breaking news New

राजनीति: आर्थिक चुनौतियों का साल

राजनीति: आर्थिक चुनौतियों का साल

जयंतीलाल भंडारी

नए वर्ष 2021 को बीते वर्ष से कोविड-19 की आर्थिक चुनौतियां विरासत में मिली हैं। फिर भी जिस तरह सरकार ने गुजरे साल में आत्मनिर्भर भारत अभियान के माध्यम से कोविड-19 से उत्पन्न चुनौतियों का मुकाबला किया, उससे ढहती हुई अर्थव्यवस्था को बचा पाने में कुछ तो कामयाबी मिली है।

आने वाले साल में मुश्किलें कम नहीं हैं और अर्थव्यवस्था को पटरी लाने के लिए स्पष्ट और ठोस नीतियों की जरूरत है। बीते वर्ष पर नजर डालें तो पाते हैं कि फरवरी के बाद जैसे-जैसे देश पर कोरोना महामारी का साया गहराता गया, वैसे-वैसे देश में अकल्पनीय आर्थिक निराशा और बेरोजगारी का दौर भी बढ़ता गया।

कोरोना संकट से उद्योग कारोबार की बढ़ती मुश्किलों के मद्देनजर वित्त मंत्रालय ने 19 फरवरी को कोरोना को प्राकृतिक आपदा का एलान कर दिया था। चूंकि भारतीय दवा उद्योग, वाहन उद्योग, रसायन उद्योग, खिलौना कारोबार और बिजली व इलैक्ट्रॉनिक्स कारोबार प्रमुख रूप से चीन से आयातित कच्चे माल व वस्तुओं पर आधारित रहे हैं, ऐसे में इनकी आपूर्ति रुकने से ये उद्योग-कारोबार गंभीर संकट में फंस गए और इनमें से ज्यादातर के सामने बंद होने की नौबत खड़ी हो गई।

कई तो बंद भी हो गए। खासतौर से जो सूक्ष्म, लघु और मझौले उद्योग (एमएसएमई) पहले से ही मुश्किलों का सामना रहे थे, कोरोना काल में पूर्णबंदी के कारण इन उद्यमियों के सामने गंभीर संकट खड़े हो गए। उत्पादन बंद हो गया, कर्मचारियों को वेतन से लेकर रोजमर्रा के खर्च तक के लाले पड़ गए। लोगों के सामने नौकरी और रोजगार बचाना बड़ी चुनौती बन गई।

खासतौर से देश के करीब पैंतालीस करोड़ कार्यबल में से असंगठित क्षेत्र के नब्बे फीसद श्रमिकों और कर्मचारियों का काम बंद हो गया। लाखों श्रमिक शहर छोड़ कर अपने-अपने गांवों को लौट गए। यह वह वर्ग था जिसके पास सामाजिक सुरक्षा की कोई छतरी नहीं थी।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आइएलओ) की रिपोर्ट में कहा गया है कि कोरोना प्रकोप और पूर्णबंदी से भारत के असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के रोजगार पर बहुत ही बुरा असर पड़ा है। काम-धंधे बंद हो जाने के कारण भारत में लोगों की आमदनी घटी और रोजगार संबंधी मुश्किलें भी बढ़ीं और इस वजह से भारत में एक बड़ी आबादी की खपत का स्तर गरीबी रेखा के निकट पहुंच गया। एक मोटा अनुमान यह है कि कोविड-19 महामारी के कारण भारत की गरीब आबादी में करीब एक करोड़ बीस लाख लोग और जुड़ गए हैं।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इस साल के वैश्विक भूख, कुपोषण और मानव विकास सूचकांक से संबंधित रिपोर्टों में भारत की स्थिति संतोषप्रद नहीं बताई गई है। वैश्विक भूख सूचकांक (जीएचआइ) 2020 में एक सौ सात देशों की सूची में भारत चौरानवे वें स्थान पर है। पिछले साल एक सौ सत्रह देशों की सूची में भारत का स्थान एक सौ दो वां था।

यह चिंताजनक है कि देश में खाद्य उपलब्धता और दो तिहाई आबादी के राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के दायरे में आने के बावजूद देश के करोड़ों लोग भूख और कुपोषण की समस्या से जूझ रहे हैं। विश्व बैंक द्वारा तैयार किए गए एक चौहत्तर देशों के वार्षिक मानव पूंजी सूचकांक में भारत का स्थान एक सौ सोलह वां रहा। यह सूचकांक मानव पूंजी के प्रमुख घटकों स्वास्थ्य, जीवन प्रत्याशा, स्कूल में नामांकन और कुपोषण पर आधारित है।

कोविड-19 के संकट से चरमराती देश की अर्थव्यवस्था के लिए आत्मनिर्भर अभियान के तहत वर्ष 2020 में मार्च से नवंबर के बीच सरकार ने एक के बाद एक कुल 29.87 लाख करोड़ की राहत पैकेजों का एलान किया।

