प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-जान भी रहे, जहान भी रहे, काम आसान भी रहे

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-जान भी रहे, जहान भी रहे, काम आसान भी रहे

-सुभाष मिश्र, प्रधान संपादक

रोना संक्रमण की वजह से लागू लाकडाउन खुले, जीवन पटरी पर आए, सभी चाहते हैंं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जान भी रहे, जहान भी रहे की बात की है। दरअसल लोगों के दिमाग में इस समय एक मुहावरा 'जान है तो जहान हैÓ अपने असली मायने के साथ घर कर गया है। किसी व्यक्ति, वस्तु के जरिये अदृश्य वायरस की चपेट में आकर कोई भी अपनी जान गंवाना नहीं चाहता। सबको अपनी जान प्यारी है। हर कोई कबीर की तरह कहना चाहता है कि हम न मरिहैं, मरिहैं जग सारा। पर हकीकत में किसी के पास इस समय कोई तारनहारा नहीं है। जो भी बचाव की व्यवस्थाएं हैं, जांच के साधन हैं, वे इतने कम हैं कि बस सोशल, फिजिकल डिस्टेंसिंग ही एक मात्र सहारा है।

अधिकांश लोग इसी उम्मीद में अपने अपने घरों में बंद है कि कोरोना का लागिंग पीरियड निकल जाये, फिर जो करना है करेंगे। जिनके पास घर नहीं है, खाने-पीने के संसाधन नहीं है, जो बहुत लंबे समय तक अपनी भूख को दबाकर अदृश्य भय में अपने घर में नहीं रह सकते, उन्हें काम धंधा चाहिए, राहत चाहिए, सामाजिक सुरक्षा पेंशन चाहिए, राशन दुकान से राशन चाहिए। उन्हें वो सब चाहिए, जिससे वे जिंदा रह सकें। इसलिए ऐसे लोग लाकडाउन की परवाह किये बगैर सड़कों पर आ जाते हैं। पूरे देश में 21 दिन के लाकडाउन का पीरियड आज समाप्त हो रहा है। प्रधानमंत्री फिर राष्ट्र को संबोधित करेंगे और संभवत: बहुत सी हिदायतों के साथ लाकडाउन आगे भी जारी रहे। पंजाब, ओडिशा, महाराष्ट्र, तेलंगाना, पं. बंगाल, दिल्ली ने पहले से ही लाकडाउन अवधि बढ़ाने की और अपनी सीमाएं नहीं खोलने की घोषणा कर दी है।

छत्तीसगढ़ जैसे राज्य, जहां कोरोना का संक्रमण उस व्यापकता में नहीं है, जैसा महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, उत्तरप्रदेश, झारखंड आदि में है। यही वजह है कि यहां का लाकडाउन थोड़ा लचीला है। थोड़ी-थोड़ी हिदायत के साथ रोजमर्रा की जिंदगी चल रही है, सामान मिल रहे हैं। धीमी गति से चल रही इस रोजमर्रा की जिंदगी में रफ्तार लाने, उत्पादन करने और धीरे-धीरे पहले की ही तरह जन-जीवन, अर्थव्यवस्था को सुधारने की गरज से छत्तीसगढ़ सरकार ने उद्योगपतियों से शपथ पत्र करवाकर कुछ शर्तों के साथ उद्योग धंधे प्रारंभ करने कहा है। सरकारी दफ्तर भी बुधवार से कुछ शर्तों के साथ प्रारंभ हो जायेंगें। हालांकि बड़े उद्योग जिनके पास बिजली बिल और वेतन के लम्बे खर्चे हैं, वे चाहते हैं कि हम ताजा शर्तों के साथ इकाई शुरू नही कर सकते। इससे अच्छा तो हम एक मई से ही काम शुरू करें। परंतु लघु उद्योग कल से काम करने को तैयार हो गए हैं।

