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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- पब्लिक को किसी पैथी से ज्यादा सिम्पैथी की जरूरत

 प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- पब्लिक को किसी पैथी से ज्यादा सिम्पैथी की जरूरत

-सुभाष मिश्र
बाबा रामदेव जैसे लोगों के कारण जानबूझकर खड़े किए ऐलोपैथी विरुद्ध आयुर्वेदिक, योग विवाद के बीच हमें ठंडे दिमाग से यह सोचना होगा की हमारी स्वास्थ्य सेवाओं की मौजूदा स्थिति क्या है? हमने कोरोना महामारी के दौरान जो लाचारी, असहायता और रूदन के दृश्य देखे हैं उसमें न ऐलोपैथी काम आ रही थी, ना होम्योपैथील ना आयुर्वेद। यदि कुछ काम आ रही थी तो वह थी सिम्पैथी। सुबह से श्रद्धांजलियों का जो सिलसिला शुरू होता था वह रात तक गहरे अवसाद में तब्दील होकर अपने जिंदा होने के सबूत टटोलता रहता था। हर रात की सुबह अपने बचे होने और अपने जान-पहचान, रिश्तेदारों की कुशलक्षेम पूछने और कोरोना पॉजिटिव निकलने पर अस्पतालों में उपचार के लिए भर्ती कराने की असहायता से उपजी शर्मिंदगी से बीतता। कितने परिचितों ने अस्पताल में बेड के लिए, कितनों ने आक्सीजन के लिए और कितनों ने रेमडेसिविर इजेंक्शन के लिए गुहार की। दूसरी ओर से कुछ नहीं कर पाने की कातर ध्वनि में देखता हूं, बताता है के स्वर में का जवाब दिया गया।

मारे भय के आस-पड़ोस, जान-पहचान यहां तक की घर के लोगों से भी कोरोना वायरस के भय से सम्मानजनक दूरी बनाकर रखने में ही भलाई समझी गई। जो लोग होम आईसोलेशन में रहकर स्वस्थ हो गये, वे अपने आपको खुश किस्मत समझ रहे हैं। जो अस्पताल गये उन्हें मालूम हुआ की जीते जी नरक भुगतना किसे कहते हैं।
कोरोना की दूसरी लहर में सरकार की नाकामी और बदनामी के बीच भाजपा के साथ गलबहियां करने वाले बाबा रामदेव ने कोरोना से होने वाली मौत का ठीकरा एलोपैथ पद्धति की प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टरों के सिर फोड़ दिया। बाबा रामदेव ने यह आरोप अचानक नहीं लगा, इसके पीछे उनकी एक सोची समझी रणनीति है।
कुछ माह पहले आयुर्वेद पद्धति से इलाज करने वाले लोगों को शल्य चिकित्सा करने की बात कही गई थी। इसे लेकर आईएमए के पदाधिकारियों ने विरोध दर्ज करवाया था और देशभर में काला दिवस मनाया। बाबा रामदेव ने योग और आयुर्वेद को आपस में एक करके एलोपैथी डाक्टरों की साख कम करने की कोशिश जरूर की है।
हमारे देश में अभी भी चाहे मेडिकल कालेज में प्रवेश का मामला हो या आयुर्वेदिक दोनों के लिए प्रवेश परीक्षा होती है। दोनों ही कालेजो में प्रतिभाशाली छात्र प्रवेश लेते है। चूंकि हमारे देश में मेडिकल कालेजों में सीटें कम है ऐसे में जो छात्र चिकित्सक बनने का सपना संजोते हैं, वे पहली प्राथमिकता मेडिकल कालेज की देते हैं फिर आयुवेदिक, डेंटल आदि का नंबर आता है। देश के 562 मेडिकल कालेज और 247 आयुर्वेदिक कालेज है। हर साल एमबीबीएस में 84649 छात्र-छात्रा डाक्टर बनने प्रवेश लेते हैं। पीजी कालेजों की संख्या मात्र 64 है। मेडिकल कालेज से एमबीबीएस करने वालों के लिए पीजी में इतनी कम सीटें होती है की वहां भी उन्हें गला काट स्पर्धा और भारी डोनेशन देना पड़ता है। डिग्रीधारी प्रशिक्षित डाक्टरों की कमी के चलते झोलाछाप डाक्टरों की देश में भरमार है। देश में अभी भी बड़े पैमाने पर बाबा रामदेव जैसे लोग मुखर होकर बिना किसी डिग्री, चिकित्स पढ़ाई-लिखाई के पढ़ी लिखी प्रोफेशनल जमात को गरिया रहे हैं। इस देश में जो जितना अज्ञानी, अनपढ़ है वह उतना ही ज्यादा वाचाल है।

