प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - कुछ कहा भी ना जाए और सहा भी ना जाए

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - कुछ कहा भी ना जाए और सहा भी ना जाए


सुभाष मिश्र

कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में हाल ही में हुए अध्ययन के अनुसार दोस्तों के साथ की गई गपशप तनाव घटाने का सबसे बेहतरीन जरिया है। जिन लोगों को बुढ़ापे में भी 5-6 दोस्तों का साथ होता है, उनमें तनाव, बैचेनी, चिड़चिड़ेपन, हृदयरोग और स्ट्रोक का खतरा पांच गुना तक कम हो जाता है। सवाल बुढ़ापे के तनाव का नहीं है, आज की जीवन पद्धति में कुछ तरह के तनाव हैं। यदि आप संवेदनशील हैं, आपकी सोच का दायरा कवि विनोद कुमार शुक्ल की तरह बढ़ा है तो आपको समूची दुनिया की चिंता होती है...घर में अन्न जल होगा कि नहीं की चिंता, पृथ्वी में कोई भूखा, घर में भूखा जैसा होगा..' उर्दू में एक कहावत है कि काजी जी क्यों दुबले हुए शहर के अंदेशे में।

कोरोना कालखंड में अवसाद की घटनाएं बढ़ रही हैं। सोशल डिस्टेसिंग के चलते समाज परिवार से दूरी के कारण, काम धंधा छूटने और ऐसी बहुत सी रिक्तियों की वजह से इस समय लोगों में अवसाद के लक्षण कुछ ज्यादा ही देखे जा रहे हैं। अवसाद का संबंध अनुभव से नहीं अनुभव की अतिकल्पना से होता है। कल्पना को व्यक्ति इस हद तक जीने लगता है कि वह यथार्थ और निजी अनुभव लगने लगती है। फिर इसमें भय जुडऩे लगता है। भय इस बीमारी की जड़ भी और उत्प्रेरक भी। कोरोना के भय ने सामान्य से सर्दी-बुखार वाले व्यक्ति को भी इस भय से भर दिया है कि उसे कोरोना है। अस्पतालों में इस भय के मरीज बढ़ने लगे हैं। डॉक्टरों के मना करने पर यह भय अवसाद में ले जाता है। देश में कोरोना के कारण अवसाद के मरीज बढ़े हैं। यह भय अवचेतन में सबसे करीब रहने वाले ईश्वर के प्रति आसक्ति या विरक्ति जगाती है।

सुप्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ. विनय कुमार के अनुसार, मानसिक रोगों को मोटे तौर पर दो वर्गों में बांटा जाता है- सायकोसिस और न्यूरोसिस, सायकोसिस के मरीज ये होते हैं जिनके व्यवहार तथा वास्तविकता के साथ संबंधों में असामान्य परिवर्तन दिखने लगता है। वे कई प्रकार के वहम और अवास्तविक संवेदनात्मक अनुभवों के शिकार हो जाते हैं। मनुष्य का मन समय और समाज में होने वाले परिवर्तनों से सीधे संबंध होता है इसलिए मानसिक रोगों के लक्षणों पर बाह्य प्रभाव भी साफ-साफ दिखते हैं।

सायकोसिस- समूह के रोगों का एक लक्षण है- हैल्यूसिनेशन। इसमें होता यह है कि कोई स्रोत या कारण नहीं हो तब भी इंद्रियां उसे अनुभव करती हैं। मसलन सामने कोई भी न हो तब भी कोई दिखता है। कहीं कोई नहीं बोल रहा हो तब भी आवाजें सुनाई देती हैं। हैल्यूसिनेरान नामक लक्षण से ग्रस्त मरीजों की दुनिया में ईश्वर की छबि दिखना या उसकी आवाज सुनना एक सामान्य सी बात है। मनोचिकित्सकीय अनुभवों के आधार पर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि अगर धर्म के आभासकूल से निरपेक्ष और वस्तुनिष्ठ होकर मानसिक जांच की जाए तो अधिकांश दावेदार सायकोसिस डिजार्डर के दायरे में आ जाएंगे।

यह एक डरावनी स्थिति है। अभी जो समय है उसमें स्थितियों के बिगड़ने की संभावना है, ऐसे में अवसाद एक विकट रोग की भांति सामने आएगा। प्रकट में सामान्य लगने वाली यह बीमारी अपने आप में जटिलता छिपाए हुए हैं। सवाल शहर के अंदेशों की चिंता की नही है, सवाल यहां उन लोगों की चिंता का है जिनके ऊपर हमारी सुरक्षा की जवाबदारी है। हाल ही में छत्तीसगढ़ पुलिस ने 'स्पंदन' अभियान की शुरुआत की है। यह अभियान मानसिक अवसाद और तनाव को दूर करने के लिए और वरिष्ठ अधिकारियों से बेहतर संबंधों को लेकर चलाया जा रहा है। छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार वर्ष 2018 से अब तक 60 पुलिस कर्मियों ने आत्महत्या की है. राज्य पुलिस, अर्द्ध सैनिक बल, भारत तिब्बत पुलिस के 8 जवान शामिल हैं। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के निर्देश पर पुलिस जवानों को मानसिक तनाव से बचाने के लिए स्पंदन अभियान का शुभारंभ किया गया।

