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अफसरनामा : क्रेडा में नई क्रीड़ा...ब्यूरोक्रेसी और राजनीति से जुड़ी खबरों का विश्लेषण कर रहे हैं संपादक अनिल द्विवेदी.

अफसरनामा : क्रेडा में नई क्रीड़ा...ब्यूरोक्रेसी और राजनीति से जुड़ी खबरों का विश्लेषण कर रहे हैं संपादक अनिल द्विवेदी.
  • अनिल द्विवेदी


अधिकारी दीर्घा
विधानसभा को हम लोकतंत्र का मंदिर मानते हैं. गुजरा शीतकालीन सत्र तो शीतल-शीतल ही रही लेकिन सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच कई मुददों पर तीखी तकरार भी हुई. इन्हीं में से एक मुददा उछला अफसरशाही का. भाजपा विधायक और पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने अफसरों के अप्रत्यक्ष तौर पर कान उमेठते हुए कहा कि जब मंत्री विधानसभा में हैं तो उनके विभाग के अफसर क्यों गायब है! अफसर अग्रवाल की आंखों में कंकड़ की तरह चुभते दिखे क्योंकि उन्होंने लगातार दो-तीन बार अफसरों पर निशाना साधा. फिर संसदीय कार्यमंत्री रवीन्द्र चैबे की ओर मुखातिब होते हुए कहा कि, ‘मंत्रीजी अफसरों को निर्देश जारी करें कि जब भी विभाग के सवाल विधानसभा में उठें तो सचिव स्तर के अधिकारी दीर्घा में मौजूद हों. हालांकि चौबे ने इस पर आपत्ति नही जताई. दरअसल जब कृषि, स्वास्थ्य और राजस्व मुददे पर चर्चा चल रही थी तो इसके विभागीय अफसर गायब थे. या रहे भी होंगे तो दीर्घा में नहीं थे.

या फिर जाइए...
अभी आइएएस के ट्रांसफर की लिस्ट निकली तो नारायणपुर के कलेक्टर अभिजीत सिंह चलता कर दिए गए. उन्हें तीन महीने की कलेक्टरी भी नसीब नही हुई. सिंह अब पाठयपुस्तक निगम संभालेंगे. इतने ही समय का सुख राजनांदगांव में कलेक्टर रहे आइएएस जयप्रकाश मौर्य ने भोगा था पर उनकी किस्मत अच्छी थी कि उन्हें धमतरी जिला दे दिया गया. आइएएस इफफत आरा को भी महीनों पहले पर्यटन बोर्ड के एमडी पद से हटाते हुए मंत्रालय लाया गया था लेकिन नई लिस्ट में उन्हें पंजीयन एवं मुद्रांक का महानिरीक्षक बनाया गया है. रमन सरकार में स्टिंग आपरेशन का शिकार हुए आइएएस राजेश सुकुमार टोप्पो को भी भूपेश सरकार ने जैसे तैसे स्वास्थ्य विभाग का सीईओ बनाया था लेकिन अब उन्हें राजस्व मंडल के सचिव की पोस्टिंग दी गई है. सुना था कि सरकार राजधानी के लिए नया कलेक्टर तलाश रही है लेकिन आइएएस एस भारती दासन से उपयुक्त नाम कोई मिल ही नही रहा. वैसे दासन और आईजी आनंद छाबड़ा कांग्रेसियों की गुड बुक में हैं. इसके संकेत कांग्रेस भवन में वोरा की श्रद्धांजलि सभा में देखने को मिला.

