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97 वां तानसेन समारोह: शास्त्रीय संगीत का वैश्विक मंच

97 वां तानसेन समारोह: शास्त्रीय संगीत का वैश्विक मंच


अजित राय
अपने आयोजन के शताब्दी वर्ष की ओर बढ़ रहे 97 वें तानसेन  समारोह ( 25-30 दिसंबर 2021,ग्वालियर, मध्य प्रदेश) ने भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया में चमत्कार कर दिया है। एक तो इस समारोह ने इस आम धारणा को तोड़ा है कि शास्त्रीय संगीत आम जनता के लिए नहीं है तो दूसरी ओर इस बात को भी गलत साबित किया है कि नई पीढ़ी इससे विमुख हो रही है जैसा कि चैतन्य तम्हाणे की दुनिया भर में चर्चित  मराठी  फिल्म ' द डिसाइपल ' (2020)  में हम देखते हैं। तीसरी बात यह हुई है कि इस बार तानसेन संगीत समारोह ने इस धारणा को भी बदला है कि आज की हमारी राजनीति संस्कृति की परवाह नहीं करती।  97 वें तानसेन समारोह के उद्घाटन समारोह  (25 दिसंबर 2021) में तानसेन की समाधि पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ साथ नरेंद्र सिंह तोमर और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे दो दो दिग्गज  केंद्रीय मंत्रियों की भागीदारी ऐतिहासिक घटना है जिससे अस्सी के दशक  की याद ताजा हो जाती है जब अर्जुन सिंह मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे और संस्कृति सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल थी। जमाने के बाद ऐसा दिखा कि राजनीति ने संस्कृति को सलाम किया। इतना ही नहीं ,जानलेवा बीमारी से संघर्ष कर रहे सुप्रसिद्ध संतूर वादक पंडित भजन सोपोरी ने तो यहां तक कह दिया कि वे तो बिस्तर से उठने की हालत में नहीं थे, पर तानसेन के यहां हाजिरी लगाने आ गए कि क्या पता यहां बजाने के बाद वे स्वस्थ हो जाएं।



          मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने न सिर्फ केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की सभी सांस्कृतिक मांगे मान ली जिसमें कालिदास सम्मान की राशि दो लाख से बढ़ाकर पांच लाख रूपए करना शामिल है, वल्कि बड़े पैमाने पर बैजूबावरा के नाम से प्रतिवर्ष एक और संगीत समारोह आयोजित करने की घोषणा भी कर डाली।   उद्घाटन के बाद ऐसा पहली बार हुआ कि मुख्यमंत्री, मंत्री गण और दूसरे राजनेताओं और अफसरों के जाने के बाद भी  हजारों संगीत प्रेमियों का हुजूम कड़कड़ाती सर्दी और बूंदा-बांदी में भी आधी रात तक पंडाल में जमा रहा। यह कोई हिंदी का उच्च भ्रू भद्रलोक नहीं था जिसके लिए शास्त्रीय संगीत को आरक्षित मान लिया गया है। यह आम जनता थी जो ग्वालियर और आस पास के गांवों से संगीत सुनने आई थी जिसमें अधिकतर नौजवान थे। तानसेन समारोह में आने पर भारतीय शास्त्रीय संगीत की ताकत का पता चलता है। इन संगीत सभाओं में जो एक बार बैठ गया, वह फिर अंत तक उठ नहीं पाया। तानसेन समारोह को सरकारों ने नहीं उस आम जनता ने आज दुनिया का सबसे बड़ा संगीत समारोह बना दिया  है जिसकी अवहेलना राजनीति भी नहीं कर सकती। अब यह आयोजन विश्व संगीत समागम बन चुका है जहां एक मंच पर भारत और दुनिया के अन्य देशों का शास्त्रीय संगीत एकाकार होता है।
         जब तानसेन समारोह में दुनिया के अन्य देशों से कलाकारों को आमंत्रित करने की बात चली तो यहां के आम संगीत प्रेमियों के लिए इस बात पर विश्वास करना मुश्किल था कि भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर भी शास्त्रीय संगीत होता है। पहले तो सबको लगा कि उनको आमंत्रित करने की बात हो रही है जो विदेशों में बसे भारतीय है या ऐसे विदेशी कलाकार जो भारतीय शास्त्रीय संगीत गाते-बजाते है। मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग की उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी ने इन दोनों धारणाओं को खारिज करते हुए दुनिया के अलग-अलग देशों से उनके अपने शास्त्रीय संगीत के कलाकारों को आमंत्रित कर तानसेन समारोह को सच्चे अर्थों में विश्व संगीत समागम बना दिया। मसलन इस बार की ही बात करें तो फ्रांस ( मार्टिन डबाइस), ब्राजील ( पाब्लो), अर्जेंटीना ( देसिएतों आनदंते), स्पेन ( अल्मुडेन डियाज ललानोस), रूस ( एकातेरिना अरिस्टोवा और तातियाना शांद्रकोवा) और इजरायल ( यूसुफ रूह अलौश) के कलाकारों ने अपने अपने देशों के शास्त्रीय संगीत को प्रस्तुत किया जिन्हें उतने ही ध्यान से सुना गया जितने ध्यान से भारतीय संगीत को सुना जाता है।
उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी के निदेशक जयंत माधव भिसे और उप निदेशक राहुल रस्तोगी, संस्कृति विभाग के निदेशक अदिति कुमार त्रिपाठी और प्रमुख सचिव शिव शेखर शुक्ला तथा संस्कृति मंत्री उषा ठाकुर की टीम ने तानसेन समारोह को एक बहुआयामी पैकेज में पेश कर विश्व स्तरीय बना दिया है जहां शास्त्रीय संगीत की कई पीढिय़ां एक मंच पर संवाद कर रहीं हैं। इस टीम ने एक ओर समारोह की पूर्व संध्या पर उप शास्त्रीय संगीत ( गमक) को जोड़कर सामान्य रसिकों का खयाल रखा तो हर संगीत सभा की शुरुआत मध्यप्रदेश के संगीत महाविद्यालयों की प्रस्तुति से करके युवा पीढ़ी को जोड़ा। इस बार गमक में पंजाब के सुप्रसिद्ध सूफी गायक पूरन चंद बडाली और उनके बेटे लखविंदर बडाली ने आधी रात तक रसिकों को बांधे रखा। पांच दिन में नौ संगीत सभाओं में देश विदेश के करीब पचास कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियां दी। पंडित भजन सोपोरी, दिल्ली (2020), अभय नारायण मलिक , दिल्ली (2019), सुरेश तलवलकर, पुणे (2018), व्यंकटेश कुमार, धारवाड़ (2017), अश्विनी भिड़े देशपांडे, मुंबई (2016), अरूणा साईंराम, चेन्नई (2015), विक्कू विनायकरम, चेन्नई (2014) और कार्तिक कुमार, मुंबई (2013) को शास्त्रीय संगीत में उल्लेखनीय योगदान के लिए देश के सबसे प्रतिष्ठित कालिदास सम्मान से नवाजा गया। फेसबुक और यूट्यूब पर सीधे प्रसारण से दुनिया भर के संगीत प्रेमियों ने तानसेन समारोह का आनंद उठाया।
            तानसेन समारोह में वरिष्ठ और दिग्गज संगीतकारों के साथ इस बार बड़ी संख्या में युवा संगीतकारों को भी अवसर मिला। मसलन नीलाद्री कुमार, सुधा रघुरामन, शास्वती मंडल, राहुल देशपांडे, उदय भवालकर, तेजस एवं मिताली, रमाकांत गायकवाड़ आदि। पिता- पुत्र और गुरु शिष्य परंपरा की कुछ लाजवाब प्रस्तुतियां थी। काफी संख्या में मध्यप्रदेश के कलाकारों को भी अवसर प्रदान किया गया जिसमें ग्वालियर के सुदीप भदौरिया, संजय राठौड़, भरत नायक, इंदौर- उज्जैन से मनोज सराफ, तृप्ति कुलकर्णी, अभिषेक व्यास और वैशाली बकोरे प्रमुख हैं।