पुलिस महानिदेशक डीएम अवस्थी द्वारा वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को जवानों के बीच जाकर समस्याएं सुलझाने और उनकी मानसिक दशा की स्थिति जानने के लिए कहा। डीएम अवस्थी कहते हैं- स्पंदन अभियान का मूल उद्देश्य है कि छत्तीसगढ़ पुलिस को एक भी जवान खोना नहीं है। संवाद से सभी समस्याओं का हल सम्भव है। आपकी समस्याएं जानने वरिष्ठ पुलिस अधिकारी आपके पास आएंगे और उन्हें हल करेंगे। आपका जीवन बहुमूल्य है। इसे बचाकर रखें क्योंकि घर में आपके माता-पिता, पत्नी-बच्चे आपका इंतजार करते हैं। ‘स्पंदन’ अभियान के तहत सभी दुर्गम इलाकों से लगे हुए कैम्पों में मनोविज्ञानी, म्यूजिकथेरेपी, योग शिक्षा, खेलकूद, पुस्तकालय की व्यवस्था की जा रही है ताकि पुलिस के जवान अपने अवसाद को दूर कर सकें। ‘स्पंदन’ अभियान को लेकर जारी निर्देश के अनुसार सभी सेनानी महीने में एक बार प्रत्येक कंपनी में रात्रि विश्राम करेंगे। पुलिस अधीक्षक भी सभी थानों और पुलिस लाइनों में भ्रमण कर जवानों की समस्याएं सुनेंगे। पुलिस मुख्यालय, रायपुर में भी पुलिस महानिदेशक की तरफ से जिला पुलिस बल और सशस्त्र बल के अधिकारियों और कर्मचारियों से मिलने के लिये महीने में 2 बार ‘स्पेशल इंटरेक्टिव प्रोग्राम’ चलाया जायेगा।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वर्ष 2010 में भारत में 1.90 हजार लोगों ने आत्महत्या की थी। पूरी दुनिया में हर साल 9 लाख लोग आत्महत्या करते हैं। भारत में 13 प्रतिशत मौतें आत्महत्या की वजह से होती है जिनमें युवाओं की संख्या अधिक होती है। वर्चुअल दुनिया में नजदीक जाते हुए हम अपनी यथार्थ की दुनिया से धीरे-धीरे दूरी बनाने लगते हैं। हमारे पास अपने दु:ख के समय सर रखकर रोने को कोई कंधा नहीं होता। समाज में बढ़ रहा अबोलापन और एकाकी जीवन पद्धति के चलते अवसाद यानी डिप्रेशन बढ़ रहा है। अवसाद हमारी आधुनिक जीवन पद्धति बड़ा लक्षण बनकर उभरा है। आज इस अवसाद के कारण आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ रही है। यदि जिस समय हम अवसाद की स्थिति से गुजर रहे हों और हमारी बात सुनकर उसके बारे में हमसे कोई बात करे, सलाह दे, हमारी मनःस्थिति को समझे तो हम उस अवसाद की स्थिति से बाहर आ सकते हैं। अवसाद की स्थिति में व्यक्ति अंतरमुखी हो जाता है। यह वह स्थिति होती है जिसमें कुछ कहा भी ना जाए और सहा भी न जाए।

हमारे यहां अवसाद को लेकर मनोचिकित्सक, सलाहकार के पास जाने का चलन कम है। बहुत सारे लोगों को लगता है कि मनोचिकित्सक के पास जाने से लोग कहीं मनोरोगी न समझने लगे। यदि आपके पास कोई विश्वास दोस्त, सहेली या परिवार का कोई ऐसा सदस्य नहीं है, जिससे आप खुलकर बात कर सकें, अपनी व्यथा बता सकें तो फिर आपका गहरे अवसाद में जाना तय है। पूरे समाज में आज स्पंदन जैसे कार्यक्रम की जरूरत है। एक चर्चित फिल्म 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' में जादू की झप्पी का जिक्र था, जिससे अवसाद में जा रहे व्यक्ति को बल मिल रहा था। सुप्रसिद्ध व्यग्यंकार हरिशंकर परसाई कहते हैं, 'इस देश के आदमी को ना एलोपैथी की जरूरत है ना होम्योपैथी की जरूरत है, उसे केवल सिम्पैथी की जरूरत है।

हमारे देश में ज्यादातर आत्महत्याएं युवाओं द्वारा की जाती हैं जिसकी मुख्य वजह उनकी बेरोजगारी, परीक्षा में फेल होना, प्रेम में असफल होना जैसे कारण हैं। स्कूली बच्चे परीक्षा में उचित परिणाम नहीं आने के कारण, घरेलू स्त्रियां मानसिक तनाव और घरेलू हिंसा, दहेज आदि कारणों से आत्महत्या करती हैं। भारत में आत्महत्या के मामले में छत्तीसगढ़ चौथे नंबर पर है और छत्तीसगढ़ के 28 जिलों में खुदकुशी के मामले में महासमुंद जिला अव्वल है। 2017 से लेकर मई 2019 तक ढाई साल में करीब सात सौ आत्महत्याएं अकेले महासमुंद जिले में हुई हैं। आंकड़ा चौकाने वाला था। इनमें मरने वाले सर्वाधिक सवा दो सौ लोग तो 21 से 30 साल के युवा थे। जिस तरह पुलिस द्वारा अपने जवानों के अवसाद को कम करने के लिए 'स्पंदन' कार्यक्रम चलाया जा रहा है, उसी तरह यह कार्यक्रम अलग-अलग स्कूलों, कॉलेजों, काउंसिलिंग सेंटरों, सामाजिक संस्थाओं की ओर से भी चलाया जाना चाहिए।