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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -अलग-अलग चश्मे से देखती सरकारी एजेंसियां

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -अलग-अलग चश्मे से देखती सरकारी एजेंसियां

- सुभाष मिश्र
जिन सरकारी एजेंसियों, संस्थाओं को स्वायत्त होकर निष्पक्ष तरीके से काम करना चाहिए यदि वे मौजूदा सरकार के चश्मे से देखकर, जब सरकार के इशारे पर काम करने लगती हैं तो उनकी कार्यप्रणाली, विश्वसनीयता पर सवाल उठता है। लॉकडाउन के समय प. बंगाल में आज हुई गिरफ्तारी से उपजे असंतोष को देखकर लोग सीबीआई की टाईमिंग और भाजपा में शामिल नेताओं को छोड़ जाने पर उसकी नियत-नीति को लेकर यदि सवाल कर रहे हैं तो यह लाजमी है। अभी हाल ही में हुई पांच राज्यों के चुनाव के दौरान भी चुनाव आयोग पर बहुत से सवाल उठे। सीबीआई ने पश्चिम बंगाल में जिस तरह से तृणमूल कांग्रेस के दो मंत्रियों, विधायकों को गिरफ्तार किया, उससे बड़े मुश्किल से शांत हुए, लॉकडाउन में घर बैठे बंगाल में प्रदर्शन शुरू हो गयी। जिस नारद प्रकण में मुकुल राय, शिवेन्दु भी दोषी है, उन्हें भाजपा में चले जाने के कारण गिरफ्तार नहीं करके तृणमूल कांग्रेस के लोगों को ऐसे समय गिरफ्तार करना, जब देश में दूसरे बड़े मुद्दे है और भाजपा के इशारे पर बार-बार वहां के राज्यपाल राज्य में लॉ एंड आर्डर की बात करके अपने पद की गरिमा को नष्ट कर रहे हैं। वहीं ममता बैनर्जी भी धरने पर बैठकर मुख्यमंत्री पद की प्रतिष्ठा के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर रही है। उनके सीबीआई दफ्तर में धरने पर बैठने से एक बार फिर से पश्चिम बंगाल में धरना, प्रदर्शन शुरू हो गया है। सीबीआई, इंकम टैक्स, ईडी, नारकोटिक्स विभाग जैसी सेवाएं जो केंद्र सरकार के अधीन है और बहुत हद तक अपनी विश्वसनीयता और साफ-सुथरी छबि के साथ नियम-कानून के तहत कार्यवाही करती रही है, उनकी टाईमिंग और कार्यवाही तब संदेहास्पद होता है, जब वे एक तरफ का चश्मा पहन कर सरकार के इशारे पर काम करती है।

मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी के सीबीआई दफ्तर में अनशन को लेकर अब सियासत शुरू हो गई है। पश्चिम बंगाल में बुरी तरह से परास्त बीजेपी किसी भी तरह ममता बैनर्जी सरकार को घेरना चाहती है। आने वाले समय में उनके भतीजे अभिषेक बैनर्जी को भी घेरा जायेगा, ये आशंका बहुत से लोगों को है। चुनाव के तुरंत बाद भाजपा कार्यकर्ताओं ऊपर हमले के नाम पर भाजपा का प्रदर्शन विपक्ष के विधायकों को केंद्र की ओर से सुरक्षा देना और तृणमूल कांग्रेस को हमले के लिए जिम्मेदार बताया। अभी यह मामला थमा ही नहीं था की राज्यपाल से अनुमति लेकर मंत्री और विधायक की 2016 के पुराने प्रकरण में गिरफ्तारी। बंगाल टाइगर कहलाने वाली ममता बैनर्जी पहले भी सीबीआई के खिलाफ प्रदर्शन कर चुकी है। पश्चिम बंगाल के भाजपा प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय, भाजपा नेता सरोज पांडे सहित भाजपा से जुड़े पदाधिकारी ने इस घटना प्रदर्शन की आलोचना की है। तृणमूल कांग्रेस से भाजपा में गये मुकुल रॉय और सुवेनद्रु अधिकारी जो भी इस प्रकरण में शामिल है, उनकी गिरफ्तारी न होना और कोर्ट से समक्ष और चार्टशीट नहीं होने और बिना राज्य सरकार, विधानसभा अध्यक्ष की अनुमति के इस तरह की गिरफ्तारी का विरोध हो रहा है। ममता बैनर्जी को कोविड लाकडाउन की स्थिति को देखते हुए अपना धरना खत्म कर पूरे मामले को न्यायालय में ले जाना चाहिए। मंत्रियों को कोर्ट से जमानत मिल गई है।

कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाला मामले में सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि सीबीआई पिंजरे में बंद ऐसा तोता बन गई है जो अपने मालिक की बोली बोलता है। न्यायालय ने सीबीआई को बाहरी प्रभावों और दखल से मुक्त करने के लिए सरकार से कानून बनाने को कहा था।

न्यायालय ने कहा कि आप (सीबीआई) इतने संवेदनशील मामले में भी अपने दिमाग का इस्तेमालनहीं कर रहे हैं। सीबीआई को चट्टान की तरह सख्त बनाना चाहिए, लेकिन आप रेत की तरह भुरभुरे हैं। सीबीआई, देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी। सीबीआई की कार्यशैली और उसके मिस यूज को लेकर केन्द्र में सरकार चाहे कोई भी हो, उस पर आरोप लगते रहे हैं।  

आंध्र प्रदेश के तत्कालिन मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिस्थापना अधिनियम 1976 की धारा 6 द्वारा राज्य क्षेत्राधिकार में सीबीआई द्वारा अपनी शक्तियों के प्रयोग पर रोक लगा दी। इसी तरह की रोक अन्य राज्य सरकारों ने भी लगाई है। इसका मतलब सीबीआई इन राज्यों में केंद्रीय अधिकारियों, सरकारी उपक्रमों और निजी व्यक्तियों की जांच सीधे नहीं कर सकती। सीबीआई भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत भी इन राज्यों में कोई कदम नहीं उठा सकती है। पश्चिम बंगाल में सीबीआई ने इस प्रतिबंध का उल्लंघन किया है। यूपीए सरकार के दौरान भाजपा सीबीआई को कांग्रेस ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टीगेशन कहती थी। उसने सदन से लेकर सड़क तक जमकर हल्ला बोला व विरोध-प्रदर्शन किया था। केंद्र में सत्ता बदलने के बाद अब कांग्रेस, भाजपा सरकार पर सीबीआई का राजनीतिक मिस यूज करने का आरोप लगा रही है। अब कांग्रेस, सीबीआई को भाजपा ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टीगेशन कह रही है। इसी तरह की स्थिति चुनाव आयोग की है। पहले केरल में राज्यसभा चुनाव के समय उसे न्यायालय में नीचा देखना पड़ा। अभी हाल ही में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भी चुनाव आयोग का आचरण विवादास्पद रहा है। मुख्य चुनाव आयुक्त से निवृत्त सुनील अरोड़ा की नियुक्ति का मामला हो या सुप्रीम कोर्ट से रिटायर जज रंजन गोगाई को भाजपा से राज्य सभा में भेजने का मामला हो इससे इन संस्थओं की सत्ताधारी दल से अंतराबंधो को उजागर करते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के चार सबसे वरिष्ठ न्यायाधीशों ने पत्रकार वार्ता लेकर पूर्व में भी कहा था कि जिस तरह से अदालत चल रही है, उससे लोकतंत्र खतरे में है। केंद्र राज्य की स्वायत्त संस्थाओं को अपनी विश्वसनीयता, कार्यप्रणाली पर पुर्नविचार करने की जरूरत है ताकि उनकी साख बनी रहे।