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II चेंबर चुनाव : दीया जल रहा है...हवा चल रही है! छत्तीसगढ़ चेम्बर आफ कॉमर्स के चुनाव परिणाम पर संपादक अनिल द्विवेदी का विश्लेषण

II चेंबर चुनाव : दीया जल रहा है...हवा चल रही है! छत्तीसगढ़ चेम्बर आफ कॉमर्स के चुनाव परिणाम पर संपादक अनिल द्विवेदी का विश्लेषण
  • अनिल द्विवेदी

1970 के दशक की पुरानी भाजपा यानि जनसंघ ने चुनाव में एक गाना चलाया था : ये कहानी है दीए की और तूफान की. छत्तीसगढ़ चेम्बर आफ कॉमर्स के चुनाव में भी घमासान 'दीए और कलश' के बीच ही था लेकिन कल आए परिणाम के बाद अब साफ हो गया है कि अगले तीन साल तक चेम्बर के हितों के लिए दीया जलेगा और वह भी कलश के उपर. दोनों एक-दूसरे के बगैर अधूरे हैं. फिलवक्त चेम्बर में 40 साल तक चले आ रहे एकता पैनल के साम्राज्य को ढहाते हुए जय व्यापार पैनल ने अपनी बादशाहत कायम की है. नवनिर्वाचित अध्यक्ष अमर पारवानी सहित महामंत्री अजय भसीन, कोषाध्यक्ष उत्तम गोलछा सहित सभी उपाध्यक्ष और मंत्रियों को बधाई!

हत्ता कि राजधानी छोड़कर अन्य जिलों में एकता पैनल ने कांटे की टक्कर दी है लेकिन 'हस्तिनापुर' में राज तो व्यापार पैनल ही करेगा. क्या यह निर्वाचित अध्यक्ष अमर पारवानी के द्वारा कई सालों से व्यापारी हित में किए कार्यों से उपजी जीत है या एकता पैनल की सत्ता विरोधी एंटीइनकमबेंसी..! राजधानी को छोड़ दें तो अन्य जिलों में एकता पैनल ने चेम्बर में धमाकेदार एंट्री की है. भाजपा के 15 साल के राज में ऐसे कई मौके आए जब राइस मिल एसोसिएशन के अध्यक्ष के तौर पर योगेश अग्रवाल ने अपनी ही पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोला और व्यापारियों के हित में फैसले भी कराए लेकिन जैसा कि मैंने दूसरों से सुना, चुनाव में अनुभवहीन चेहरे, जरूरत से ज्यादा प्रचारबाजी या दिखावा, अंदरूनी भीतरघात, कुछ स्वभावगत कमजोरियां और कमल छाप की शरण ने उन्हें हार का मुंह दिखवा दिया. उनके ही एक रिश्तेदार का कथन सुनिए : काका का साथ योगेश को ले डूबा!

हमन कहावत सुनत हन के जइसन बोंही, तइसन लूही अर्थात जैसा बोओगे, वैसा काटोगे. यकीनन, यह सत्ता-विरोधी वोट था. पूर्व अध्यक्ष बरलोटा, पूरनलाल अग्रवाल और उनकी टीम की 'एंटीइनकमबेंसी' के अलावा श्रीचंद सुंदरानी के कार्य-व्यवहार को लेकर व्यापारियों के मन में एक बदले वाली खीझ देखी गई. बस व्यापारी किसी अच्छे और चमत्कारिक चेहरे का इंतजार कर रहे थे जो उन्हें अमर पारवानी के रूप में मिल गया. परवानी पहले भी चेम्बर के अध्यक्ष रह चुके हैं. गुण-दोष उनके भी रहे होंगे लेकिन वह एक जागता हुआ दिमाग रखते हैं. कैट' के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष होने के नाते आपदधर्म में उन्होंने व्यापारियों के हित में जिस तरह आंदोलन चलाए, उनकी छबि निखरती चली गई, भरोसा सुद्रढ़ होता चला गया. अपनों को गले लगाने के मामले में भी अमर ज्यादा भारी पड़े. परवानी की छबि का परवान कुछ ऐसा चढ़ा कि उसने सारे पदों पर कब्जा जमा लिया. ऐसा लग रहा था मानो वे मोदी बन गए हैं जिनके नाम पर कोई भी चुनाव जीत जाएगा और विरोध करने वाला हारेगा.

