प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- कोरोना संकट से भारी समाधान

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- कोरोना संकट से भारी समाधान

सुभाष मिश्र

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर 9 मिनट तक घर की बत्ती बंद कर, की गई रौशनी से भारत की आत्मा के जागरण की अभिव्यक्ति कितनी हो पाई, ये आने वाला समय बतायेगा? फिलहाल हम इस बात पर गौरवान्वित हो रहे हैं कि सिकंदर को भी भारत से मात खानी पड़ी थी। विदेशी महामृत्युजंय का जाप कर रहे हैं ताकि वे कोरोना से बच सकें। इस लॉकडाउन समय से हमारे बहुत से लोगों को यह दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ है कि अमेरिका अग्रणी देश नहीं है। चीन हमारी तरह विश्व कल्याण, वसुधैव कुटुंबकम की नहीं सोच सकता। यूरोप के लोग हमसे कम शिक्षित हैं। भारतीयों की प्रतिरोधक क्षमता पूरे विश्व से ज्यादा है, ऐसी बहुत सी बातों का ज्ञान हमें ताली बजाते हुए, स्वयं द्वारा निर्मित अंधेरे को मोमबत्ती, दीया और मोबाईल की रौशनी हटाने से हुआ है।

हमें रहमानी कीड़ा और रामबाण की नई व्याख्या मिली है। अपने-अपने घरों से 9 मिनट तक निकले अलौकिक प्रकाश में हमने सामूहिकता, सहभागिता, सावधानी, सुरक्षा, स्वास्थ्य, सेवा, सहायता, समाधान के गुर सीखने के संकल्प को लेकर, कोरोना के खिलाफ कार्यवाही की है ताकि वो अब हमारे आसपास न फटके। जिस दिन हमने ताली बजाई थी, उस दिन देश में कोरोना के 471 मरीज थे और 4 मृत्यु हुई थी, आज उनकी संख्या बढ़कर 3378 हो गई है और 77 लोगों की मृत्यु हुई है।

मीडिया के जरिये हमने अपना पूरा ध्यान तबलीगी जमात के उन बेवकूफों पर केंद्रित कर दिया है जो कथित रूप से मानव बम बनकर अपने को बचाते हुए बाकी को कोरोना से मारना चाहते हैं। शायद उन्हें ये आत्मज्ञान हो गया है कि हम ना मरिहैं, मरिहै जग सारा। मोदीजी के आह्वान पर दीए की लौ से उर्जित नये ज्ञान के प्रकाश में हम उन लाखों लोगों को भूल गये जो दिल्ली, मुंबई सहित अलग-अलग शहरों से पलायन करके निकले थे और जिन्हे बीच रास्ते में क्वारेंटिन कर लिया गया। उनके क्या हाल-चाल है? उन्हें ठीक से खाने मिल रहा है कि नही? मीडिया से उनकी खबर गायब हो गई, इस पर हम ने सोचा ही नहीं।

अपने गांव, कस्बे में बेरोजगारी की मार झेलने की बजाय रोजगार और रोजी रोटी की तलाश में अलग-अलग शहरों में पलायन करने वाले और कोरोना लाकडाउन के कारण काम धंधे और रहने को जगह से बेदखली की वजह से, घर वापस लौटने की चाह रखने वालों का परिवार कैसा है, वे कैसे हैं? आगे उनका क्या होगा! क्या इन्हें काम पर वापस रखा जायेगा कि नहीं? ये सारी बातें सोचने की फुर्सत किसके पास है। हमारी सरकार ने बहुत से उपाय किये हैं, पर क्या वे उपाय पर्याप्त हैं। क्या भविष्य में इन उपायों और निर्णयों से लोगों की जिंदगी आसान होगी। हम गौरवान्वित हो सकते हैं कि अमेरिका, इटली, स्पेन, ब्रिटेन, ईरान, आस्ट्रेलिया जैसे देशों की तुलना में हमारे देश में कोरोना संक्रमित और मरने वालों की संख्या बहुत कम है।

