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|| संपादकीय : मीडिया से जुड़े लोगों की दुविधा : कांकेर पत्रकार विवाद

|| संपादकीय : मीडिया से जुड़े लोगों की दुविधा : कांकेर पत्रकार विवाद

इस समय देश से लेकर छत्तीसगढ़ तक मीडिया से जुड़े लोगों के बीच एक तरह की दुविधा का माहौल है. ऐसे में उन लोगों के लिए सबसे ज्यादा मुश्किल यह थी कि अपनी बिरादरी को लेकर वे क्या स्टेंड लें? देश के बड़े चैनलों के बीच टीआरपी के खेल से लेकर अपने-अपने तरीके से, खास चश्मे से खबरों को प्रस्तुत करने का आरोप लग रहा हो, जब लोग गोदी मीडिया की बात कर रहे हैं, तब छत्तीसगढ़ में रेत खनन माफिया के साथ अपने रिश्तों और उससे उपजे विवाद के बाद कांकेर में पत्रकारों के साथ हुई मारपीट की घटनाएं चिंताजनक हैं. मुख्यमंत्री की पहली पर गठित पत्रकारों की समिति ने इस संबंध में बहुत से महत्वपूर्ण सवाल खड़े किये हैं और सोचने के लिए कुछ बिंदु भी दिये हैं.

जांच कमेटी ने मार्गदर्शक टिप्पणी की है. कमेटी ने कहा कि  'इस बात को लेकर मीडिया के अंदर ही विमर्श होना चाहिए कि पत्रकार के रूप में लक्ष्मण रेखा कहां तक है. मीडिया का अपना दायित्व है, अपना दायरा है लेकिन कांकेर में जो देखने को मिला, उसमें कमल शुक्ला और सतीश यादव ने पत्रकारिता से बेपटरी होकर अपनी निजी नाराजगी को सोशल मीडिया के माध्यम से प्रस्तुत किया. इसके बाद ही दोनों के साथ गंभीर घटना घटित हुई, जो निंदनीय है. कमल शुक्ला ने पत्रकारिता के दायरे से निकलकर एक्टिविज्म का प्रदर्शन किया. समिति का ये सुझाव है कि मीडिया के अंदर भी इस पर विचार होना चाहिए कि पत्रकार के रूप में उनका दायरा कहां तक है ताकि इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके. पूरे घटनाक्रम में अहं का टकराव स्पष्ट दिखता है. यह स्थिति संवादहीनता से पैदा होती है. संवाद कायम करने की जिम्मेदारी प्रशासन और शासन दोनों की होती है.'

ज्ञातव्य है कि मीडिया और सरकार के बीच इस तरह का विवाद राज्य में पहली बार हुआ हो, ऐसा नही है. पिछली भाजपा सरकार में भी दो पत्रकारों की हत्या हुई थी जिसकी जांच सीबीआई ने की मगर वह आरोपियों को पकड़ने में असफल रही थी. वर्तमान सरकार में भी पत्रकारों के छिटपुट विवाद होते रहे लेकिन कांकेर की घटना ने राज्य की कानून व्यवस्था और पत्रकारों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल कर दिया था. इसने पूरे प्रदेश के पत्रकारों को आंदोलित कर दिया. जांच रिपोर्ट के मुताबिक ये स्थिति पैदा होने की तीन मुख्य वजह रही : पहला आरोपी पत्रकारों की सोशल मीडिया पर सत्ताधारी नेताओं के खिलाफ टिप्पणी, दूसरा प्रशासनिक संवादहीनता और तीसरा ला एंड आर्डर' संभालने में लापरवाही. 

मुख्यमंत्री के सलाहकार, विनोद वर्मा और रूचिर गर्ग, जो पेशे से पत्रकार हैं, ने इस पूरे विवाद में एक सकारात्मक और संतुलित भूमिका निभाई है. पत्रकारों के हित और उनकी चिंताओं को वे बेहतर ढंग से समझते हैं. एक समय ऐसा भी लगा कि सरकार का धैर्य जवाब देने वाला है लेकिन दोनों सलाहकार उम्मीदें बांधे आगे बढ़ते रहे. वे लगातार अस्पताल जाकर अनशनकारियों के सेहत की चिंता करते रहे और अनशन खत्म करने का आग्रह भी किया. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उनकी टीम आंदोलनकारियों के संपर्क में रही, बातचीत का प्रस्ताव भी भिजवाया मगर उसे खारिज कर दिया गया.

इस बीच सरकार पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करने, कांकेर विवाद के आरोपियों पर कानूनी और राजनीतिक कार्रवाई करते हुए ईमानदारी से आगे बढ़ती नजर आई. घटना के तत्काल बाद संसदीय सचिवों की एक समिति गठित की गई लेकिन उसका कोई परिणाम शून्य रहा. तत्पश्चात मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के निर्देश पर पत्रकारों की एक जांच कमेटी गठित की गई जिसने कांकेर जाकर पूरे मामले की जांच की और अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को सौंपते हुए कुछ सिफारिशें की थी. जांच कमेटी ने जो रिपोर्ट सौंपी, सरकार ने उस पर तुरंत एक्शन लिया और बिना देरी किए कांकेर घटना के लिए दोषी पुलिस अधिकारियों के स्थानांतरण किए तथा सिट' कमेटी का गठन भी कर दिया.

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल चूंकि जनसंपर्क मंत्री भी हैं इसलिए उनकी चिंताएं वाजिब थीं. उन्होंने कुछ पत्रकारों से चर्चा करते हुए कहा भी कि हम मीडिया की सुरक्षा के लिए कानून ला रहे हैं, उनके आर्थिक हितों की चिंता कर रहे हैं. पत्रकारों को पेंशन, राज्यस्तरीय मान्यता, आवास इत्यादि की चिंता भी सरकार कर रही है. सरकार के इस कदम ने कहीं ना कहीं आंदोलनकारियों को राहत दी.