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ध्रुव शुक्ल की कविताः ऐसे कटता है दिन

ध्रुव शुक्ल की कविताः ऐसे कटता है दिन


नींद खुलते ही

प्रार्थनाओं में बीनता हूँ शांति

जो भंग होती है अखबार से

भरी रहती हैं जिसमें आवाज़ें

पाखण्ड ,छल और लोभ की


आँख मूँदकर

कर लेता हूँ भरोसा 

धर्म के पाखण्ड पर

राजनीतिक छल पर

बाज़ार के लोभ पर

समय नहीं पछताने का

अपने आप पर


टेलीविजन पर 

आलाप लेते शोर में

बीनता रहता हूँ शब्द

हिन्दू और मुसलमान


सड़कों पर भूसे की तरह

उड़ती चली आती भीड़ में

किसको पास बुलाऊँ

किससे दूर चला जाऊँ


आवाज़ों के कचरे में

दिन भर कचरा बीनता रहता हूँ

खाली हाथ लौटता हूँ घर


शाम ढलते ही आती है याद

वह लड़की

जो कचरे से कचरा बीनकर

पीठ पर बोरी लादे

जा रही होगी कबाड़खाने की ओर