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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से औपनिवेशिक काल के अवशेष ज़्यादा चमकदार और पैने

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से औपनिवेशिक काल के अवशेष ज़्यादा चमकदार और पैने

-सुभाष मिश्र
गांव में कहावत है अंग्रेज चले गये औलाद छोड़ गये। दरअसल, यह उस मानसिकता का प्रकटीकरण है जो हमें गुलामी से मुक्त नहीं होने देना चाहती। गांधीजी ने कहा था अब उनसे कह दो कि गांधी अंग्रेज़ी नहीं जानता है। हमारे संविधान विशेषज्ञों ने बहुत से नियम क़ानून बनाए पर वो भी अंग्रेज़ी और अंग्रेजियत के मोह से अपने को मुक्त नहीं रख पाये। हम सब यह महसूस करते हैं कि अंग्रेजों द्वारा संचालित गुलाम देश के लोगों पर राज करने के लिए बनाये गये औपनिवेशिक काल के अवशेष ज़्यादा चमकदार और पैने हो गये हैं। आजादी के आठवें दशक में भी हम अंग्रेजों के बनाये क़ानूनों के ज़रिए देश की शासन व्यवस्था चलाकर विरोध करने वालों को राजद्रोह में फंसाने का कोई अवसर नहीं छोडऩा चाहते। नजराना, शुकराना से ज्यादा अब जबराना हो गया है। अंग्रेजियत के प्रति हमारा प्रेम अंग्रेजों से ज्यादा दिखाई देता है। निज भाषा उन्नति है, सब उन्नति का मूल का भाव नक्कारखाने में तूती की आवाज होकर हिन्दी दिवस को सुनाई देती है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि सरकार के खिलाफ बोलने वालों को ठीक करने के लिए पुलिस द्वारा राजद्रोह कानून का दुरुपयोग किया जाता है। देशद्रोह का प्रावधान आईपीसी की धारा 124 ए एक औपनिवेशिक युग है जिसका इस्तेमाल अंग्रेजों के खिलाफ असंतोष या विरोध को शांत करने और महात्मा गांधी और बाल गंगाधर तिलक के खिलाफ इस्तेमाल किया गया था। क्या सरकार आजादी के 75 साल बाद इसे बरकरार रखना चाहती है?

