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औपनिवेशिक कर व्यवस्था बन गया है ‘जीएसटी’ : कैट

औपनिवेशिक कर व्यवस्था बन गया है ‘जीएसटी’ : कैट

नयी दिल्ली।   व्यापारियों के प्रमुख राष्ट्रीय संगठन ‘कैट’ ने वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को ‘औपनिवेशिक कर व्यवस्था’ की संज्ञा देते हुये कहा है कि हाल में किये गये विभिनन संशोधनों और नियमों के कारण यह कर प्रणाली जटिल बन गई है।

कैट ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से इस मुद्दे पर चर्चा की माँग करते हुये आज कहा कि जीएसटी को अच्छे एवं सरल कर के रूप में प्रचारित किया गया था, लेकिन वास्तव में यह देश में कारोबार की परिस्थितियों से कोसों दूर है और अब व्यापारियों पर बोझ बन चुका है।

कैट के राष्ट्रीय अध्यक्ष बी.सी. भरतिया और राष्ट्रीय महासचिव प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि जीएसटी को लागू हुये चार साल हो चुके हैं, लेकिन जीएसटी पोर्टल में अब भी काफी दिक्कतें हैं। नियमों में लगातार हो रहे बदलावों के अनुरूप समय पर वेबसाइट में बदलाव नहीं हो पा रहा है। अब तक राष्ट्रीय अपीलीय प्राधिकरण का गठन भी नहीं किया गया है।

उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य अपने हिसाब से नियमों की व्याख्या कर रहे हैं जिससे ‘एक देश एक कर’ की अवधारणा खंडित हो रही है। जीएसटी के अधिकारी अनुपालना कराने पर अधिक ध्यान दे रहे हैं और यह नहीं समझ रहे कि देश के ज्यादातर व्यापारी अब भी कंप्यूटर का इस्तेमाल नहीं करते हैं।

कैट ने आरोप लगाया कि हाल में किये गये संशोधनों से जीएसटी अधिकारियों को किसी भी व्यापारी का पंजीकरण बिना किसी नोटिस के रद्द करने का अधिकार मिल गया है। यह अटपटा है। इस अधिकार का गलत इस्तेमाल हो सकता है। जीएसटी के लागू होने से लेकर 31 दिसंबर 2020 तक कुल 927 अधिसूचनाएँ जारी कर नियमों में बदलाव किये गये हैं। इससे व्यापारियों के लिए अनुपालना कठिन हो गई है।