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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - जनता बेबस: बाक़ी सब पाक साफ

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - जनता बेबस: बाक़ी सब पाक साफ

सुभाष मिश्र
असली प्रजातंत्र वही है जिसमें जनता भ्रमाई रहे। जनता को मूल मुद्दों से भटका दो, उसके बीच में कन्फ्यूजन पैदा कर दो ताकि वह तय ही नहीं कर पाये की जो कुछ हो रहा है, उसके लिए असली गुनाहगार कौन है। कभी इंदिरा इज इंडिया, कभी अटल बिहारी ज़रूरी है..... मजबूरी है, तो कभी मोदी है तो मुमकिन है। जैसा समय हो वैसे नारे गढ़ो, मुद्दे उठाओं ताकि जनता कन्फ्यूज रहे। कोरोना काल में भी ऐसा ही कुछ होते दिख रहा है। इस समय जनता बेबस और लाचार हैं और नेता, ब्यूरोक्रेट सब पाक साफ़ हैं।

जनता अपनी बेबसी पर आंसु बहाते हुए अस्पतालों में आक्सीजन, बेड और जीवन रक्षक दवाई खोज रही है और बाहर श्मशानों में टोकन लेकर अपने परिजनों के अंतिम संस्कार की बांट जोह रही है। इसके ठीक उल्ट हमारे देश, प्रदेश के नेता एक-दूसरे के खिलाफ प्रदर्शन और अपने लोगों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन करने में लगे हुए हैं।

छत्तीसगढ़ में भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने शनिवार को अपने घरों के बाहर कोरोना से होने वाली मौत, अस्पतालों की अव्यवस्था, दवाईयों की कालाबाजारी के साथ सरकार से डीएमएफ (डिस्ट्रिक्ट माईनिंग फंड) के दो हजार करोड़ और शराब के सेस के चार सौ करोड़ का हिसाब मांगा। कांग्रेस और अन्य पार्टियों के लोग पिछले एक डेढ़ साल से प्रधानमंत्री केयर्स फंड का हिसाब मांग रहे हैं। दोनों पार्टियों के नेता मिलकर छत्तीसगढ़ के हितों के लिए, यहाँ की स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए क्यों नहीं हिसाब माँगते? क्यों ये इस बारे में नहीं सोचते की जब भी बस्तर में कोई बड़ी नक्सली वारदात होती है तो घायल जवानों को हवाई जहाज़, हेलीकॉप्टर से रायपुर के प्रायवेट और सरकारी मेडिकल कालेज क्यों लाना पड़ता है। बस्तर में विकास के नाम पर  करोड़ों रूपये व्यय होते हैं। अरबों की खनिज वन संपदा यहाँ से बाहर जाती है, पर बड़ी आकस्मिकता में रायपुर राजधानी का मुँह क्यों देखना पड़ता है?

पीएम केयर्स से आज 551 अस्पतालों में आक्सीजन प्लांट लगाने की स्वीकृति प्रधानमंत्री ने दी है। इसके पहले भी पीएम रिलीफ फंड से 3100 करोड़ की राशि कोरोना पीडितों के लिए वेंटीलेटर्स, प्रवासियों और वैक्सीन पर खर्च की जा चुकी है।
पीएम केयर्स फंड को सूचना का अधिकार से अलग रखा गया है। पीएम केयर्स को लेकर पूर्व में बहुत बवाल हो चुका है किन्तु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी छोटे-मोटे विरोध की कब परवाह करते हैं, जोपीएम केयर्स फंड का हिसाब दें।

आज जब पूरे देश में आक्सीजन की कमी को लेकर मारामार मची है और बहुत से अस्पतालों में मरीज आक्सीजन की कमी से दमतोड़ रहे हैं, ऐसे समय देश के संवेदनशील, कर्मठ और त्वरित निर्णय लेने वाले प्रधानमंत्री ने घोषणा की है कि वे पीएम केयर्स फंड में देश के 551 जिला अस्पतालों में आक्सीजन प्लांट लगाएंगे। अभी तक पीएम केयर्स फंड से कोरोना वायरस से उपजी आपात स्थिति से निपटने के लिए पिछले साल 28 मार्च को पीएम केयर्स फंड बनाया गया था। यह पीएम रिलीफ फंड से अलग है।

