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जीतने की ज़िद का सामना

जीतने की ज़िद का सामना

ध्रुव शुक्ल

जीतने की ज़िद बांधकर अगर हर कोई सोच ले कि उसे सिर्फ जीतना है तो यह धरती के समूचे प्रजातंत्र के लिए ख़तरनाक है। साफ दिख रहा है कि दुनिया के राजनीतिक दल एक-दूसरे को हराकर जीत जाना चाहते हैं। जनता जिन दलों को जिताकर राजकाज सौंपती देती है, वे भी कभी न हारने का मनसूबा बांधकर जनता को ही हराने के उपाय करने लगते हैं।

जीतने की ज़िद जनता की वैश्विक सद्भावपूर्ण एकता को खण्डित करके उससे प्रतिनिधित्व पाकर भले ही अपने बहुमत का दावा कर ले पर इससे पृथ्वी पर प्रजातंत्र प्रतिष्ठित नहीं होता। छलपूर्वक जीतने की राजनीतिक ज़िदें जनता को ही बार-बार पराजित करती रहती हैं और उसके स्वराज्य को मिटाकर उसे सहिष्णुता और बंधुता के मार्ग से लगातार विचलित करती रहती हैं।

जीतने की ज़िद केवल धरती पर बसे लोगों को ही पराजित नहीं कर रही। वह राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक संयम के अभाव में  पृथ्वी के ऋतुकालों में बसी और सब पर उपकार करने वाली प्रकृति को भी अपने स्वार्थ की आग में झुलसाकर उसका विनाश करने में भी संकोच नहीं कर रही।

जीतने की ज़िद ने किसी देश का ही क्या, पूरी दुनिया का कभी भला नहीं किया। बीते दो हजार वर्षों का इतिहास गवाह है कि जीतने की ज़िदें कभी धरती पर बसे बहुरंगी जीवन के पक्ष में नहीं रहीं। अब तो नारा बुलंद है -- ज़िद करो, दुनिया बदलो।  कौन जाने इक्कीसवीं सदी में बांधी जा रही जीतने की ज़िद दुनिया को किस हाल में छोड़ेगी?