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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -सरकारी संवेदनशीलता और तत्परता न्यायालयों का बोझ कम करेगी

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -सरकारी संवेदनशीलता और तत्परता न्यायालयों का बोझ कम करेगी

-सुभाष मिश्र

यदि सरकारी अमला संवेदनशीलता और तत्परता से काम करें तो इससे ना केवल लोगों को राहत मिलेगी बल्कि न्याय की उम्मीद में न्यायालय जाने वाले प्रकरणों में भी कमी आयेगी। सरकारी लेटलतीफी और अंधेर गर्दी के विरुद्ध अंतिम विकल्प के रूप में लोगों के पास न्यायालय जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। न्यायालयों के पास पहले से ही लंबित प्रकरणों के कारण पीडि़त पक्ष की सुनवाई और न्याय मिलने की प्रक्रिया लंबी हो जाती है। यही वजह है की बहुत से लोग न्यायालय जाने से बचना चाहते हैं।

हमने हाल ही में देखा है कि कोरोना संक्रमण के दौरान बहुत सी राज्य सरकारें आक्सीजन से लेकर टीकाकरण को लेकर केंद्र सरकार के विरूद्ध न्यायालयों में गुहार लगा रही थी। उच्चतम न्यायालय ने स्वयं संज्ञान लेकर केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करके अपनी ओर से टास्क फोर्स गठित कर टीकाकरण की पॉलिसी पर सवाल उठा रहा है। न्यायालयों के बाहर टीवी चैनलों पर मीडिया ट्रायल चल रहा है। सरकार की नीतियां, निर्णयों, कामकाज में देरी और सौंपे गए दायित्वों और कर्तव्यो की अवहेलना को लेकर आजकल न्यायालयों में जनहित याचिका भी बहुत दाखिल हो रही है। अभी हाल ही में उच्च न्यायालय ने 5 जी मामले में फिल्म अभिनेत्री जूही चावला द्वारा दायर याचिका को बिना किसी ठोस कारण का मानकर खारिज कर उन पर 20 लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। न्यायालय के इस फैसले के बाद सोशल मीडिया पर यह बहस भी छिड़ गई है कि क्या किसी सेलिब्रिटी को अपनी बात न्यायालय के समक्ष रखने का अधिकार नहीं है। न्यायालय को ऐसा लगता है कि इस याचिका को सिर्फ पब्लिसिटी के लिए दायर किया गया है। इस विषय को लेकर 2.0 फिल्म आई थी, जिसमें अक्षय कुमार, रजनीकांत जैसे अभिनेता थे।  

कोरोना महामारी की व्यवस्थाओं को लेकर चल रही न्यायालयीन लड़ाई के बीच छत्तीसगढ़ सरकार ने एक अनुकरणीय पहल करके कोरोना संक्रमण से मरे शासकीय सेवकों के परिवार को अनुकंपा नियुक्ति देने विशेष अभियान चलाकर अब तक 700 पीडि़त परिवार के लोगों को शिक्षा विभाग में नौकरी दी है। कोरोना के दौरान 940 शासकीय सेवकों का निधन हुआ है। शेष आवेदकों को नौकरी देने की प्रक्रिया जारी है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की अध्यक्षता में 18 मई को आयोजित केबिनेट की बैठक में तृतीय श्रेणी के पदों पर अनुकंपा नियुक्ति देने मौजूदा नियमों को शिथिल किया गया। मुख्यमंत्री ने सभी विभागों से मृतकों की जानकारी एकत्र कर उनके परिवार को जल्द से जल्द अनुकंपा नियुक्ति देने के निर्देश दिये थे।