दुनिया के 205 देश इस महामारी की चपेट में है जिनमें 12 लाख संक्रमित है और अब तक 59 हजार से ज्यादा मौते हो चुकी हैं. अमेरिका, इटनी, स्पेन में जहां मरने वालों की संख्या दस हजार का आंकड़ा पार कर चुकी है, वहीं हमारे यहां केवल 2900 लोग संक्रमित पाये गये हैं और 77 लोगों की ही मौत हुई है। अमेरिका की स्वास्थ्य सेवाएं हमसे फिसड्डी हैं तभी तो वो अपने यहां होने वाली मौतों को नहीं रोक पा रहा है, उल्टे हमसे मदद मांग रहा है। भारत में कोविड 19 के पहले मामले की पुष्टि 29 जनवरी 2020 हुई। अगर हमारी सरकार मार्च के दूसरे सप्ताह में हरकत में आई और फिर बड़े कदम उठाये गय। 18 जनवरी 2020 को हवाई अड्डों पर यात्रियों की स्क्रीनिंग शुरू हुई। 18 जनवरी से 23 मार्च के बीच 15 लाख लोग बाहर से भारत आये। 22 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक दिन का जनता कर्फू का ऐलान किया फिर 24 मार्च से पूरे प्रदेश में 21 दिन का लाकडाउन। तब से अब तक देश लॉकडाउन में है।

अब जरा कोरोना से सर्वाधिक प्रभावित इन देशों के जनजीवन और हालात की बात करें तो इन देशों में हमारे देश की तुलना में कोरोना टेस्ट हो रहे हैं। अमेरिका में प्रतिदिन एक लाख कोरोना की टेस्टिंग हो रही है जबकि हमारे यहां अभी तक बमुश्किल 50 हजार लोगों का ही टेस्ट हो पाया है। बिना किसी टेस्ट के केवल सिस्टम्स के आधार पर हम नेगेटिव बने बैठे हैं। खुदा करे कि हम ऐसे ही निगेटिव बने रहें। लाकडाउन के समय कंपनियां, उद्योग धंधे अपने कर्मचारियों को नौकरी से ना निकालें, इसके लिए अमेरिका में कंपनियों को कर्मचारियों का तीन माह का वेतन दिया जा रहा है। अमेरिका में मेरे चार भांजे और उनके बहुत से यार दोस्त, रिश्तेदार रहते हैं। कोरोना महामारी और अमेरिका में होने वाली सर्वाधिक मौतें संक्रमण से बचाव के लिये लगाये गये प्रतिबंधों और किये गये उपायों के बारे में जब मैंने पूछा तो उन्होंने बताया कि वो हमारे यहां के प्रतिबंध और किये गये प्रयासों के ठीक उलट है।

अमेरिका में अमेरिकन एयरलाइंस को 0 फीसदी ब्याज पर 40-40 बिलियन डालर दिये गये हैं जिससे कि वे अपने खर्च चलाकर नियमित उड़ान का संचालन कर सकें। अधिकांश शहरों में होटल खरीदकर सिंगल रूम में टीवी फ्रिज के साथ क्वारटाईन किया गया है। कोरोना टेस्ट की ऐसी मशीन तैयार की गई है जो कोरोना पाजिटिव की रिपोर्ट तीन मिनट में और नेगेटिव की रिपोर्ट एक घंटे में दे सके। पहले यह अवधि एक घंटा और 24 घंटे थी। कार बनाने वाली कंपनियों को वेंटिलेटर बनाने तथा थ्री एम कंपनी को मास्क बनाने की जिम्मेदारी दी गई है। लोगों को रोजमर्रा की जरूरतों का सामान आसानी से मिल सके, इसके लिये डिलेवरी सिस्टम को मजबूत बनाकर रखा गया है। दूध, दवाई, सब्जी, खाना की डिलेवरी आसानी से की जा रही है।