इधर, उद्योग एसोसिएशन ने कहा है कि सरकार द्वारा इस संबंध में जारी गाईड लाईन स्पष्ट नहीं है। 40 प्रतिशत स्टाफ के साथ उद्योग धंधे चालू करने की जो बात कही गई है, उसमें कच्चा माल कहां से आयेगा, तैयार माल का परिवहन, मार्केटिंग दूसरे राज्यों में कैसे होगी इसके बारे में कोई गाईड लाईन नहीं है। किसी एक उद्योग से बहुत से छोटे-छोटे अनुषांगिक उद्योग, कार्य जुड़े होते हैं, उनसे साथ किस तरह कम्युनिटी डिस्टेंसिंग का पालन होगा? उद्योग-धंधों की जमीनी हकीकत जाने बिना जारी किये गये निर्देशों और शर्तों पर उद्योगपति काम करने तैयार नहीं है। छत्तीसगढ़ में स्कील्ड लैबर की कमी है। छत्तीसगढ़ के उद्योग धंधों में लगने वाले स्कील लैबर, विशेषज्ञ सेवाओं के लिये किसी प्रकार के प्रशिक्षण संस्थान नहीं बनाये गये। भला हो पहले से चल रहे आटीआई जैसी संस्थाओं का जहां से थोड़े बहुत ट्रेन्ड लोग कुछ उद्योगों के लिये मिल जाते हैं। ज्यादातर उद्योगों में बाहर का स्कील्ड लेबर काम करता है जो लाकडाउन के कारण यहां फंसा है, वह लाकडाउन खुलते ही अपने घर भागेगा, और जो पहले से अपने घर जा चुका है, वह शायद ही अभी लौटे। ऐसे में स्थानीय श्रमिकों के साथ सोशल और फिजिकल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए उद्योग धंधे को कैसे प्रारंभ करें, यह चिंता उद्योगपतियों की है।

सरकार की ओर से उन्हें ना तो कोई राहत पैकेज दिया गया है, ना ही फिक्स बिजली चार्ज में कोई रियायत। छोटे-बड़े सभी उद्योगों के सामने स्कील लैबर का संकट है। हमने राज्य बनने के बाद से इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की। यही वजह है कि अभी भी हमारे छत्तीसगढ़ के अधिकांश उद्योग-धंधों निर्माण कार्यों से बाहर का लेबर ही काम करता है। उद्योग धंधों पर सरकारी और राजनैतिक तंत्र का शिकंजा इतना ताकतवर है कि बिना इनकी सहमति, अनुमति से आप ऐसा कुछ नहीं कर सकते जो आपको अव्यवहारिक जटिल नियमों, शर्तों के उल्लंघन से बचाये। जंगल हो या सड़क उसकी लेव्ही वहां वसूल होती है, इसके वसूल करने वाले भले ही बदल जाएं, पर जिसकी सत्ता उसकी लेव्ही यहां काम करती हैं।

छत्तीसगढ़ 06 राज्यों की सीमा से घिरा है जिनमें महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, ओडिशा, आंध्रा, उत्तरप्रदेश और झारखंड में कोरोना का प्रभाव ज्यादा है। अधिकांश मजदूर इसी राज्य से आते हैं, ऐसे में कड़ा ऐहतियात बरतना होगा अन्यथा संक्रमण फैलने का डर बना रहेगा। सरकारी व्यवस्था पर केंद्रित ग्रामीण विकास के अंतर्गत पुल-पुलिया, सड़क आदि के काम भी शुरू किये जाने हैं। महात्मागांधी रोजगार गारंटी योजना जिसे मनरेगा के नाम से जानते हैं, उसके जरिये की फिलहाल 5 लाख लोगों को काम देने की बात हो रही है। राज्य में 15 लाख तक लोगों को पूर्व में मनरेगा से काम मिला है। मनरेगा में हाजिरी पंजी की प्रविष्टि के आधार पर मजदूरों का भुगतान होता है। मनरेगा में किये गये कार्य का मूल्यांकन, निरीक्षण की कोई खास व्यवस्था नहीं है। सरकारी अधिकारी भी जानते हैं कि यह श्रममूलक नहीं, रोजगार मूलक योजना है जिसमें लोगों को पलायन से रोकने स्थानीय स्तर पर काम दिया जाना जरूरी है। मैट, सरपंच और समिति मिलकर पूरा मनरेगा निपटा देते हैं। कोई किसी से पंगा नहीं लेना चाहता, ना ही काम का मूल्यांकन करना चाहता है, ना ही कोई पूरी खेती।

विश्व बैंक ने रविवार को च्दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्था पर ताजा अनुमान: कोविड-19 का प्रभाव वाली रिपोर्ट में कहा है कि 2019-20 में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर घटकर पांच प्रतिशत रह जाएगी। इसके अलावा, 2020-21 तुलनात्मक आधार पर अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर में भारी गिरावट आएगी और यह घटकर 2.8 प्रतिशत रह जाएगी। घरेलू आपूर्ति और मांग प्रभावित होने के चलते 2020-21 में आर्थिक वृद्धि दर घटकर 2.8 प्रतिशत रह जाएगी। विश्व बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री हैंस टिमर ने कहा कि भारत का परिदृश्य अच्छा नहीं है। टिमर ने कहा कि यदि भारत में लॉकडाउन अधिक समय तक जारी रहता है तो यहां आर्थिक परिणाम विश्व बैंक के अनुमान से अधिक बुरे हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि इस चुनौती से निपटने के लिए भारत को सबसे पहले इस महामारी को और फैलने से रोकना होगा और साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि सभी को भोजन मिल सके। भारत को विशेष रूप से स्थानीय स्तर पर अस्थायी रोजगार कार्यक्रमों पर ध्यान केंद्रित करना होगा। भारत को लघु एवं मझोले उपक्रमों को दिवालिया होने से बचाना होगा।

