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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-मर्ज बढ़ता ही गया ज्यों-ज्यों दवा की

 प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-मर्ज बढ़ता ही गया ज्यों-ज्यों दवा की


छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद किसी की भी सरकार रही हो उसने अपनी प्रतिबद्धता किसानों के प्रति दिखाई है। सरकार की लाख प्रतिबद्धता के बावजूद सरकारी तंत्र, व्यवस्था सप्लायर कंपनियों और दलालों की वजह से किसानों का जो भला होना था वह नहीं हुआ। उल्टे किसानों को घटिया बीज, कमतर कृषि उपकरण अमानक रसायनिक खाद लेने पर मजबूर होना पड़ा। राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने किसानों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का इजहार करते हुए राजीव गांधी न्याय योजना की तीसरी किश्त के रूप में 19 लाख किसानों को कुल 5750 करोड़ रुपए की चार किश्तों में से तीसरी किश्त की रूप में 1500 करोड़ रुपए की किश्त जारी कर उनके खाते में पहुंचाया है। भूपेश बघेल सरकार की किसान हितैषी छबि के विपरीत उन्ही के सरकारी तंत्र ने दूसरी ओर किसानों के लिए काम करने वाली सरकारी संस्था के द्वारा ब्लैकलिस्टेड संस्थाओं को बीज सप्लाई का ठेका देकर 17 जिले के किसानों को घटिया बीज दिया गया। किसान धान की फसल के साथ-साथ सब्जी भाजी उगा सकेगा और कृषि आधारित अन्य रोजगार कर सके इसके लिए बहुत सी योजनाएं संचालित है किन्तु अधिकांश योजनाओं में किसानों की मर्जी नहीं सप्लायर व अधिकारियों के हित का संवर्धन ही होता रहा है। अभी हाल ही में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने जल जीवन मिशन को आबंटित 13 हजार करोड़ की राशि में से 7 हजार करोड़ राशि में घपले को देखते हुए सारी निविदाएं निरस्त करने के आदेश दिए हैं।  

अभी हमने छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना की 20वीं वर्षगांठ मनाई। राज्य बनने के बाद के तीन साल अजीत जोगी के नेतृत्व वाली कांग्रेस की सरकार रही। वर्ष 2004 से 2018 तक डॉ. रमन सिंह की नेतृत्व वाली भाजपा की सरकार रही। 15 वर्ष के भाजपा शासनकाल के बाद जब भूपेश बघेल की कांग्रेस सरकार को दो साल पहले छत्तीसगढ़ की सत्ता प्रचंड बहुमत से हासिल हुई, तब राज्य के खजाने में 4 सौ करोड़ जमा था। इसके बाद पिछली सरकार ने 15 साल में लगभग 41239 हजार करोड़ का कर्ज लिया था। रिजर्व बैंक ने छत्तीसगढ़ सरकार को कर्ज के लिए 12 हजार करोड़ की सीमा तय की है। चूंकि, कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में किसानों को कर्जमाफी का वादा किया था और इसे पूरा करना सरकार की पहली प्राथमिकता थी, जिसे पूरा करने के लिए भूपेश बघेल ने 24 घंटे का समय भी नहीं लिया। केबिनेट की पहली बैठक में ही किसानों के 8 हजार 755 करोड़ रू. का कृषि ऋण और 244 करोड़ रू. का सिंचाई कर माफ  किया गया। छत्तीसगढ़ की सरकार किसानों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाने सरकार ने अलग-अलग बहुत सी योजनाएं लागू कर किसान हित को सर्वोपरि रखा। केंद्र सरकार के असहयोगात्मक रवैय्ये के बीच जब किसानों को धान का बोनस देने और 2500 रुपए प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदे जाने के विरोध में केन्द्र ने राज्य से चावल लेने से मना कर दिया था। केन्द्र सरकार ने खरीदी का कोटा बढ़ाने की बजाय खरीदी पर ही रोक भी लगा दी थी और चिट्ठी लिखकर राज्य सरकार को चेता भी दिया था कि यदि राज्य सरकार इसी तरह किसानों को बोनस देगी तो वो धान नहीं खरीदेगी। ज्ञातव्य है कि राज्य में लगभग 38 लाख मीट्रिक टन धान की खपत होती है। छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल था कि लगभग 49 लाख मीट्रिक टन धान का वह क्या करेगी? सरकार ने तमाम बाधाओं की परवाह नहीं करके किसानों के हितों का ध्यान रखा और न केवल धान खरीदी की बल्कि किसानों से समर्थन मूल्य से अधिक पर 2500 रुपए प्रति क्विंटल धान खरीदकर प्रत्येक क्विंटल पर 600 रुपए से अधिक का लाभ देना भी सुनिश्चित किया।