होटलों से खाना पैक करके फूड डिपार्टमेंट की देख—रेख में समझाईश के साथ सप्लाई किया जा रहा है। गार्डन आदि जगहों पर लोग मार्निग वाकिंग कर सकें, इसके लिये 6 फीट की दूरी पर दो-दो लोगों साथ-साथ घुमने की अनुमति है। स्कूलों को बंद नहीं किया गया है जो स्कूल नहीं आ सकते, उनके लिये आनलाईन स्कूल तथा कामकाजी माता-पिता अपने छोटे बच्चों को छोड़कर काम पर जा सके इसकी व्यवस्था की गई है। बहुत से लोग एक साथ बात कर सकें, इसके लिये ऐसा साफ्टवेयर तैयार किया गया है। समय की मांग को देखते हुये टेक्नालाजी से बदलाव किया गया है. कुछ स्थानों पर ड्रोन से सामान की सप्लाई की जा रही है. अमेजान आदि कंपनी इस समझाईश के साथ सामान डिलेवर कर रही है कि दो घंटे तक ही कोरोना वायरस खड्डे, बाक्स में जीवित रह सकता है इसलिये डिलेवरी के दो घंटे बाद ही डिलेवर सामान घर के बाहर से उठाकर ले जाये।

सभी लोगों को मास्क पहनकर ही घुमने फिरने कहा गया है और लोग इसका पालन कर रहे हैं। सरकार ने आपातकाल के लिए अपने बजट की बड़ी राशि दो ट्रिलियन डालर यानी 140 लाख करोड़ का, और हमारी सरकार ने 1.76 लाख करोड़ का प्रावधान किया है। अकेले बिल गेटस ने 100 मिलियन डालर यानी 8 हजार करोड़ रुपये दान दिये हैं। इसी तरह अन्य लोगों की कोरोना संकट के लिये खुले हाथों से दान दे रहे हैं। अमेरिका सरकार द्वारा हर नागरिक को 12 सौ डालर प्रतिमाह व्यय के लिये इस माह चेक दिए गए हैं। आम नागरिकों से कोरोना की कोई भी जानकारी छिपाई नहीं जा रही है। अपने-अपने घरों में रहकर काम करने वाले लोग भी अपने परिवार से सोशल डिस्टेसिंग बनाये हुए हैं। सब अपने-अपने कमरों में अलग-अलग रहते हैं।

 कोरोना को लेकर किसी प्रकार का कोई पैनिक नहीं है, लोगों को शिक्षत और जागरूक बनाकर कोरोना की जंग से लड़ने के लिये तैयार किया गया है। चीन जहां के बुहान से कोविड 19 नाम की बीमारी दुनिया के अन्य देशों में फैली, वहां पर भी लोगों का आम जीवन सामान्य है। चीन में अब तक 61.554 लोग संक्रमित हुए जिनमें से 3312 की मौत हुई। वहां ट्रेनों की आवाजाही शुरू हो गई है। लोग अपने—अपने दफ्तरों में बैठकर काम कर रहे हैं। मेरे भांजे प्रशांत मिश्रा, जो अमेरिका में रहते हुये चीन में भी अपनी कंपनी संचालित करते हैं, ने बताया कि उसकी कंपनी का आफिस पुराने दिनों की तरह ही चायना में संचालित हो रहा है। लोग जरूरी ऐतिहायत बरत रहे हैं।

आस्ट्रेलिया के सिडनी में रहने वाली मेरी छोटी बेटी सुरभि ने पूछने पर उसने बताया कि आस्ट्रेलिया में लोग बेरोजगार न हों और कंपनियां उन्हें काम से ना निकालें, इसके लिये सरकार, कंपनी मालिक को अपने कर्मचारियों के वेतन की 75 फीसदी राशि अपनी ओर से दे रही है. 25 फीसदी राशि मालिक को देना है. रोजमर्रा की जरूरतों की सभी दुकानें खुली हुई हैं। रेस्टोरेंट खुले हैं पर वहां से केवल खाना की डिलेवरी हो रही है, आप वहां बैठकर खा नहीं सकते। स्कूल और डेकयर खुले हैं। पेरेंट्स अपने बच्चों को छोड़कर अपने काम पर जा सकते हैं। गोसरी स्टोर में बुर्जुग लोगों के लिये सुबह 7 से 8 बजे सामान खरीदने की व्यवस्था की गई है। सभी के लिये सामान खरीदी का समय निर्धारित है ताकि अनावश्यक भीड़ ना हो।