वरिष्ठ बिजनेस पत्रकार पूजा मेहरा ने कहा है कि लॉकडाउन का सबसे ज़्यादा असर अनौपचारिक क्षेत्र पर पड़ेगा और हमारी अर्थव्यवस्था का 50 प्रतिशत जीडीपी अनौपचारिक क्षेत्र से ही आता है। ये क्षेत्र लॉकडाउन के दौरान काम नहीं कर सकता है। वो कच्चा माल नहीं खरीद सकते, बनाया हुआ माल बाजार में नहीं बेच सकते तो उनकी कमाई बंद ही हो जाएगी। छोटे-छोटे कारखाने और लघु उद्योगों जिनकी संख्या बहुत अधिक है। उन्हें नगदी की समस्या होगी।

लॉकडाउन से उद्योगों को छूट देने की राज्य सरकार की घोषणा के बाद अब दूसरे सेक्टरों ने भी यह छूट चाही है। सीएसआईडीसी के पूर्व अध्यक्ष छगन लाल मूदड़ा का कहना है कि रीयल सेक्टर को भी खोलना चाहिए क्योंकि लगभग एक महीने में काफी आर्थिक नुकसान हुआ है। नए प्रोजेक्ट तो छोडि़ए, पुराने भी अधूरे ही पड़े हैं। ऐसे में बैंकों को चाहिए कि वे कम से कम तीन महीने का ब्याज छोड़ें। किश्त की छूट तो देनी ही चाहिए। मास्क लगाना, सेनीटाइजर का इस्तेमाल करना, सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखना यह देखना सभी की जिम्मेदारी है ताकि कोरोना से बचा जा सके।

जयस्तंभ चौक स्थित रवि भवन इलेक्ट्रॉनिक और मोबाइल बाजार का बड़ा स्त्रोत है। 200 से ज्यादा दुकानें यहां से संचालित होती हैं। रवि भवन व्यापारी संघ के संरक्षक अर्जुन वासवानी ने यहां व्यावसायिक गतिविधियां प्रारम्भ करने अनुमति मांगी है। मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में उन्होंने कहा कि शॉपिंग काम्प्लेक्स में अत्यंत छोटे-छोटे व्यवसायी जैसे मोबाइल रिपेयरिंग, मोबाइल एक्सेसरीज आदि का व्यवसाय करते हैं। जिन्हें सरकार की योजना इत्यादि का कोई लाभ नही मिलता। ऐसे में उनके सामने दुकान का किराया देने और रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है। काफी आर्थिक नुकसान भी हुआ है। उन्होंने चेताया कि लॉकडाउन बढ़ाने पर अराजकता बढ़ सकती है।

जयंत भाई टांक छत्तीसगढ़ के प्रमुख सब्जी और फल के थोक विक्रेता माने जाते हैं। वे खुद भी किसान हैं। उनके मुताबिक लाकडाउन में कम से कम 700 से 800 करोड़ का नुकसान हुआ है। सरकार भी कुछ मदद नही कर पा रही है। जबकि हरियाणा, यूपी, पंजाब और अन्य राज्यों ने लॉकडाउन में सब्जी और फल निर्माता किसानों को छूट दे रखी है नतीजन वहां सब्जियों का बाजार और किसान दोनों सुखी हैं। सब्जी निर्माताओं का यह भी कहना है कि मार्च, अप्रैल और मई गुजरने के बाद अब आने वाले समय में बरसात की तैयारियां भी करनी है लेकिन यही नुकसान पूरा नही होगा तो बरसात के समय सब्जियों की तैयारी कैसे करेंगे। श्री टॉक बताते हैं कि अकेले उनके ही खेत से 15 हजार कैरेट सब्जियां बरबाद हो गईं क्योंकि लेवाल ही नही थे।

छत्तीसगढ़ सब्जी उत्पादक संघ के अध्यक्ष डॉ. राजाराम त्रिपाठी कहते हैं कि हम सबकी नजर सरकार पर ही टिकी है कि वह ऐसे भूमिहीन तथा लीज पर साग-सब्जियों की खेती करने वाले किसानों की नष्ट हुई खड़ी फसल का आंकलन कर उन्हें बीमा योजना अथवा अन्य किसी योजना के तहत लाभान्वित कर मदद करे ताकि किसान आने वाली रबी की फसल की समुचित तैयारी कर सकें।