदारी चाहते थे. उपाध्याय विदेशी सहायता, प्रबंधन, पूंजी और उत्पादन के तौर-तरीके अपनाने के भी विरोधी थे. वे इसे प्रगति और विकास का सही रास्ता नहीं मानते थे. आज केंद्र सरकार इससे काफी हद तक उलट राह पर चलती दिख रही है.

और अब अंतिम बात. इस देश में पूरी तरह भाजपा की सरकार तीन बार ​बनी. एक स्व.अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व में और दो बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में. लेकिन आप दोनों प्रधानमंत्रियों के उन भाषणों का अवलोकन कीजिए जो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उन्होंने दिए. आपको निराशा हाथ लगेगी. चाहे बाजपेयी रहे हों या अब मोदी, दुनियावी मंचों पर प.दीनदयाल को दोनों ने याद नही किया जबकि उपाध्याय ने एकात्म मानववाद दर्शन दिया. फिर वे पार्टी के शिखर पुरूष हैं. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी या सरदार पटेल की तरह पं.दीनदयाल का दर्शन भी दुनिया को पता चलना चाहिए. इसी तरह मुखर्जी जी को भी याद किए जाने की जरूरत है. मुगलसराय स्टेशन पर हुई प.दीनदयाल की हत्या के आरोपी आज त​क नही पकड़े गए क्योंकि इस हत्याकाण्ड की जांच ईमानदारी के साथ नही हो सकी. ना बाजपेयी सरकार में और ना ही अब की मोदी सरकार में.