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस रमना की अध्यक्षता वाली बैंच ने कहा कि जमीनी हालात चिंता का विषय है। यदि किसी राज्य सरकार को विपक्ष की आवाज पसंद नहीं आती है, तो वह सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वाले व्यक्तियों के समूहों को फंसाने के लिए धारा 124 ए का थप्पड़ मारती है।
लोकतंत्र में कानून के शासन का प्रावधान उपयोग सुशासन के लिये किया गया है, लेकिन राजनीतिक सत्ता की प्रवृत्ति यथास्थिति बनाए रख कर स्वयं को बनाए रखने की होती है। इसके लिये वह न सिर्फ अपनी सुविधा के लिहाज से कानून बनाती है, बल्कि पुराने अलोकतांत्रिक और दमनकारी क़ानूनों को भी भी बनाये रखने का जतन करती है। औपनिवेशिक दौर का राजद्रोह कानून इसकी मिसाल है। लोकतंत्र में अधिनायकवादी प्रवृत्तियों के हावी होने से इस कानून का दुरुपयोग जनता की आवाज़ दबाने और लोकतांत्रिक विचारों के दमन के लिये ज़्यादा होने लगे तो आश्चर्य नहीं। पिछले सात वर्षों में जन-आकांक्षाओं के प्रति सत्ता का उपेक्षा भाव बढ़ा है और जान-समझकर संवादहीनता को रणनीति के रूप में अपनाया जा रहा है। फलस्वरूप एक तरफ़ किसान पिछले सात माह से लगातार आंदोलनरत है, दूसरी तरफ़ पिछले कुछ वर्षों से बुद्धिजीवियों को औपनिवेशिक कानूनों के तहत जेलों में डाल दिया गया है।                                                                                
ऐसा नहीं है कि राजग शासन के पूर्व राजद्रोह कानून का इस्तेमाल बुद्धिजीवियों की आवाज़ को दबाने के लिए पहली बार हो रहा है। पूर्ववर्ती सरकारों ने भी इसका इस्तेमाल बुद्धिजीवियों को प्रताडि़त करने के लिये किया है। डॉ. विनायक सेन का मामला इसका उदाहरण है। ज़ाहिर है, भारतीय लोकतंत्र का पूर्ण लोकतांत्रिकीकरण अब भी एक स्वप्न है लेकिन वह दु:स्वप्न में रूपांतरित हो जाएगी, इसकी कल्पना कभी नहीं की गई थी। 1975 के आपातकाल की घोषणा के साथ यह दु:स्वप्न चरितार्थ हुआ था। मौजूदा दौर में दु:स्वप्न की दुर्भाग्यपूर्ण वापसी हो रही है। दरअसल दमन की प्रवृत्ति सत्ता के चरित्र में निहित है लेकिन यह मानकर सत्ता के दमनकारी स्वभाव को प्रश्नांकित करने या उसे चुनौती देने वाली ज़मीनी ताक़तों को खारिज नहीं किया जा सकता, जो कि सत्ता द्वारा किया जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के विचारों से पूछा कि क्या ब्रिटिश काल के राजद्रोह प्रावधान भारतीय दंड संहिता में धारा 124 ए, महात्मा गांधी और बाल गंगाधर तिलक जैसे स्वतंत्रता सेनानियों को असंतोष और विरोध को दबाने के लिए दंडित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, तब भी बरकरार रखा जाना चाहिए। वर्तमान समय तक बिना किसी जवाबदेही के पुलिस द्वारा इसके दुरुपयोग के सबूत जारी रहे। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा है कि बढ़ई के हाथ में एक आरी सुंदर फर्नीचर बनाने में उसकी मदद करने का एक उपकरण है। अगर बढ़ई पेड़ों पर अपनी आरी घुमाता है, तो जंगल नष्ट हो जाता है। यह धारा (124ए) दुरुपयोग के लिए भारी शक्तियां देती है। यह बढ़ई को फर्नीचर बनाने के लिए लकड़ी के टुकड़े को काटने के लिए आरी देने जैसा है। अगर वह इसका इस्तेमाल पूरे जंगल को काटने के लिए करता है, तो विनाशकारी प्रभाव की कल्पना करें।

द्रोह या राजद्रोह, देशद्रोह वह होता है जिससे देश की अखंडता और संप्रभुता को खतरा होता है, लेकिन असहमति इसके ठीक विपरीत लोकतंत्र में संवैधानिक अधिकार है। जब कोई सत्ता असहमति से डरने लगे इसका स्पष्ट अर्थ है कि वह लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास नहीं रखती है। जब सत्ता असहमति के स्वर को देशद्रोह के नाम पर दबाने लगे या मिटाने लगे तब सत्ता का तानाशाही चेहरा लोकतंत्र की ओट में छुप नहीं पाता है। यह पहला मौका नहीं है जब उच्च न्यायालय ने सरकार को टोका या याद दिलाया कि असहमति का प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकार है। इससे राजद्रोह कहकर दबाया या मिटाया नहीं जा सकता है।