छत्तीसगढ़ सरकार की यह पहल अनुकरणीय है, वरना उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव के दौरान ड्यूटी करते मरे 1600 से अधिक शिक्षकों के परिवार अभी भी अनुकंपा नियुक्ति के लिए प्रदर्शन कर न्यायालयों के चक्कर लगा रहे हैं। ऐसे ना जाने कितने मामले होंगो, जो अर्जिया लेकर दफ्तर दर दफ्तर चक्कर लगा रहे होंगे। न्यायालयों के लंबित प्रकरणों की बारीकी से समीक्षा की जाए तो बहुत से प्रकरण सरकारी दफ्तरों की कार्यप्रणाली, लेटलतीफी और असंवेदनशाीलता के कारण दायर हुए है। सरकार में हर साल सीआर लिखने, पदोन्नति समिति की बैठक आयोजित कर लंबित शिकायतों का निराकरण करने एक पूरी प्रक्रिया है, किन्तु इस प्रक्रिया का अधिकांश विभाग पालन नहीं करते। जिन कर्मचारियों का समय पर प्रमोशन नहीं होता, अनावश्यक तबादला होता है या प्रताडऩा होती है उनके पास न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के अलावा कोई चारा नहीं होता। ऐसे ही आम जनता के भी बहुत से मामले जो सरकारी दफ्तरों और अधिकारियों द्वारा तत्परता से निपटाएं जा सकते हैं। उनमें भी जब न्याय नहीं मिलता तो लोगों को मजबूरी में न्यायालय के चक्कर लगाने पड़ते है।

जिसकी वजह से पीडि़त पक्ष के साथ-साथ सरकारी अमले का और न्यायालय का भी समय और पैसा अनावश्यक खर्च होता है। अकेले छत्तीसगढ़ में फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी करने वालों के छानबीन समिति की प्रमाणिकता के बावजूद 80 प्रकरण निर्णय के लिए लंबित है। जब यह प्रमाणित हो चुका है कि संबंधित शासकीय सेवक ने फर्जी जाति प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी हासिल की है तो भी उसे हटाने में 15 साल से ज्यादा लगना सरकारी कार्य प्रक्रिया और नियत पर संदेह पैदा करता है। वहीं दूसरी ओर जो शासकीय सेवक पदोन्नति के लिए पात्र है, उनकी पदोन्नति के अवसरों को भी रोका जाता है। छत्तीसगढ़ कर्मचारी अधिकारी फेडरेशन के संयोजक कमल वर्मा ने इस संबंध में सभी सचिवों को पत्र लिखकर अवगत कराया है कि  प्रत्येक वर्ष 01 जनवरी की स्थिति में रिक्तियों का आंकलन कर जनवरी माह में पदोन्नति की कार्यवाही पूर्ण करने के शासन के स्थायी निर्देश है। पदोन्नति के गोपनीय चरित्रावली, अंचल संपत्ति के विवरण की आवश्यकता होती है, जो सभी लोक सेवक समय-सीमा में जमा कर चुके हैं, किन्तु जनवरी के बाद 4 माह और व्यतीत हो जाने के पश्चात भी अधिकांश विभागों में पदोन्नति की कार्यवाही पूर्ण नहीं की गई है, पदोन्नति आदेश जारी करना तो दूर की बात है।  

न्याय में देरी अन्याय कहलाती है। देश के सभी न्यायालयों में लगभग 3.5 करोड़ मामले लंबित है, इनमें से कई मामले लंबे समय से लंबित हैं। उच्चतम न्यायालय में 58,700 तथा उच्च न्यायालयों में करीब 44 लाख और जि़ला एवं सत्र न्यायालय तथा अधीनस्थ न्यायालयों में लगभग तीन करोड़ मुकदमे लंबित हैं। इन कुल लंबित मामलों में से 80 प्रतिशत से अधिक मामले जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर देश में प्रति 10 लाख लोगों पर केवल 18 न्यायाधीश हैं।

अकेले छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में शासकीय सेवकों के डब्ल्यूपीएल के तहत 15449 प्रकरण लंबित है इनमें से अधिकांश प्रकरण सरकार के स्तर पर निपट सकते हैं, बशर्त की उनके लिए भी उसी तरह की त्वरित कार्रवाई हो जैसे कि अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में हुई है। सरकारी संवेदनशीलता और तत्परता कुछ हद तक न्यायालयों का बोझ कम कर सकती है।