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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - घरेलू हिंसा में बढ़ोत्तरी चौकाने वाली है

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  - घरेलू हिंसा में बढ़ोत्तरी चौकाने वाली है

-सुभाष मिश्र
कोरोना की वैश्विक महामारी के बीच दुनिया के बहुत सारे देशों से यह खबर आ रही है कि लॉगडाऊन के दौरान महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा के मामले में बढ़ोत्तरी हुई है। अमेरिका जिसे हम दुनिया का सबसे ताकतवर आधुनिक देश समझते हैं, वहां भी महिलाओं की स्थिति बेहतर नहीं हैं। वर्ष 2020 में जहां महिलाओ के खिलाफ दुव्यर्वहार की घटनाएं 31 प्रतिशत थी, वह बढ़कर 106 प्रतिशत हो गई। न्यूजीलैंड की ओटागरे यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता की गूगल सर्च रिपोर्ट के मुताबिक महिलाओं ने 122 करोड़ बार मदद करें, वह नहीं छोड़ेगा के नाम से सहायता के लिए सर्च किया। वहीं पुरूषों ने 16.5 करोड़ बार गूगल से पूछा की पत्नी को कैसे कंट्रोल करें, उसके साथ मारपीट कैसे करें की पता न चले। भारत में भी लॉकडाऊन के समय घरेलू हिंसा बहुत बढ़ी है। पश्चिम बंगाल चुनाव में ममता बैनर्जी की जीत को पुरूष सत्ता को धराशायी करने के रूप में प्रचारित कर यह बताया गया की देखो एक महिला ने यह कर दिखाया। दरअसल यह महिलाओं को हमारी राजनीतिक, सामाजिक व्यवस्था से अलग करके देखने की कोशिश की सहज अभिव्यक्ति है। एक महिला होकर भी इतनी हिम्मत, एक महिला होकर भी पुरूषो की बराबरी। मानो महिला होना कोई गुनाह है। सामाजिक, राजनैतिक व्यक्तित्व वाली ममता बैनर्जी ने प्रतिकूल परिस्थितियों में अपनी राजनैतिक सूझबूझ, अपने लड़ाकेपन  और दमखम के साथ जो चुनाव जीता है, वह केवल एक महिला तक सीमित नहीं रहा है। इसके ठीक उल्ट पुरूषवादी मानसिकता के चलते बहुत से महिला संगठनों ने दीदी ओ दीदी के जयघोष और बोलने की शैली को महिला उत्पीडऩ की तरह देखा। पीढिय़ो से हम सबके दिमाग में एक जेंडर बायस्ट मापदंड बना हुआ है, जिसका प्रकटीकरण समय-समय पर होता है। पुरूष सत्तात्मक या कहे पितृ सतात्मक समाज में हमेशा से महिलाओं को व्यवस्था से अलग देखने की कोशिश होती रही है। कभी भी किसी स्त्री को एक स्वतंत्र इंकाई के रूप में स्वीकार करने की हिम्मत पुरातन पंथी समाज में नहीं हुई। बढ़ती घरेलू हिंसा के बीच हमे जेंडर से सेंसिटीविटी के साथ यह सोचने की जरूरत है की स्त्री/पुरुष उसी तरह एक व्यक्ति, इंसान है, जैसा होना चाहिए। सारे अत्याचार, त्याग, ममत्व और घरेलू कामकाज औरतों के हिस्से में देकर हम कब तक कहते रहे की नारी तुम केवल श्रद्धा हो....।
अमेरिका जैसे देश में जहां स्त्री बहुत हद तक आर्थिक रूप से आजाद और व्यक्तिगत रुप से स्वतंत्र है, वहां पर भी यदि स्त्रियों को बार-बार हेल्प लाईन की जरूरत पड़ती है, तो हमें उन कारणों को तलाश करना होगा, जो घरेलू हिंसा को कम करके स्त्री-पुरुष, पति-पत्नी को एक मित्र की तरह, बराबरी के स्तर पर लाकर खड़ा करें। औरतों के मन में अनिश्चिता, असुरक्षा, हताशा, बेबसी और पुरूषों द्वारा किये जाने वाले इशारे, छेड़छाड़ की वजह से एक डर समाया रहता है। बहुत हद तक अपने पैरों पर खड़ी या कहें आर्थिक रूप से स्वावलंबी औरत इनसे थोड़ा मुक्त रहती है, किन्तु वर्तमान आंकड़े चौकाते हैं।

सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने लिखा है कि औरतों की आजादी में यह वाक्य स्वर्ण अक्षरों में लिखा जायेगा कि एक की कमाई से पूरा नहीं पड़ता। परिवार की आर्थिक जरूरतों और शिक्षा के कारण बदली सोच के कारण आज महिलाएं बड़े पैमाने पर घर की चारदीवारी से बाहर जाकर कामकाज कर रही है, अपना स्पेस तलाश रही है। विश्वव्यापी तालाबंदी की वजह से स्त्री, पुरूष दोनों का स्पेस कम हुआ है। दोनों की निजता प्रभावित हुई है और वे ज्यादा समय तक एक साथ एक ही घर में बंद है। यही वजह है कि घरेलू हिंसा तेजी से बढ़ रही है।

राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन महिलाओं के लिए विशेष रूप से कठिन था, क्योंकि उन्हें घर के कामों में हाथ बंटाना और अपने काम का प्रबंधन करना था। लॉकडाउन के लगने के दूसरे महीने तक, घरेलू दुरुपयोग के बारे में शिकायतें दोगुनी हो गईं। ऐसी शिकायतें मार्च के पहले सप्ताह में 116 से बढ़कर अंतिम सप्ताह में 257 तक पहुंच गई। राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) ने पिछले साल अप्रैल में घरेलू हिंसा की शिकायतों में 2.5 गुना की वृद्धि दर्ज की। 25 मार्च से 31 मई के बीच एनसीडब्ल्यू को 1,477 शिकायतें मिलीं। बोझ एक्टिविस्ट शबनम हाशमी के अनुसार, कोविद-19 ने महिलाओं को अपने ही घरों में च्च्फँसायाज्ज्, च्च्सांस लेने की जगहज्ज् से वंचित रखा, जो उन्हें अन्यथा मिलती थी। लॉकडाउन अवधि के दौरान महिलाओं घरेलू शोषण के आंकड़े उन लोगों से हैं जिन्होंने फोन उठाने और शिकायत करने का साहस पाया। च्च्संयुक्त परिवारों में रहने वाले कई अन्य लोग होंगे, जो नियमित रूप से दुर्व्यवहार का शिकार होते हैं, लेकिन गोपनीयता और सोच के लिए शिकायत नहीं करते हैं कि मामले बदतर हो सकते हैं।

कोरोना संक्रमण के दौरान दुनिया भर में ने घरेलू हिंसा (डीवी) मामलों में वैश्विक वृद्धि का संज्ञान लिया। कई देशों ने महिलाओं से प्राप्त संकट कॉलों की संख्या में 15-30फीसदी वृद्धि की सूचना दी। भारत में कोविड-19 लॉकडाउन की श्रृंखला ने घरेलू हिंसा के मामलों की रिपोर्टिंग के अवसरों को कम कर दिया। पुरुषों और महिलाओं के साथ लंबे समय तक एक साथ रहने के साथ, महिलाओं की गोपनीयता गिर गई और हिंसा की घटनाएं बढ़ गईं।

राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (एनएलएसए) के हालिया आंकड़ों के अनुसार, घरेलू हिंसा(डीवी) की दरें लॉकडाउन के बाद पूरे देश में बढ़ गई हैं। (टाइम्स ऑफ इंडिया, 2020) लॉकडाउन की शुरुआत में, महिलाओं के खिलाफ विभिन्न अपराधों की 257 रिपोर्टें राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) द्वारा प्राप्त किया गया है, जिसमें से 69 मामले घरेलू हिंसा (डीवी), (प्रिंट, 2020) के रूप में दर्ज किए गए हैं। एनसीडब्ल्यू के चेयरपर्सन के अनुसार, लॉकडाउन के दौरान पंजाब से सबसे ज्यादा घरेलू हिंसा (डीवी) के मामले सामने आए हैं और सभी मामलों की शिकायत ईमेल पर की गई है। विशेष महिला हेल्प डेस्क के अनुसार, पतियों के खिलाफ मानसिक और शारीरिक यातना के 600 से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं।

मानवाधिकारों के विश्व घोषणा में लिंग भेद के बिना सबको समान रूप से अधिकारों की घोषणा की गई है। 18 दिसंबर सन 1976 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने स्त्रियों के विरुद्ध सभी रूपों में विभेद के विलोपन अभी समय को पारित किया। महिलाओं व पुरुषों की समानता के सिद्धांत को संविधान में स्थान दिया गया। स्त्रियों के विरुद्ध सभी प्रकार के विविध का निषेध किया गया है। परंतु आज भी भारतीय महिलाओं के समक्ष जन्म से जीवन पर्यंत समस्याएं रहती है। मादा, भ्रूण हत्या से लेकर, भेदभाव, घरेलू हिंसा अवसरों की अनदेखी यौन उत्पीडऩ, बलात्कार इत्यादि कई ऐसी स्थितियां हैं जहां महिलाओं के अधिकारों का हनन हो रहा है। दहेज, हत्या, बलात्कार, बाल विवाह, हिंसा, किसी निर्णय में सलाह न लेना, स्त्रियों की गरिमा पर सीधा प्रहार है। घरेलू हिंसा कम करने के लिये और लड़का-लड़की के बीच व्याप्त सामाजिक भेदभाव को कम करने के लिए सामान पोषण शिक्षा अवसरों की समानता देनी जरूरी है। बहुत बार पितृ सत्तात्मक समाज में पुरुष, स्त्री को अपनी संपत्ति मानता है और यह नहीं मानता कि उसके ही समान स्त्री की भी भावनाएं हो सकती है। महिलाओं को इस उत्पीडऩ से बचने के लिए सबसे पहले आर्थिक रूप से स्वालंबी बनना पड़ेगा। प्रत्येक महिला को एक उपयुक्त पेशा अपनाना होगा, ताकि वह भी कमा सके। अगर वह कम से कम खुद के लिए आजीविका कमाने में सक्षम हो जाए, तो कोई भी पति उसे दासी नहीं मानेगा।

बहुत सारे पुरुष के लिए एक महिला उसकी रसोईया, उसके घर की नौकरानी, उसके परिवार या वंश को आगे बढ़ाने के लिए प्रजनन का साधन है, और उसके सौंदर्य बोध को संतुष्ट करने के लिए एक सुंदर ढंग से सजी गुडिय़ा है। जब तक हम अपनी जेंडर की समझ को साफ नही करेगें और लैंगिक आधार पर भेदभाव कम नही करेंगे तब तक महिलाओ के खिलाफ अत्याचार, घरेलू हिंसा और हमारी सोच नहीं बदलने वाली है।
अंत में प्रसंगवश अनामिका की कविता-
ईसा मसीह
औरत नहीं थे,
वरना मासिक धर्म
ग्यारह बरस की उमर से
उनको ठिठकाए ही रखता
देवालय के बाहर!
बेथलेहम और यरूशलम के बीच
कठिन सफर में उनके
हो जाते कई तो बलात्कार
और उनके दुधमुंहे बच्चे
चालीस दिन और चालीस रातें
जब काटते सड़क पर,
भूख से बिलबिलाकर मरते
एक-एक कर-
ईसा को फुर्सत नहीं मिलती
सूली पर चढ़ जाने की भी!
मरने की फुर्सत भी
कहां मिली सीता को
लव-कुश के
तीरों के
लक्ष्यभेद तक?