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सुभाष चंद्र बोस जयंती के अवसर पर विशेष - "अखंड भारत की आजादी के स्वप्नद्रष्टा नेताजी सुभाष चंद्र बोस"

सुभाष चंद्र बोस जयंती के अवसर पर विशेष  -


– डॉ. अशोक कुमार भार्गव, आई.ए.एस.


        " तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा" के ओजस्वी उद्घोष से समग्र राष्ट्र में देशभक्ति त्याग और बलिदान के अनियंत्रित तूफान को सृजित करने वाले भारतीय स्वाधीनता संग्राम के क्रांतिधर्मा महानायक सुभाष चंद्र बोस का देश की आजादी के इतिहास में अनुपम और अतुलनीय योगदान हैं। भारत को विश्व की एक महान शक्ति बनाने के लिए संकल्पित सुभाष चंद्र बोस की  अमिट छवि भारतीय जनमानस में नेताजी के रूप में अंकित है। 23 जनवरी 1897 को  उड़ीसा के कटक में जन्मे सुभाष एक व्यावहारिक चिंतक, अद्भुत संगठन कर्ता और करिश्माई नेतृत्व के धनी थे जिनके स्वाभिमानी व्यक्तित्व में जादुई आकर्षण था। उनकी वाणी में अद्भुत ओज था। विचारों की स्पष्टता, प्रखरता, दूरदर्शिता, लक्ष्य की दृढ़ता, सिद्धांतों की प्रतिबद्धता, राष्ट्रभक्ति और जन सेवा के प्रति समर्पण एवं अपने कार्य के प्रति असीम आत्मविश्वास के साथ गहन निष्ठा का भाव उनके व्यक्तित्व में इस तरह समाहित था कि उन्होंने बिना झिझक अंग्रेज साम्राज्य के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष का आव्हान किया। उस अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध जिसमें कभी सूर्यास्त नहीं होता था और ब्रिटेन के विद्रोही कवि अर्नेस्ट जोन्स के शब्दों में 'वह इतना क्रूर भी हो गया था कि उसके उपनिवेशों में रक्त भी कभी नहीं सूखता था।' उन्होंने साहस पूर्वक अंग्रेजी हुकूमत से टक्कर लेते हुए  युवाओं में क्रांति की चेतना जागृत की और दुनिया के अन्य राष्ट्रों से चर्चा कर भारत की आजादी के पक्ष में विश्व जनमत निर्माण का ऐतिहासिक कार्य किया।
        सुभाष का बचपन से ही अध्यात्म की ओर झुकाव रहा। कटक में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की । कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज और कैंब्रिज विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद देश की आजादी के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य का संकल्प लेने वाले सुभाष के मन में भारत की सांस्कृतिक चेतना के प्रति अगाध श्रद्धा, आस्था और अटूट प्रेम था। कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज के प्रोफेसर ओटन जो भारतीय छात्रों को घृणा की दृष्टि से देखता था, उन्हें गंवार और जंगली कहकर अपमानित करता था। यह स्वाभिमानी सुभाष को बिल्कुल स्वीकार्य नहीं था। अतः उन्होंने उसके  विरुद्ध कॉलेज में छात्रों के साथ मिलकर हड़ताल की, कक्षाओं का बहिष्कार किया और एक दिन मौका पाकर अन्य छात्रों के साथ मिलकर कक्षा में ही उसे करारा सबक सिखाने के लिए जमकर पिटाई कर दी। उस प्रोफेसर के होंश उड़ गए। अंततः प्रोफेसर ने छात्रों से क्षमा मांगी और भारतीयों का अपमान करना बंद कर दिया। यद्यपि इस घटना के बाद सुभाष को कॉलेज से निकाल दिया गया किंतु इसका उन्हें तनिक भी अफसोस नहीं हुआ बल्कि उनका मन प्रफुल्लित हुआ। सुभाष ने कहा कि भारतीय होने का अर्थ यह नहीं है कि हम असभ्य और    गंवार हैं। हम पूरी तरह से सभ्य और सुसंस्कृत हैं। किसी को भी हमें अपमानित करने का अधिकार नहीं है तत्पश्चात स्कॉटिश चर्च कॉलेज से उन्होंने दर्शनशास्त्र में स्नातक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। उन्होंने मिलिट्री प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। पिताजी चाहते थे कि सुभाष इंग्लैंड जाएं और सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा आई. सी. एस. होकर लौटे। किंतु जन्मजात विद्रोही सुभाष के मन में अंग्रेजी हुकूमत को जड़ से उखाड़ फेंकने की बगावत का बीजारोपण तो हो ही चुका था। समाज सेवा राष्ट्र सेवा और जन सेवा का कर्तव्य भाव उन्हें  पुकार रहा था। ना चाहते हुए भी पिता की आज्ञा का पालन किया और इंग्लैंड से आईसीएस की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली, किन्तु  उनकी सरकारी नौकरी करने की इच्छा बिल्कुल नहीं थी। उन्होंने दृढ़ता पूर्वक प्रतिकार करते हुए कहा कि वह शासन तंत्र जो मेरी मातृभूमि को दासता की जंजीरों में जकड़ा हुआ है उसकी कठपुतली या पुर्जा बनना मुझे स्वीकार नहीं है। विदेशी हुकूमत हमारे युवकों को गोलियों से भून रही है उन्हें जेलों में यातनाएं दे रही है और मैं उनकी गुलामी करूं यह असंभव है और 22 अप्रैल 1922 को उन्होंने पिता की इच्छा के विरुद्ध आईसीएस से त्यागपत्र दे दिया।
        एक अंग्रेज पुलिस अधिकारी ग्रीफीथ जो सुभाष को पूर्व से जानता था उन्हें  गिरफ्तार करने के लिए गिरफ्तारी वारंट लेकर उनके कमरे पर पहुंचा जहां वे साधारण कपड़े में बैठे थे, कोने में एक तरफ मिट्टी का घड़ा रखा हुआ था। उसने कहा मैं तुम्हें गिरफ्तार करने आया हूं। तुम क्या हो सकते थे और क्या हो गए। सुभाष ने कहा 'ठीक क…