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भीतरी और बाहरी दो कठिन पाटों बीच

भीतरी और बाहरी दो कठिन पाटों बीच

ध्रुव शुक्ल

तेजी से बदलती विश्व व्यवस्था में भीतरी और बाहरी दो कठिन पाटों के बीच में फँसे हुए देश को रास्ता नहीं मिल रहा है। उसे बाहर की लूट का डर भी है और भीतर की लूट से भरा हुआ घर भी है।

देश के राजनीतिक दलों ने आपातकाल के बाद अपने छोटे-छोटे टुकड़े जोड़कर सत्ता पाने के लिए कई तरह की जनता पार्टियाँ बनायीं। इस दौर में जितने प्रधानमंत्री बने वे अपनी पालकी उठाने वाले सभी राजनीतिक कहारों को हिस्सेदारियाँ बाँटते रहे और विश्व बाजार को भी देश की पूँजी में हिस्सेदार बनाते रहे। देश में भीतर की लूट बंद नहीं हुई और बाहर की लूट धीरे-धीरे पाँव पसारती रही।

दौलत और दलीय राजनीति का गठजोड़ किसी से छिपा नहीं है। बदलती वैश्विक अर्थ व्यवस्था में जिन्हें बाहर की लूट का डर है वे भीतर की लूट के ढर्रे को चलाये रखना चाहते हैं और जो बाहर की लूट में अब हिस्सेदार होने की जुगत भिड़ा रहे हैं, वे भीतर की लूट को बंद करना चाहते हैं।

भारत दुर्दशा देखी न जाई, भीतर के स्वार्थ त्यागकर बदलना नहीं चाहते और बाहर से मोहित करते विश्व बाज़ार से भी स्वार्थ साधना चाहते हैं। यह भीतर और बाहर के लालच का द्वंद्व ईस्ट इण्डिया कंपनी के ज़माने से है। अब तो हज़ारों बाहरी कंपनियाँ ललचा रही हैं जिनके सामने भीतर के लालच छोटे पड़ जायेंगे। ऐसे में कोई भी लालची बड़े लालच को चुनना पसंद करेगा।

यह वैश्विक लालच की बाज़ारू आंधी देर-सबेर देश के भीतर छिपे छोटे-छोटे लालचों को  ताड़कर उन्हें अपना हिस्सेदार बनाकर ही दम लेगी। आजकल के आंदोलन देखकर उस सफेद कद्दू की याद आती है जिसे महिषासुर वध का प्रतीक मानकर काटा जाता है और सिंदूर पोतकर धूल चढ़ने के लिए चौराहे पर रख दिया जाता है। वह कुछ दिन रखा भी रहता है और आते-जाते लोग उससे बचकर निकलते हैं। फिर एक दिन कोई मोटी-तगड़ी भैंस ही उसे खा जाती है।