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ध्रुव शुक्ल की कविताः ऐसे ही यह दुनिया चलती जाती है

ध्रुव शुक्ल की कविताः ऐसे ही यह दुनिया चलती जाती है


कुछ हैं

जो रो-धोकर काम चलाते हैं

कुछ हैं

जो करने-धरने में लग जाते हैं

कुछ हैं

जो रोने-धोने,करने-धरने पर

प्रश्न उठाते हैं

कुछ हैं

जो मरने-खपने का अर्थ बताते हैं


जो रोते-धोते हैं, वे कितने ज़्यादा हैं

जो करते-धरते हैं, उनका भी पार नहीं

जो प्रश्न उठाते, उनकी कोई सुनें नहीं

जो मर्म जान लेते हैं, चुप हो जाते हैं


ऐसे ही यह दुनिया चलती जाती है

रोज़ जनम लेती है,मरती जाती है

यह कहाँ किसी के हाथों में कब आयी है

यह कहाँ किसी की बातों में कब आयी है


सुबह-शाम,दिन-रात बीतते रहते हैं

आते-जाते रहते हैं कितने ज्ञानी

रोज़ बदलते रहते हैं राजा-रानी

सब अपने-अपने दुख में रोते रहते हैं

क्या पाकर दुनिया को खोते रहते है?