लोग जरूरत से अधिक सामाग्री एकत्रित न करें, इसके लिए सामान खरीदी की लिमिट तय की गई है जो कि रेस्टोरेंट, दुकान आदि खुले हैं, वहां यह सुनिश्चित किया जाता है कि आवश्यक भीड़ ना हो। पूरे सिस्टम को इस तरह से नियोजित किया गया है कि लोग परेशान न हों। जो भी लाकडाउन किया जाता है, वह स्टेप बाई स्टेप लोगों को बताकर, उनकी जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाता है. यहां के नागरिक भी सरकार को पूरा सहयोग कर रहे हैं। बगीचे, जिम खुले हुए हैं ताकि लोग एक्सासाइज कर सकें पर दो से ज्यादा लोग एक साथ न जायें, इसका पालन करने कहा गया है। आस्ट्रेलिया सरकार ने टूरिस्टों से साफ कह दिया है कि वे अपने-अपने देश लौट जायें, हम अपने नागरिकों का ध्यान रख सकते हैं, टूरिस्टों का नहीं।

बाहर से आने वाले सभी लोगों को सरकार अलग-अलग होटलों में 14 दिन के लिये क्वारंटीन कर रही है। स्वास्थ परीक्षण की सुविधा बहुत बढिय़ा है। सरकारी तंत्र बहुत ही विनम्रता और सुस्तैदी से काम करता है। ये सारी जानकारी देने के पीछे मकसद यह है कि सरकार चाहे तो सही फैसले लेकर कोरोना की समस्या से वैज्ञानिक तरीके से निपट सकती है, किन्तु हमारे देश में ऐसा हालात पैदा कर दिए गये हैं कि समस्या से ज्यादा जटिल समाधान हो गया है। कोरोना से बचाव के नाम पर सारी दुकानें, सारे संस्थान बंद करके लोगों को घरों में बंद कर देने से ना तो आर्थिक हालात सुधरेंगे ना ही कोरोना। भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी आज बताया है कि कोरोना का वायरस हवा में नहीं फैलता है। डब्ल्यूएचओ ने भी साफ शब्दों में कहा है कि केवल क्वारेटीन होना या लाकडाउन करना ही इसका हल नहीं है। ऐसे लोग जो घर में बिना किसी काम के बैठे हैं, किसान जो अपनी खेत में लगी फसल तक नहीं ला पा रहे हैं, तिहाड़ी मजदूर जो काम कर नहीं जा पा रहे हैं, आखिर कितने दिनों तक अपने घर की चार दीवारी में बंद रहेंगे और ताली बजायेंगे, दीया जलायेंगे।

धीरे-धीरे सर्वहारा वर्ग के लोगों के सब्र का बांध टूटेगा, फिर एक तरह की अराजक स्थिति निर्मित हो सकती है। सरकार अमेरिका, आस्ट्रेलिया की तरह यह सुनिश्चित करे कि प्रायवेट कंपनियों, संस्थाओं में काम करने वाले लोगों को काम में नहीं हटाया जायेगा। सरकार कंपनियों, संस्थाओं को आर्थिक मदद करेगी। क्यों ना हम इन देशों से जिनके यहां हमारे देश भी ज्यादा कोरोना का प्रभाव है, हम उनसे जानकारी लेकर स्टेप बाई स्टेप ही सही, वो कदम उठायें जिससे आम जिंदगी सामान्य हो सके। कर्फू जैसे हालात करके हम इस महामारी से निपट भी लें तो आने वाले दिन और अधिक भयावह और खतरनाक हो सकते हैं।

ऐसे समय अवतार सिंह पाश की कविता याद आती है :
मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाये पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
सबसे खतरनाक नहीं होता।
सबसे खतरनाक होता है
मुर्दा शांति से मर जाना, तड़प का ना होना
सब कुछ सहन कर जाना
सबसे खतरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना.