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परंपरागत कृषि विकास योजना के तहत किसानों को प्रशिक्षण

परंपरागत कृषि विकास योजना के तहत किसानों को प्रशिक्षण

नई दिल्ली, 10 जनवरी। केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान लखनऊ उत्तर प्रदेश में लगभग 200 हेक्टेयर खेत में 10 जैविक किसान उत्पादक समूह के किसानों को परंपरागत कृषि विकास योजना के तहत जैविक उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए प्रयासरत है।

किसानों को जैविक उत्पादन के लिए आवश्यक विभिन्न प्रकार के इनपुट जिसमें वर्मी कंपोस्ट, बायोडायनेमिक एवं नाडेप खाद तथा बायो-इन्हानसर को बनाने का प्रशिक्षण किसानों के खेत में ही दिया जा रहा है । किसानों की जमीन का पीजीएस के माध्यम से प्रमाणीकरण कराने का कार्य किया जा रहा है जिससे उन्हें देश के विभिन्न भागों में प्रमाणित जैविक उत्पादों को बेचने में सुविधा मिलेगी। इसके अतिरिक्त किसानों को फसल तैयार होने पर उनके उत्पाद को ग्रेडिंग, पैकिंग, ब्रांडिंग और मार्केटिंग की ट्रेनिंग भी दी जाएगी।

अपने ही खेत में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक सामग्री का उत्पादन करने के वास्ते 10 जैविक उत्पादन समूहों के प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना की गई है। यह जैविक उत्पादक समूह बाराबंकी, बांदा और हमीरपुर जिलों में चुने गए हैं और वहीं जाकर उन्हें जैविक इनपुट्स को बनाने का प्रशिक्षण देने का प्रयास किया जा रहा है ताकि वे इस कार्य में आत्मनिर्भर बन सकें। इससे उत्पादन की लागत में कमी आएगी और किसानों का मुनाफा भी बढ़ेगा|

इसी श्रंखला में एक प्रशिक्षण संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा शैली किरतपुर गांव (बाराबंकी) में नया प्रयोग किया गया है जहां 21 पंजीकृत किसानों को प्रशिक्षण दिया गया। जरूरी जैविक उत्पादन के लिए आवश्यक वस्तुएं जैसे नीम की खली, स्प्रेयर, स्टिकी इंसेक्ट ट्रैप, नीम का तेल, वर्मी कंपोस्ट बेड और केंचुए प्रदान किए गए।

संस्थान ने एक विशेष प्रकार के जैविक इनपुट सीआईएसएच-बायो-इन्हानसर का विकास किया है जिसे छोटे और सीमांत किसानों के बीच में वितरित किया गया ताकि वे मिट्टी का स्वास्थ्य सुधार सकें और जैविक उत्पादन में अच्छी उपज प्राप्त हो। यह एक विशेष प्रकार का फॉर्मूलेशन है जिसमें परंपरागत रूप से इस्तेमाल किए जाने वाले पंचगव्य, वर्मीवाश अमृतवाणी एवं काऊ पेट पिट के लाभकारी बैक्टीरिया का समावेश किया गया है।

संस्थान के निदेशक डॉ शैलेंद्र राजन ने प्रशिक्षण के उद्घाटन के दौरान बताया कि व्यावसायिक और सफल जैविक उत्पादन के लिए हमें अपनी सोच में परिवर्तन करना पड़ेगा । बागवानी फसलों में जैविक उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं। उन्होंने इस बात पर भी विशेष जोर दिया कि फसल का सही चुनाव और अच्छी मात्रा में उत्पादन करके ही मार्केटिंग में सफलता प्राप्त की जा सकती है। अच्छी मार्केटिंग के द्वारा जैविक उत्पादों से प्राप्त होने वाली आय में जोखिम को कम किया जा सकता है।

कृषि वैज्ञानिक डॉ राम अवध राम ने परंपरागत कृषि विकास योजना के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के जैविक इनपुट्स के उत्पादन को प्रदर्शित किया। वैज्ञानिक डॉ आशीष यादव ने इस ट्रेनिंग प्रोग्राम का संयोजन किया तथा किसानों को जैविक उत्पादन के विशेष तकनीकी एवं सावधानियों से अवगत कराया।

किरतपुर गांव स्थापित इस ट्रेनिंग सेंटर पर उपलब्ध विभिन्न प्रकार के यन्त्र एवं अन्य सुविधाओं का प्रयोग करके किसान अपने उपयोग के लिए जैविक इनपुट्स का निशुल्क उत्पादन कर सकते हैं। वैज्ञानिकों द्वारा दिए गए मार्गदर्शन से जैविक उत्पादन तकनीकी एवं फसल की कटाई के बाद ग्रेडिंग, ब्रांडिंग और मार्केटिंग में भी सहायता मिलेगी।