पीएम केयर्स को कम समय में अरब डालर से ज्यादा रकम जमा हो चुकी थी जो अब बढ़कर बहुत ज़्यादा हो गई है। फंड की शुरुआत में ही इसमें कंपनियों, सरकारी उपक्रमों, ट्रस्टों, सेलिब्रिटी और आम आदमी ने योगदान किया है। इस फंड में कुल 1.4 अरब (10,600 करोड़ रुपये) जमा हो गए थे। देश में जो मौजूदा आक्सीजन प्लांट है और आक्सीजन वितरण की जो व्यवस्था है, उसे ही सही ढंग से मानिटगिं करके राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन जैसी कोई संस्था मैनेज करती, तो पूरे देश में आक्सीजन के लिए ये हाहाकार नहीं मचता। दरअसल हम जब प्यास लगे तब कुंआ खोदो की नीति पर विश्वास करते हैं। देश के प्रधानमंत्री के पीएम केयर्स फंड से आक्सीजन प्लांट लगाने के निर्णय पर तत्काल देश के गृहमंत्री ने आक्सीजन की कमी दूर करने के इस फैसले का स्वागत किया है। वहीं दूसरी ओर रायपुर शहर कांग्रेस कमेटी ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा 18 वर्ष प्लस के लोगों को मुफ्त टीकाकरण कराने के लिये आभार जताने अपने अपने घरों के बार तख्ती लेकर बैठें। मजेदार बात यह है कि सभी दल इस राष्ट्रीय आपदा में आपसी मतभेद भुलाकर एकजुट होकर मानव सेवा की बात करते हैं। विधायकों को एक माह का वेतन देने की बात आती है तो कांग्रेस के विधायक मुख्यमंत्री सहायता कोष में राशि देते हैं, और भाजपा के विधायक जिला राहत कोष के अलावा अपने लोगों से पीएम केयर्स फंड में राशि दिलवाते हैं। हम एक नेशन एक प्राब्लम की लाख बात करें पर यह सभी अपनी अपनी प्राब्लम होकर रह गई है।

दोनों ही पार्टियों के लोग अपनी अपनी पार्टी के नेताओं, सरकार के प्रति आभार जताते हुए दूसरी पार्टी के विरूद्ध धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। ऐसे समय में आम जनता को समझ में नहीं आ रहा है कि वो किसके पास जायें। जनता बुरी तरह से कन्फ्यूजन है। सुदर्शन फकिर का एक मशहूर शेर है।
मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ है।
क्या मेरे हक में फैसला देगा ॥
जिन्दगी को करीब से देखो।
इसका चेहरा तुम्हें रूला देगा॥

बहुत बार राजनैतिक दलों के बीच होने वाली बयानबाजी, धरना-प्रदर्शन एक तरफ की नूरा कुश्ती प्रतीत होती है। बहुत बार बहुत से मंझौले, छोटो और कई बार प्रदेश और जिला स्तर के नेता भी अपनी वजूद बताने के लिए इस तरह के धरने, प्रदर्शन करते हैं। राजनीतिक दलों और उससे जुड़े नेताओं के लिए धरना, प्रदर्शन, रैली लाभ का सौदा है। हर प्रदर्शन आयोजन के बाद चंदे की राशि में से बहुत कुछ बचता है। हमारा देश तीज, त्यौहार के साथ-साथ धरना-प्रदर्शन का भी देश है। शराब ठेके के समय होने वाले प्रदर्शन से लेकर संस्कृति की रक्षा के लिए होने वाली कथित प्रदर्शन का उद्देश्य एक ही होता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने आज स्वास्थ्य से जुड़े अमले से अपने मन की बात करते हुए कहा कि कोरोना संक्रमण के समय केवल विशेषज्ञों की सलाह माने। वैक्सीन को लेकर लोग भ्रम फैला रहे हैं। राहुल गांधी ने कहा कि सरकार का सिस्टम पूरी तरह फेल है। कांग्रेस जन आगे आकर लोगों की मदद करें।