दार्शनिक मोड़ पर देखें तो सारा खेल सिंगल विण्डो सिस्टम का है. सध जाइए या फिर जाइए. सो आइपीएस अफसरों में भी अनिश्चितता और असमंजस की स्थिति बनी हुई है. कब, किसका स्थानांतरण आदेश निकल जाए, कह नही सकते. हालांकि यह सरकार का विशेषाधिकार है लेकिन ताश के पत्तों की तरह फेंटे जा रहे अफसर आपस में ही फुंफकार कर रहे हैं. वे यह समझ नही पा रहे कि सरकार चाहती क्या है! जो ‘चाहती‘ है, वह हर कोई दे नही सकता. कुछ के लिए भ्रष्टाचार कुकर्म ही है. फिर तीन या छह महीने में परिणाम कौन दे सकता है भला! पिछली सरकार में तो फिर भी एक साल तक का समय मिल जाता था. खैर.. कल ही जब आइपीएसों की ट्रांसफर लिस्ट निकली तो संजीव शुक्ला की पदस्थापना चैंका गई. उन्हें पुलिस प्रशिक्षण अकादमी में उप संचालक बनाया गया है. आइपीएस जी बी सिंह उनके बाॅस होंगे क्योंकि संचालक हैं. नई पोस्टिंग से आइपीएस दीपांशु काबरा खुश होंगे. अब वे रायपुर में अपर परिवहन आयुक्त होंगे. इसके पहले वे एसपी रह चुके हैं. खबर है कि एक बड़ा परिणाम देकर उन्होंने मुख्यमंत्री सचिवालय का दिल जीत लिया है.

क्रेडा में नई क्रीड़ा
बिखरी हुई अफवाहें कह रही हैं कि वन महकमा में सरकार बड़ी सर्जरी करने की तैयारी में है. बीज निगम में बैठे कुछ आइएफएस जिनके राज में करोड़ों का भ्रष्टाचार हुआ, सरकार जांच कराने की तैयारी में है. पहली नजर क्रेडा में है जहां जैट्रोफा, रतनजोत, बायोडीजल इत्यादि के नाम पर अरबों का खेल हुआ लेकिन जांच ना हो सकी. रमन सरकार में यही विभाग सबसे चर्चित था जहां सैंया भए कोतवाल तो डर काहे का नारा चला करता था. क्रेडा के 18 साल तक सीईओ रहे डाॅ. शैलेन्द्र शुक्ला रिटायर हुए तो सबको अचरज में डालते हुए भूपेश सरकार ने उर्जा विभाग का ओएसडी बनाया था लेकिन फिलहाल वे हरियाणा सरकार में हरेडा के अध्यक्ष हैं. शुक्ला ने क्रेडा के सीईओ रहते हुए 500 करोड़ की योजनाएं संचालित की थी जिनमें भारी भ्रष्टाचार हुआ था. विधानसभा में उठे एक सवाल के जवाब में मालूम चला था कि 110 करोड़ खर्च करके सरकार ने सिर्फ 72 लीटर बायोडीजल ही पैदा किया था. अब सरकार इस गड़बड़झाले की फाइल खुलवा रही है. सच बात है: रिश्वत भारत की स्थायी समस्या है.

रमन इफेक्ट
पूर्व मुख्यमंत्री डाॅ. रमनसिंह को आखिर गुस्सा आ ही गया. अन्यथा शांत-सरल-गंभीर प्रवृत्ति के रमन सिंह की भृकुटियां गुजरे 15 सालों के शासन में बहुत कम तनी. इस बार वे कवर्धा में अफसरशाही पर बरसे. खूब धमकाया चमकाया लेकिन कोई साथ देने नही आया. पार्टी के अंदर के नेता कहते हैं कि काश रमनसिंह को अफसरशाही पर गुस्सा तब आया होता जब उनके 15 साल के मुख्यमंत्रित्वकाल में अफसरों ने खूब आग मूती. सीनियर आइएएस जूनियरों को यस सर‘ कहने लगे थे. रमन राज में ही तो आइएएस इस्तीफा देकर चुनाव लड़े और पैराशूटर बनकर पार्टी के लेंडस्केप पर छा गए. तब भी अफसरशाही नजर नही आई. दंतेवाड़ा में जो सम्मेलन हुआ, उसमें भी सीनियर अफसर दरकिनार किए गए.