गुरू हरिशंकर परसाई कहते हैं कि जब धर्म को धंधे से जोड़ लो तो उसे योग कहते हैं। च्च्गरीब आदमी न तो ऐलोपैथी से अच्छा होता है, न होमियोपैथी से, उसे तो ''सिम्पैथी (सहानुभूति) चाहिए। बाबा रामदेव और उनके नकली डिग्रीधारी चेले बालकृष्ण ने योग को जरिया बनाकर पंतजलि ब्रांड का करोड़ों अरबो का साम्राज्य स्थापित कर लिया। वे खुद कोई चिकित्सक नहीं है, आयुर्वेदाचार्य भी नहीं है, किन्तु विषर्यांतर करने के लिए कह रहे हैं कि देश आयुर्वेद का मजाक उड़ाना बर्दाश्त नहीं करेगा। यदि ऐलोपैथी में सर्जरी/लाइफ सेविंग ड्रग्स है तो शेष 98 फीसदी बीमारियों में स्थायी समाधान योग-आयुर्वेद में है।

बाबा रामदेव कुशल व्यापारी है। उन्हें मालूम है कि कब किस मंच पर, मीडिया से क्या बोलना है और कब पेटीकोट पहनकर भागना है। जब देश लचर स्वास्थ्य सेवाओं से जूझकर भगवान भरोसे असहाय सा बैठा हुआ है, तब आयुर्वेद-ऐलोपैथी का विवाद खड़ा करके मूल मुद्दों, विषयों से लोगों का ध्यान हटाना एक सुनियोजित चाल है। यह सही है कि हम अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा उपचार परंपरा से अनभिज्ञ है। हमारे देश में इस तरह से जितना शोध कार्य होना था वह नहीं हुआ। हमें अपने ज्ञान और उपचार तकनीक का जो डाक्यूमेंटेशन करना था वह नहीं कर पाये। हम अपनी वाचिक परंपरा में पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही जानकारी और अनुभवों को बौद्धिक संपदा के रूप में कापीराईट नहीं कर पाये।

हमारे देश में स्वास्थ सेवाओं और शोध कार्यों की उपेक्षा का नतीजा हम आज भुगत रहे हैं। देश में कुल 2449 प्रयोग शालाएं हैं जिनमें से आधी निजी खोज में है। हमारे यहां स्वास्थ संबंधी प्रारंभिक स्तर पर काम करने वाले डाक्टरों, नर्स और पैरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी है। हमने वर्ष 20-21 अपने सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का 1.8 प्रतिशत स्वास्थ सेवाओं पर खर्च किया। भारत में प्रति एक हजार लोगों पर 1.4 बेड, 1445 लोगों पर एक डाक्टर और प्रति 1000 लोगों पर 1.7 नर्स है। जिस अमेरिका के हम सपने देखते हैं वह अपनी जीडीपी का 16 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करता है, जापान, कानाडा, जर्मनी जैसे देश अपनी जीडीपी का 10 प्रतिशत खर्च करते हैं।

अभी हाल ही में ग्रामीण क्षेत्रों में जिस तेजी से कोरोना संक्रमण फैला है उसे देखते हुए सभी ने महसूस किया कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी आधुनिक तकनीक और स्वास्थ्य सुविधाओं से लैस अस्पतालों की जरूरत है। देश की कुल आबादी का 63 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण क्षेत्र में रहता है। हमारे देश में शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी जरूरी बुनियादी सुविधाओ की कमी की एक बड़ी वजह हमारी आबादी है। हम दुनिया में चीन के बाद दूसरे बड़े देश है जिसकी आबादी सर्वाधिक है। चीन ने तो अपनी आबादी को नियंत्रित करने के लिए वन चाईल्ड पालिसी लागू की थी, जिसे 2016 से खत्म करके दो बच्चे तक पैदा करने की अनुमति दी, अब इसे बदलकर अब तीन बच्चे पैदा करने की अनुमति दी है। हमारे देश में जिस तरह से आबादी नियंत्रण करने का परिवार नियोजन कार्यक्रम चलाया गया उसकी आलोचना ज्यादा हुई, सफलता कम मिली। हमारे देश में किसी भी कार्यक्रम, योजना की सफलता सबसे बड़ा रोड़ा हमारी आबादी है। कोरोना से निपटने टीकाकरण सबसे जरूरी है वह भी हम अपनी आबादी को उपलब्ध नहीं करा पा रहे हैं। यदि सब कुछ बाबा रामदेव के योग और उनकी बनाई कोरोनिल जैसी दवाईयों से ही ठीक हो जाता तो फिर हमें दूसरे देशों से वैक्सीन मांगने की जरूरत नहीं होती। योग और आयुर्वेद में विश्वास करना अलग बात है और बाबा लोगो के धंधेपानी को सपोर्ट करना दूसरी बात।