भारत के संविधान के तहत, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को केवल अनुच्छेद 19 (2) के तहत निर्दिष्ट उचित प्रतिबंध के अधीन किया जा सकता है जिसमें राजद्रोह शामिल नहीं है। संविधान सभा ने स्वयं सर्वसम्मति से राजद्रोह को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने के आधार के रूप में शामिल नहीं करने का संकल्प लिया। संविधान के मसौदे के अनुच्छेद 13 के तहत शुरू में राजद्रोह को शामिल किया गया था, जो वर्तमान अनुच्छेद 19 के बराबर है। के एम मुंशी, टीटी कृष्णमचारी और सेठ गोविंद दास के कहने पर, संविधान सभा ने राजद्रोह को अधिकार के अपवाद के रूप में शामिल नहीं करने का संकल्प लिया।
सुप्रीम कोर्ट ने 1962 में पत्रकार केदारनाथ सिंह के मामले में पांच जजों की बेंच के जरिए कहा है कि धारा 124ए आईपीसी के तहत कथित रूप से देशद्रोही भाषण और अभिव्यक्ति को तभी दंडित किया जा सकता है जब भाषण हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था के लिए उकसाने वाला हो।

केंद्र सरकार की एजेंसी एनसीआरबी ने आईपीसी-124ए के तहत दर्ज हुए केस, गिरफ्तारियों और दोषी पाए लोगों का 2014 से 2019 तक का डेटा जारी किया है। इसके मुताबिक 2014 से 2019 तक 326 केस दर्ज हुए, जिनमें 559 लोगों को गिरफ्तार किया गया, हालांकि 10 आरोपी ही दोषी साबित हो सके। क्लाइमेट एक्टिविस्ट दिशा रवि, डॉ. कफील खान से लेकर शफूरा जरगर तक ऐसे कई लोग हैं जिन्हें राजद्रोह के मामले में गिरफ्तार किया जा चुका है। हाल में वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ पर दर्ज राजद्रोह के मुकदमे को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था। तब उसने यह भी कहा था कि नागरिकों को प्राधिकारियों की ओर से उठाए गए कदमों या उपायोग की आलोचना का अधिकार मिला हुआ है।

पिछले दो दशकों में देशद्रोह कानूनों के तहत पत्रकारों, कई लेखकों, कार्यकर्ताओं और मशहूर हस्तियों को गिरफ्तार किया गया है। कुछ प्रसिद्ध मामले राजनेता प्रवीण तोगडिय़ा (2003), डॉक्टर बिनायक सेन (2007), लेखक अरुंधति रॉय (2010), कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी (2012), राजनेता हार्दिक पटेल (2015), अभिनेता कंगना रनौत (2020) के खिलाफ दर्ज किए गए हैं। राजद्रोह के रूप में होने वाली प्रत्येक गिरफ्तारी ने इस कानून के दुरुपयोग पर बहस छेड़ दी थी।
जनवरी 2020 में, दक्षिणी राज्य कर्नाटक के बीदर में शाहीन प्राइमरी स्कूल के छात्रों द्वारा मंचित एक नाटक के परिणाम स्वरूप प्रधानाध्यापक और स्कूल के प्रबंधन के खिलाफ देशद्रोह का मामला सामने आया। यह नाटक विवादास्पद नागरिकता (संशोधन) अधिनियम पर था, जो कथित तौर पर मुसलमानों के साथ भेदभाव करता है। पुलिस ने लड़की की मां 35 वर्षीय नजबुन्निसा और प्रधानाध्यापिका फरीदा बेगम को गिरफ्तार कर लिया। फरवरी 2021 में, दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन के समर्थन में युवा जलवायु कार्यकर्ता ग्रेटा थुनबर्ग के एक ट्वीट ने भारत में एक 22 वर्षीय जलवायु कार्यकर्ता दिशा रवि को पुलिस के जाल में डाल दिया। ऐसी बहुत सी घटनाएं हैं जो बताती हैं कि इस कानून का दुरूपयोग सत्ता हमेशा से करती रही है फिर वो किसी भी पार्टी की सत्ता क्यों ना हो।
प्रसंगवश कृष्ण कल्पित की कविता
भारत एक खोया हुआ देश है
सबको अपना-अपना
भारत खोजना पड़ता है
मै भी इस भूभाग पर भटकता हुआ
अपना भारत खोज रहा हूं ।