एकै साधे सब सधैं‘
सिंगल विंडोज प्रणाली एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से कई स्तर पर होने वाले कार्य, एक ही बिंदु से पूरे किया जा सकें. गुजरात के अहमदनगर क्षेत्र में सबसे पहले इसे लागू किया गया. छत्तीसगढ़ में भी रमन राज के दौरान यह प्रणाली खूब फली फूली. वैसे तो इसे जनता के हितार्थ अपनाया गया था लेकिन धीरे धीरे यह भ्रष्टाचार का अंग भी बनती गई. रमन राज गया और भूपेश राज आया तो सिंगल विण्डो सिस्टम लागू हो गया. मुख्यमंत्री सचिवालय में इसका खासा फायदा उठाया जा रहा है. सीएम के करीबी दो अफसरों ने सब कुछ अपने हाथ में ले रखा है. इसके बाद सिंगल विण्डो सिस्टम का नया नाम एकै साधे सब सधैं‘ रख दिया गया है. यानि आम आदमी से लेकर आइएएस अफसर और मंत्री, विधायकों तक को इसी सिस्टम से होकर गुजरना पड़ रहा है!

डीएमएफ का खेल
राजस्व और वित्तीय कमी से जूझ रही प्रदेश सरकार ने नया कदम उठाते हुए डिस्ट्रिक्ट माइनिंग फंड यानि डीएमएफ की राशि का उपयोग का अधिकार विधायकों-सांसदों को सौंप दिया है. चूंकि इस राशि पर केन्द्र का भी अधिकार होता है इसलिए महीनों पहले राज्य सरकार ने डीएमएफ फण्ड की 506 करोड़ की राशि का उपयोग कोरोना समस्या से निबटने में करने की अनुमति ली थी. सरकार ने सूबे के 21 जिलों के लिए डिस्ट्रिक्ट माइनिंग फंड गवर्निंग कमेटियों का गठन कर दिया है. इस गवर्निंग कमेटी की नियुक्ति तीन साल के लिए होगी. आश्चर्य कि कांग्रेस की एकमात्र सांसद कोरबा की ज्योत्सना महंत को कोरबा जिले की डिस्ट्रिक्ट माइनिंग फंड गवर्निंग कमेटी में जगह नहीं मिल पाई. वहीं बस्तर के सांसद दीपक बैज को चार जिलों की डीएमएफ कमेटी का मेम्बर बनाया गया है. ज्योत्सना विधानसभा स्पीकर डॉ. चरणदास महंत की पत्नी हैं. परंतु उनके ही जिले की कमेटी से नाम गायब होने से मुख्यमंत्री और महंत परिवार के बीच कड़ुवाहट आने की खबर है. इधर सरकार को भी विपक्ष ने विधानसभा में घेरा और डीएमएफ फण्ड के दुरूपयोग की आशंका जताई है.  डीएमएफ फंड की उपयोगिता को लेकर राज्य सरकार द्वारा गठित कमेटी की पहली सूची में कोरबा सांसद ज्योत्सना महंत का नाम शामिल नहीं किया गया है. बीजेपी के आरोपों पर सत्ताधारी दल की ओर से वरिष्ठ मंत्री रविंद्र चैबे ने सीधे शब्दों में कहा कि नाम तय करने का काम सरकार का है. कौन कमेटी में है कौन नहीं है, इस पर ज्यादा चर्चा नहीं की जानी चाहिए. सरकार की नियत पर ध्यान दिया जाना चाहिए, कमेटी के सदस्यों पर नहीं.

रणछोड़दास अफसर
किसान से धान खरीदी और बारदाना खरीदी को लेकर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, मंत्रियों सहित फिर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दर पर दस्तक देने जा रहे हैं. पीएम कार्यालय से बस अनुमति का इंतजार है. मुख्यमंत्री की इच्छाशक्ति की तारीफ करनी होगी कि वे अपने वादे को पूरा करने के लिए तथा किसानों के हित के लिए किसी भी स्तर तक जा सकते हैं. दूसरी ओर देखें तो सरकार अकेले संघर्ष कर रही है जबकि अफसरशाही आग तापने में लगी है. अगर राज्य की वित्तीय स्थिति खराब है तो वित्त विभाग के अफसर, सचिव शहला निगार और बाकी टीम क्या कर रही है! या तो वे सरकार को सही स्थिति नही बता रहे और या फिर सरकार कान ही नही धर रही है. खादय और कृषि विभाग के अफसर भी हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं. सरकार है कि अकेले तलवारें भांजे पड़ी है. कहावत सही है: कोयले से कालिख कौन उतारे.

( लेखक स्थानीय संपादक हैं )