जब छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण हुआ तब धान खरीदी मंडियों के माध्यम से होती थी। मंडियों में बमुश्किल 20 फीसदी धान बिकता था। शेष धान बिचौलिए और राईस मिलर का नेक्सेस के कारण किसानों को औने-पौने में बेचना पड़ता था। तब तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. अजीत जोगी ने अपने कार्यकाल में मंडियों की संख्या बढ़ाई। राज्य से बाहर से आने वाले धान की आवक रोका ताकि राज्य के किसानों का धान समर्थन मूल्य पर बिक सके। उन्होंने फसल चक्र परिवर्तन को प्रोत्साहित कर द्विफसली फसल के लिए किसानों से अपील की और इसके लिए रबी की फसल बढ़ाने के लिए सिंचाई का मॉडल तैयार किया। गांव-गांव में जोगी डबरी का निर्माण कर जलस्तर को बढ़ाने की ईमानदार कोशिश की। वहीं 2004 में आई डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने सहकारी समितियों को धान खरीदी का अधिकार दिया। किसानों को इससे बड़ी राहत मिली। बावजूद इसके किसानों की मंडियों पर निर्भरता पूरी तरह खत्म नहीं हुई ना ही बिचौलिए से राहत ही मिल पाई। सरकार के लाख प्रयास के बावजूद समर्थन मूल्य हमेशा की तरह थोड़ा बहुत बढ़ा किसानों को प्रति क्विंटल 300 रुपए बोनस की व्यवस्था तत्कालीन भाजपा की सरकार के द्वारा की गई। 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के घोषणा-पत्र के अनुरूप भूपेश बघेल की सरकार ने किसानों को सर्वोच्च प्राथमिकता देकर ग्रामीण विकास की अपनी प्रतिबद्धता दिखाते हुए किसानों को प्रति क्विंटल 2500 रुपए बोनस देकर बड़ी राहत दी।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए नरवा, गरवा, घुरूवा अऊ बारी तथा गोधन न्याय योजना लागू करने वाली भूपेश बघेल सरकार को यह भी देखना होगा कि उसकी यह पूरी योजना को क्रियान्वयन करने वाली एजेंसियां किस तरह से काम कर रही हंै। किसानों की हितैषी बनने वाली उनके लिए सड़क से लेकर दिल्ली तक प्रदर्शन करने वाली सरकारों ने चाहे वह कांग्रेस की सरकार रही हो या भाजपा की, उन्होंने इस बात की कभी कोई खास चिंता नहीं की, कोई सिस्टम विकसित नहीं किया जिससे किसानों को खाद-बीज कृषि उपकरण अनुदान, प्रमाणिक बीज देने वाले तंत्र को सुधारा जा सके। पिछले बीस सालों में कृषि, उद्यानिकी, कृषि अभियांत्रिकीय और बीज निगम में दलालों ठेकेदारों का दबदबा रहा। जिन्होंने किसानों को घटिया बीज, कीटनाशक, खरपत नाशक, ट्रेक्टर/रोटा वेटर हारवेस्टर धान कटाई घटिया कृषि उपकरण प्रमाणिकरण के नाम पर उपलब्ध कराये। किसान साल दर साल सरकारी तंत्र और सप्लायर कंपनियों के बीच फंसकर मजबूरन में उनके द्वारा प्रदाय किये जाने वाली कृषि सामग्री उपकरण लाने मजबूर होता रहा। यदि बीस साल के छत्तीसगढ़ में कृषि, उद्यानिकी, बीज निगम कृषि अभियांत्रिकीय और इससे जुड़े अन्य विभागों की निष्पक्ष जांच कराई जाए तो पता चलेगा कि यह किस तरह का गोरखधंधा और किन सप्लायर, कंपनियों का बोलबाला है। जबकि होना यह चाहिए था कि बीज प्रमाणिकता संस्था और बीज निगम किसानों का हित चिंतक बनकर उनके हितों की रक्षा करता किन्तु उसकी अब तक की कार्यप्रणाली बताती है कि किसानों के ज्यादा सप्लायरों की चिंता है। यही वजह है कि किन कंपनियों को आरसीओ ने गड़बड़ी करने और धान के सैंपल फेल होने पर ब्लैक लिस्टेड किया गया था उन्हीं संस्थाओं को सब्जी के बीज खरीदी के आर्डर दिए गए। इससे पहले भी राजनांदगांव जिले व अन्य जिलों में सोयाबीन के घटिया बीज किसानों को दिए गए जिससे किसानों को भारी नुकसान हुआ।  जिस कंपनी द्वारा आरसीओ फाइनल होने के बाद हाइब्रिड धान की सप्लाई की गई। इनके सैंपल को जब लैब इंदिरा गांधी कृषि विवि में जांच के लिए भेजा गया। तो वहां इनके प्रोडक्ट में कमियां पाई गई । जब यह मामला विधानसभा में उठा तो इन कंपनियों को ब्लैक लिस्ट किया गया।

जो सरकार किसानों के हितों के लिए यहां वहां से कर्जा ले रही हो जो सरकार किसानों के लिए सड़कों पर लड़ाई लडऩे के लिए तैयार हो उस सरकार का तंत्र यदि किसानों के लिए कोई संवेदना ना रखे और उन्हें सप्लायरों के भरोसे छोड़ दे तो यह सोचने का विषय है कि सरकार किस तरह से किसानों के हितों को बचाएगी? हर साल किसान घटिया बीज, घटिया रसायनिक खाद, और कृषि उपकरण के जाल में फंसकर बैंक के कर्जदार होते रहेंगे और सरकारें किसानों के ऋण माफ करती रहेगी। किसानों की माली हालत में कोई सुधार नहीं होगा और खेती हमेशा की तरह घाटे का सौदा बनी रहेगी। सरकार की प्राथमिकता अगर किसान है तो समग्रता में इन सारी बातों की ओर ध्यान देना होगा। वरना आप राजीव गांधी न्याय योजना के जरिए कितनी ही न्याय की बात करें किसानों के साथ अन्याय सरकार के उनके अपने तंत्र के द्वारा निरंतर इसी तरह जारी रहेगा।
ये पूरी कवायद को देखकर गालिब साहब का शेर याद आता है-
मरीज ए इश्क पर रहमत खुद की
मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की।।