पूरा देश जानता है कि कोरोना संक्रमण के दौरान सरकार के स्तर से बिना विशेषज्ञों की राय लिए न जाने कितनी-कितनी सलाह दी गई। आज जब केंद्र सरकार कह रही है कि स्वास्थ्य सेवाएं राज्य का विषय है तब 24 मार्च 2020 को किस राज्य से पूछकर को स्वास्थ्यगत कारणों को राष्ट्रीय आपदा मानकर तालाबंदी की गई है। पिछले कोरोना संक्रमण के दौरान जब निर्देश जारी करने का, क्रेडिट लेने का मौका आया तब केंद्र क्यों बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहा था। आज जब आक्सीजन वितरण और प्रबंधन की बात आ रही है और चीजें बिगड़ रही है, तब राज्यों के पल्ले ये बात डालना आपदा में अवसर तलाशने जैसा नहीं है। मन की बात करने वाले हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी से देश यह जानना चाहता है कि ताली-थाली बजाने, दीए जलाने की सलाह किस विशेषज्ञ से पूछकर की गई थी।

आज जब हेल्थकेयर सिस्टम चरमरा सा गया है। ऐसे में बहुत से डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ, सफ़ाईकर्मी, ड्राइवर से लेकर वे सब जो स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े हुए हैं अपनी क्षमता से अधिक समय तक स्ट्रेस और तनाव के बीच काम कर रहे हैं। जब किसी परिवार को कोई एक सदस्य बीमार पड़ जाता है तो पूरा परिवार हलाकान हो जाता है। सब लोग दो-तीन सप्ताह की भागदौड़ में हाँफने लगते हैं। क्या कभी किसी राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं ने इनके लिए अपने घर के बाहर बैठकर धन्यवाद ज्ञापित किया। उल्टे आये दिन अस्पतालों में इनके साथ होने वाली बदतमीजियों की खबर ज़रूर आती है। आज जब बड़ी आबादी लाकडाउन में अपने घर में हवा से फैलने वाले कोरोना वायरस से डर कर बैठी है, ये ही वे लोग हैं जो मोर्चे पर डटे हुए हैं। यदि इन्हें आज कुछ हो जाए तो इन्हें भी अस्पतालों में बेड नहीं मिलेगा।

देशभर के स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े बड़े-बड़े डाक्टर, विशेषज्ञ अस्पताल प्रबंधन से जुड़े लोग मीडिया के जरिये बार-बार सिस्टम को दुरुस्त करने की बात कह रहे हैं। वे कह रहे हैं कि आक्सीजन और जीवन रक्षक दवाईयों की सप्लाई चेन के लिए सेंट्रल कोर्स की जरूरत है। अलग-अलग राज्यों की स्थिति को देखते हुए एक सेंट्रल डेस्क बनाई जाएं, जहां से मांग और पूर्ति को नियंत्रित किया जाए। सभी राज्य इस कार्य में केंद्र को सहयोग करें। सबका कहना है कि इस समय देश में मोटिवेशन की बहुत जरूरत है। बड़े अस्पताल जिन्हें साल भर आक्सीजन की जरूरत होती है, वे अपने आक्सीजन प्लांट लगाएं।

पूरे देश में अब कोरोना पीडि़तों की संख्या साढ़े तीन लाख के पास पहुंच गई है जिनमे एक दिन में मरने वालों की संख्या 2767 है। ये आंकड़ा प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। दिल्ली, मुंबई सहित बहुत से शहरों और राज्यों में बढ़ते कोरोना संक्रमण को देखते हुए लाकडाउन बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। हमारे माननीय न्यायालय लाख कहे की आक्सीजन की कमी से किसी को मरने नहीं देंगे, दोषियों को फांसी पर टांग देंगे, प्रधानमंत्री कहे की आक्सीजन की कमी नहीं होने देंगे, ठीक उसी समय देश की राजधानी में बहुत से लोग आक्सीजन की कमी के कारण दम तोड़कर न्यायालयों, नेताओं को जमीनी सच्चाई का आईना दिखाते हैं। सब तरफ से एक ही आवाज आती है बड़ी देर कर दी मेहरबां आते-आते।