व्यापार को चमकाने के लिए ‘ठाकुर’ को ’बिजनेस पार्टनर’ बनाने की निराली परंपरा

व्यापार को चमकाने के लिए ‘ठाकुर’ को ’बिजनेस पार्टनर’ बनाने की निराली परंपरा


आजकीजनधारा मथुरा 25 मई  ।   भक्तों द्वारा ब्रज के मंदिरों में लम्बे समय से अपनाई जा रही है।सामान्यत: किसी भी प्रकार का व्यापार चलाने के लिए व्यापारियों द्वारा ठाकुर की विशेष आराधना की जाती है तथा व्यापार में लाभ मिलने पर विशेष सेवा पूजा मंदिर के सेवायत आचार्य के माध्यम से कराई जाती है। इस सेवा पूजा में एक दिन की सेवा के खर्च से लेकर एक साल या एक से अधिक साल तक की विशेष सेवा शामिल होती हैं।

आटोमोबाइल के स्पेयर पार्ट बनाने वाली कम्पनी के मालिक चांद सहगल ने बांकेबिहारी मंदिर वृन्दावन के प्रबंधक प्रशासन मुनीश शर्मा को दो करोड़ 30 लाख रूपये का चेक सौंपा। शर्मा ने बताया कि उद्योगपति पिछले 15 साल से मंदिर को चेक देते चले आ रहे है। अप्रैल में दिया जानेवाला चेक इस बार मई में इसलिए दिया गया कि लाकडाउन के कारण आवागमन में प्रतिबंध था।उन्होंने बताया कि सहगल हर माह बांकेबिहारी के दर्शन करने के लिए भी आते हैं। इस बार यह पहला मौका था जब सहगल ने चेक तो दे दिया पर लाकडाउन में मंदिर बंद होने के कारण वे दर्शन न कर सके।

सहगल ने लाडली मंदिर बरसाना को भी 21 लाख का चेक दिया है जिसकी पुष्टि मंदिर के रिसीवर कृष्ण बिहारी गोस्वामी ने की है।बांकेबिहारी मंदिर की प्रबंध समिति के पूर्व अध्यक्ष सेवायत आचार्य आनन्द किशोर गोस्वामी ने बताया कि व्यापार को चलाने के लिए ठाकुर का आशीर्वाद प्राप्त करना कोई नई परंपरा नही है। जहां अधिकांश लोग स्वयं ठाकुर की विभिन्न प्रकार सेवा कर आशीर्वाद लेते हैं वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ठाकुर को अपने व्यवसाय का पार्टनर बनाकर उतने प्रतिशत राशि हर साल ठाकुर के खाते में या तो डाल देते हैं या ठाकुर की गुल्लक में डालते हैं। दोनो ही प्रकार की सेवा में भाव होता है ‘तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा।’गोस्वामी ने बताया कि ठाकुर की स्वयं सेवा करनेवाले लोग देहरी पूजन, संत सेवा, फूल बंगला सेवा , गोसेवा आदि मंदिर के सेवायत आचार्य के माध्यम से कराते हैं ।

बिहारी जी मंदिर के सेवायत आचार्य ज्ञानेन्द्र किशोर गोस्वामी का कहना है कि भक्त सेवायत आचार्य की मदद इसलिए लेता है कि उसे यह पता नही होता कि किस प्रकार की सेवा से ठाकुर प्रसन्न होंगे।उन्होंने उदाहरण दिया कि बालभोग सेवा में अनजान व्यक्ति पेड़े का डिब्बा लेकर प्रसाद चढ़ाने आ जाता है जब कि सेवायत आचार्य बालभोग में माखन मिश्री का भोग लगवाते है क्योंकि ठाकुर को माखन मिश्री पसन्द है। कुछ भक्त अपने व्यापार में ठाकुर को एक या दो प्रतिशत का भागीदार बना लेते हैं और वह हर साल यह राशि ठाकुर के एकाउन्ट में डाल देते हैं।दानघाटी मंदिर गोवर्धन के सेवायत आचार्य मथुरा प्रसाद कौशिक ने बताया कि इसके अलावा एक सेवा और होती है जिसमें भक्त ठाकुर केा अर्पित किये गये धन का प्रचार प्रसार नही चाहता है इसीलिए वह धनराशि को गुल्लक में डाल देता है।

कभी कभी कुछ महिलाएं तो जेवर भी गुल्लक में डाल देती हैं।वृन्दावन के सप्त देवालयों में मशहूर राधारमण मंदिर के सेवायत आचार्य पद्मनाभ गोस्वामी ने बताया कि इन सेवाओं के अतिरिक्त एक सेवा और होती है जो राधारमण मंदिर में लम्बे समय से चली आ रही है । इसमें भक्त के द्वारा एक निश्चित धनराशि मंदिर के ‘कार्पस फंड’ में जमा कर दी जाती है। बैंक में जमा की गई इस राशि के व्याज से प्राप्त धनराशि भक्त की भावना के अनुरूप खर्च की जाती है।उधर गीता आश्रम वृन्दावन के महन्त महामंडलेश्वर डा अवशेष स्वामी ने बताया कि चाहे मंदिर की सेवा हो या मंदिर बनाने का दान अथवा विभिन्न आश्रमों में चलनेवाला अन्न क्षेत्र या वस्त्र दान जैसी अनेकों सेवा भक्तों के सहयोग से ही चलती हैं।

जहां कुछ लोग सेवा में सहयोग करने के साथ अपना प्रचार भी चाहते हैं वहीं अन्य ऐसे भी लोग हैं जो प्रचार से कोसों दूर रहकर घट घट में भगवान के दर्शन करते है। सामान्यतया घट घट में भगवान के दर्शन करनेवालों को ठाकुर का आशीर्वाद स्वतः मिल जाता है।वृज के मंदिरों एवं आश्रमों में इस प्रकार की सेवा करनेवालों की संख्या अधिक होती है लेकिन प्रचार से दूर रहने के कारण उनकी जानकारी सामान्यजन को नही हो पाती है। उनका कहना था कि एक बात निश्चित है कि जो व्यक्ति अपनी भावमय सेवा से ठाकुर को प्रसन्न कर लेता है उसकी दुनिया ही बदल जाती है।