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सुभाष मिश्र की कलम से -किसकी है जनवरी किसका अगस्त

सुभाष मिश्र की कलम से -किसकी है जनवरी किसका अगस्त

-सुभाष मिश्र

बाबा नागार्जुन की कविता है-
किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है?
कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्त है?
सेठ है, शोषक है, नामी गला-काटू है
गालियां भी सुनता है, भारी थूक-चाटू है
चोर है, डाकू है, झूठा-मक्कार है
कातिल है, छलिया है, लुच्चा-लबार है
जैसे भी टिकट मिला, जहां भी टिकट मिला
शासन के घोड़े पर वह भी सवार है
उसी की जनवरी छब्बीस
उसी का पंद्रह अगस्त है
बाकी सब दुखी है, बाकी सब पस्त है
कौन है खिला-खिला, बुझा-बुझा कौन है
कौन है बुलंद आज, कौन आज मस्त है
खिला-खिला सेठ है, श्रमिक है बुझा-बुझा
मालिक बुलंद है, कुली-मजूर पस्त है
सेठ यहां सुखी है, सेठ यहां मस्त है
उसकी है जनवरी, उसी का अगस्त है

आज मतदाता दिवस है। लोकतंत्र में मतदाता सर्वोपरि होता है। नेताओं को इस सर्वोपरि मतदाता की याद चुनाव के समय ज्यादा आती है। मतदाता पार्टियों का घोषणा-पत्र प्रत्याशी का परफार्मेंस चालचरित्र चेहरा आदि को देखकर वोट देता है। इधर, मतदाता भ्रमित हैं कि वो जिस विधायक को वोट देता है वो विधायक रातों-रात या तो अपनी पार्टी बदल लेता है या फिर दूसरी पार्टी की सरकार बनाने के लिए अपने पद से इस्तीफा दे देता है और सत्तारूढ़ पार्टी में जाकर लाभ के पद पर जाकर काबिज हो जाता है। पं. बंगाल में चुनाव होने वाले हैं और हमारे गृहमंत्री बड़े फक्र से मीडिया के जरिए ये बता रहे हैं कि वहां के बहुत सारे विधायक उनके संपर्क में हैं और वो त्रिमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने वाले हैं। मतदाता दिवस पर जागरूक मतदाता यह सोच रहा है कि उसने अपने विधायक-सांसद को पांच साल के लिए चुना था पर ये तो बीच में ही उस पार्टी को छोड़कर जा रहे हैं जिस पार्टी को उसने वोट दिया।

मतदाता अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहे वह मतदान केंद्र में जाकर अपने विवेक के साथ सोच-समझकर मतदान करें। इस उद्देश्य को लेकर हर साल 25 जनवरी को राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाया जाता है। मतदाता दिवस को मनाने के पीछे यह मंशा है कि देश का हर नागरिक जो मतदाता है वह चुनाव में भागीदारी की शपथ लें और देश के भावी भविष्य की नींव रखें। ऐसा कहा जाता है कि हर एक व्यक्ति का वोट का वोट राष्ट्र के निर्माण में भागीदार होता है।
चुनाव निष्पक्ष हो इसलिए देश में एक भारत निर्वाचन आयोग बनाया गया है। जिसकी देखरेख में हर बार लोकसभा और विधानसभा के चुनाव होते हैं। राज्यों की स्थानीय इकाईयों का चुनाव कराने के लिए राज्य निर्वाचन आयोग जैसी संस्थाएं हैं। पूरी दुनिया में सबसे महंगा चुनाव भारत में होता है। जिसमें करीब 50 हजार करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। अमेरिका जैसे संपन्न देश भी चुनाव पर इतना पैसा खर्च नहीं करता। भारत में साल 2000 लोकसभा चुनाव में 81.5 करोड़ लोग वोट देने योग्य थे लेकिन इनमें से 55 करोड़ लोगों ने अपने मताधिकार का उपयोग किया। जो लोग वोट देने के लिए योग्य थे उनसे से 1.5 करोड़ मतदाता थे जो पहली बार अपने मताधिकार का उपयोग कर रहे थे इनकी आयु 18 से 19 साल थी। देश के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि ट्रासजेंडर को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर वोट डालने की पात्रता मिली और देश के 38325 ट्रासजेंडर मतदाता के रूप में मतदाता सूची में शामिल हुए। भारत निर्वाचन आयोग ने मतदाता जागरूकता के लिए यूं तो बहुत सारे अभियान चलाए। खास करके उसने देश की 65 फीसदी युवा आबादी को ध्यान में रखकर अभियान चलाया। मतदाता जागरूकता अभियान में लाख इस बात की दुहाई दी जाए कि देश का मतदाता सांप्रदायिकता और जातिवाद से उपर उठकर वोट दे किन्तु यह चाह कर भी संभव नहीं हो पा रहा है। देश की बहुत सी राजनीतिक पार्टियां धर्म-जाति और धन-बल के आधार पर वोट कबाड़ती हैं और बहुत सारे ऐसे लोगों को टिकट देती है जो इस तरह की प्रवृत्ति के हैं। इनमें से बहुत से लोगों पर आपराधिक रिकार्ड भी होता है। कोविड-19 के चलते भारत निर्वाचन आयोग ने ऑनलाइन मतदाता जागरूकता अभियान भी चलाया। इस बार भारत निर्वाचन आयोग देश के 80 करोड़ मतदाता को इलेक्ट्रानिक इलेक्टर्स फोटो आईडेंटिटी एप (ई-इपिक) देना चाहता है जिसमें मतदाता के पहचान पत्र को डिजिटल रूप में रखा जाएगा। इ-इपिक के जरिए आधार कार्ड की तरह ही मतदाता पहचान पत्र भी डाउनलोड होकर ई-वायलेट का हिस्सा बन जाएगा। बैंक के केवाइस की तरह मोबाईल नंबर के साथ ई-मेल की अनिवार्यता होगी।