हर जंग में कोई हारता, तो कोई जीतता है, पर सियासी युद्धों का इतिहास पराजितों के साथ विजेताओं को भी सजग रहने का सबक दे जाता है. मतगणना के दौरान लोग कहते सुने गए कि यह चुनाव सुंदरानी बनाम परवानी था. देखने-सुनने में आया कि सुंदरानी के प्रति सिंधी समाज में गहरा आक्रोश है. हालांकि उनका विधायकी कार्यकाल निर्विवाद और साफ सुथरी छबि वाला बेदाग ही रहा. फिर भी खुद का विधानसभा चुनाव हारने और अब चेम्बर चुनाव की हार ने उनके राजनीतिक.तेजस की लौ कम तो कर ही दी है. इस चुनाव की हार ने उनके राजनीतिक विरोधियों को एक और कमजोरी हाथ धरा दी है. इसे भविष्यवाणी ही समझ लीजिए कि भाजपा, आरएसएस और कांग्रेस को भी अमर परवानी, श्रीचंद का विकल्प नजर आने लगे हैं! राजनीति में चूके हुए पर कोई दांव खेलता है भला!

इस चुनाव से भाजपा कुछ सबक सीखेगी कि नही, कह नही सकता लेकिन जिस पैनल के सरंक्षक जिला भाजपा अध्यक्ष श्रीचंद सुंदरानी हों, अध्यक्ष पद के प्रत्याशी योगेश अग्रवाल खुद भाजपाई हों और चुनावी कैम्प में भाजपा नेता दिखाई दिए, एकता पैनल की हार ने उन्हें बहुत कुछ सोचने और सुधरने को मजबूर किया है. पहले नोटबंदी, फिर जीएसटी, फिर कोरोनाकाल, अब पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम और झपटटा मारती महंगाई ने व्यापार का जो बुरा हाल किया, खामियाजा एकता पैनल को भुगतना पड़ा. बीच चुनाव में जीएसटी नियमों को लेकर जब अमर पारवानी गुट ने रायपुर बंद करवाया तो योगेश अग्रवाल गुट इसे 'फलॉप' कराने में लगा रहा. वे सफल तो नही हो सके लेकिन आम व्यापारी इस दिमागी.जल्क का शिकार हो गया कि योगेश जीएसटी का नैतिक विरोध नही कर सकते क्योंकि वे मोदी सरकार के समर्थक हैं!



बेचारी कांग्रेस तो अभी सत्ता में नई-नवेली है, चेम्बर को साधने के क्या फायदे हैं, इसे सीखने में अभी वक्त लग सकता है. फिलवक्त इस चुनाव से दूरी बनाकर पार्टी ने ठीक ही किया! सरकार में कानाफूसी है कि कन्हैया अग्रवाल सहित तीन-चार बड़े नेताओं ने हस्तक्षेप का आग्रह किया था लेकिन पार्टी के रणनीतिकारों को दूर बैठकर मजा लेना ही ज्यादा बेहतर लगा. नानक सलाह यह है कि योगेश अग्रवाल को हिम्मत नही हारनी चाहिए, बल्कि दोगुने उत्साह के साथ चेम्बर में विपक्ष के नेता के तौर पर चौकस निगाह रखनी होगी. आखिर प्रदेश के 6000 हजार से ज्यादा व्यापारियों ने उनके नेतृत्व पर भरोसा जताकर उन्हें वोट दिया है. प्रदेश में भी पैनल के ढेरों प्रतिनिधि जीतकर आए हैं. ये सब योगेश की ताकत हैं!

चेम्बर चुनाव अपनी ही रची राजनीति के प्रचलित मुहावरे को बदलता दिखा. यह सिर्फ हर तीन बरस में होने वाला सत्ता-संग्राम मात्र नहीं है, तमाम अकुलाहटों की तार्किक परिणति की शुरुआत भी यहीं से हुई है. इस चुनाव ने दोनों को सबक दिए हैं. जो इन पर अमल करेगा, अगला चुनाव उसी का होगा. चरमराती अर्थव्यवस्था से व्यापारी जिस तरह हताश है या उसकी आर्थिक कमर टूटी है, उसे दुरूस्त करने की जिम्मेदारी दोनों ही पैनल पर है. एकता पैनल ने चुनाव में ई-शापिंग शुरू करने का वादा किया था, चेम्बर की नई टीम को चाहिए कि वह दुचित्तापन दिखाए बगैर इसे आगे बढ़ाए ताकि व्यापारी और राज्य, दोनों का भला हो सके. कोई भी मांगलिक कार्य कलश के उपर दीया जलाने के बाद ही होता है. व्यापारियों ने जो कलश अमर परवानी और टीम को सौंपा है, उसके उपर दीया जल रहा है. गीत बजने दीजिए : मंगल..मंगल..मंगल..मंगल हो!

ना हारा है इश्क, ना दुनिया थकी है : दीया जल रहा है, हवा चल रही है.


( लेखक दैनिक आज की जनधारा समाचार-पत्र के संपादक हैं )