इसमें आत्मनिर्भर भारत अभियान- एक के तहत 11,02,650 करोड़ रुपए, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण पैकेज के तहत 1,92,800 करोड़ रुपए, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत 82911 करोड़ रुपए, आत्मनिर्भर भारत अभियान- दो के तहत 73,000 करोड़ रुपए, आरबीआइ के उपायों से राहत के तहत 12,71,200 करोड़ रुपए और आत्मनिर्भर भारत अभियान- तीन के तहत 2.65 लाख करोड़ की राहत शामिल थे।

तीसरे आर्थिक पैकेज में दो तरह की राहतें थीं। एक, दस उद्योग क्षेत्रों के लिए 1.46 लाख करोड़ रुपए की उत्पादन संबंधी प्रोत्साहन (पीएलआइ) योजना और दूसरी, अर्थव्यवस्था को गतिशील करने के लिए रोजगार सृजन, ऋण गारंटी समर्थन स्वास्थ्य क्षेत्र के विकास, रियल एस्टेट कंपनियों को कर राहत, ढांचागत क्षेत्र में पूंजी निवेश की सरलता, किसानों के लिए उवर्रक सब्सिडी, ग्रामीण विकास तथा निर्यात सेक्टर को राहत देने के 1.19 लाख करोड़ रुपए के लिए लाभपूर्ण प्रावधान।

इन विभिन्न राहतों से तेजी से गिरती हुई अर्थव्यवस्था को बल तो मिला है। यह बात महत्त्वपूर्ण रही कि जून के बाद अर्थव्यवस्था को धीरे-धीरे खोलने की रणनीति के साथ राजकोषीय और नीतिगत कदमों का अर्थव्यवस्था पर अनुकूल असर पड़ा।

हालांकि देश महामारी से नहीं उबरा है, लेकिन अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत दिखने लगे हैं। कोरोना काल में सरकार को उन श्रम, कृषि, कारोबार और अन्य सुधारों को आगे बढ़ाने का भी मौका मिल गया जो दशकों से लंबित थे।

यदि हम दिसंबर तक के विभिन्न औद्योगिक एवं सेवा क्षेत्र के आंकड़ों का मूल्यांकन करें, तो पाते हैं कि पूर्णबंदी की चुनौतियों के बाद दिसंबर तक देश के वाहन उद्योग, बिजली क्षेत्र, रेलवे, माल ढुलाई आदि में सुधार हुआ है। इतना ही नहीं दैनिक उपयोग की उपभोक्ता वस्तुओं, सूचना प्रौद्योगिकी, वाहन कलपुर्जा, दवा उद्योग, इस्पात और सीमेंट आदि क्षेत्रों का प्रदर्शन उम्मीदों से बेहतर दिखा।

सूचना तकनीक (आइटी) क्षेत्र की बड़ी कंपनियों की ओर से भी सकारात्मक अनुमान देखने को मिले। सेवा कर (जीएसटी) संग्रह दिसंबर में बढ़ा हुआ दिखाई दिया। शेयर बाजार में भी तेजी का रुख रहा। इसी तरह देश का विदेशी मुद्रा भंडार भी दिसंबर में 581 अरब डॉलर से भी ऊपर निकल गया।

इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले साल देश के सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) में आई भारी गिरावट को पाटने में विनिर्माण क्षेत्र ने बड़ा सहारा दिया। पहली तिमाही में विनिर्माण क्षेत्र में 39.3 फीसद की गिरावट आई थी, जबकि दूसरी तिमाही में इसमें 0.6 फीसद की वृद्घि दर्ज की गई। कृषि एवं सहायक गतिविधियों की विकास दर दूसरी तिमाही के दौरान आशाजनक रही।

खासतौर से खरीफ उत्पादन से संबंधित अनुमान अच्छे संकेत देने वाले रहे। वर्ष 2020-21 में खाद्यान्न उत्पादन 14.45 करोड़ टन के रिकॉर्ड स्तर छूने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष 2019-20 के उत्पादन से 0.80 फीसद अधिक है। दलहन उत्पादन करीब 93.1 लाख टन अनुमानित है, जो 2019-20 की तुलना में करीब इक्कीस फीसद अधिक है। इसी तरह तिलहन का उत्पादन 2.57 करोड़ टन अनुमानित है, जो 2019-20 की तुलना में 15.28 फीसद अधिक है।

एशियाई विकास बैंक सहित विभिन्न वैश्विक संगठनों के मुताबिक कोविड-19 से जंग में भारत के प्रयासों से देश की अर्थव्यवस्था पर जो भी प्रभाव पड़ा, वह अन्य देशों की तुलना में कम ही रहा। कोरोना महामारी के बीच भारत ने आपदा को अवसर में भी बदला है।

ऐसे में वर्ष 2021 की तस्वीर उम्मीदों भरी है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2020-21 में भारत की जीडीपी में गिरावट तो आएगी, लेकिन भारत ने कोरोना संकट से निपटने के लिए जिस तेजी से सुधार के कदम उठाए हैं, उससे आगामी वित्तीय वर्ष में भारत 8.8 फीसद की विकास दर हासिल करने की संभावनाओं वाला देश बन गया है। बस जरूरत है तो इस बात की कि सरकार द्वारा घोषित आर्थिक पैकेजों पर पूरी ईमानदारी के साथ अमल हो और जरूरतमंदों तक इनका लाभ पहुंचे।