मोबाईल नंबर चुनाव आयोग की मतदाता सूची में दर्ज होते ही एप के माध्यम से आवेदन करने पर मेल और एक संदेश फोन पर प्राप्त होगा। इसमें एक बार इस्तेमाल होने वाला ओटीपी होगा जो कि आपका पासवर्ड होगा। इसका प्रयोग करके कार्ड प्राप्त किया जा सकेगा।

इसमें दो क्यूआर कोड होंगे, एक में मतदाता की संपूर्ण जानकारी और दूसरे में उसके इलाके में होने वाले चुनाव और उससे जुड़ी जानकारियां होंगी। आयोग हार्ड कापी का विकल्प भी जारी रखेगा और इसके लिए 25 रुपये का शुल्क लगेगा। डिजिटल व्यवस्था से कार्ड खोने और नये कार्ड प्राप्त करने के झंझट से मुक्ति मिलेगी, साथ ही आयोग को भी कार्ड की डिलीवरी से राहत मिलेगी।

भारत निर्वाचन आयोग निष्पक्ष चुनाव और मितव्ययिता पूर्ण चुनाव के लिए अपनी ओर से अलग-अलग आब्र्जवर नियुक्त करती है ताकि चुनाव शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो। व्यय-सीमा की तमाम बंदिशों और चेकलिस्ट के बाद चुनाव में खड़े प्रत्याशी और पार्टी मतदाता को प्रलोभित करने का अवसर नहीं छोड़ती मतदाताओं को चुनाव के समय बहुत सारी सामग्री के साथ ऐसे झूठे वायदे भी किए जाते हैं जो कभी पूरे नहीं होना है। मतदाता को जाति-धर्म संप्रादाय आदि के माध्यम से भी बरगलाया जाता है। मतदाता जागरूकता अभियान के बावजूद अभी भी हमारे देश में बड़े पैमाने पर खासकर के शहरी क्षेत्र में मतदाता की उदासीनता बनी हुई है। पढ़ा-लिखा आदमी भी वोट डालने नहीं जाता। मतादाता जागरूकता अभियान चलाने वालों को इस बारे में नए सिरे से सोचने की जरूरत है कि ऐसा क्यों हो रहा है। मतदाता जागरूकता अभियान के साथ साथ राजनीतिक पार्टियों को भी जागरूकता का अभियान चलाना होगा। मतदाता ठगा न जाए इसके लिए कड़े दलबदल कानून बनाने होंगे, केवल नोटा के भरोसे काम नहीं चलेगा।