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भाजपा : कहां गये वो नारे और नेता?

भाजपा : कहां गये वो नारे और नेता?

 व्ही. एस.भदौरिया
जिनकी उम्र आज साठ साल से अधिक हो चुकी है, उन्हें अपने बचपन में कांग्रेस जैसी व्यापक जनाधार वाली पार्टी और एक से बढ़कर एक तेज तर्रार, जुझारू समाजवादियों के वर्चस्व वाले प्रतिपक्ष के सामने  सिकुड़ी सकुचाई सी 'जनसंघ' नामक एक पार्टी,दीपक चुनाव चिन्ह और उसके बेहद शिष्ट व सुसंस्कृत नेताओं और उनके चुनावी नारे जरूर याद होंगे.तमाम नारों की भीड़ मे तब एक नारा गांव वालों बहुत लुभाता था...
 हर हाथ को काम, हर खेत को पानी,
 घर घर दीपक, जनसंघ की निशानी ।।
इस नारे को सुनकर लगता था कि बेरोजगार और किसान जनसंघ के राजनैतिक चिंतन के केंद्र मे हैं.तब जनसंघ का जनाधार देश के बंटवारे के बाद पाकिस्तान वाले हिस्से से लुट पिट कर आये पंजाबी व सिंधी समाज तथा छोटे दुकानदारों तक सीमित था,धीरे धीरे अन्य वर्गों में विस्तार होना शुरू हुआ. संघ की शाखाओं में चोरी छिपे जाने वाले लड़के घर में मार व स्कूल में फटकार खाते थे,लेकिन 'सरस्वती शिशु मंदिर' के नाम से संघ द्वारा संचालित विद्यालयों में छात्रों को अपने माता पिता,बड़े बुजुर्गों के पैर छूने का अभ्यास कराने,अनुशासन व भारतीय संस्कृति के महान आदर्शों की शिक्षा देने जैसे नवाचारों के प्रति लोगों मे उत्सुकता व प्रशंसा का भाव उत्पन्न होने लगा.शिशु मंदिर के शिक्षकों,संघ व  जनसंघ के कार्यकर्ताओं की कुर्ता धोती वाली देशी वेशभूषा,शिष्टता तथा संस्कृतनिष्ठ हिंदी भाषा  आदरभाव उत्पन्न करती थी.अंग्रेजी के बढ़ते बोलबाले के दौर मे शुद्ध प्रांजल हिंदी भारतीयता के प्रति गौरवबोध जगाती थी.
कट्टर कांग्रेसियों व समाजवादियों द्वारा अपने बच्चों को शिशु मंदिरों मे पढ़ने भेजने की उन दिनों निंदामिश्रित चर्चा होती थी तथा उनके लिए 'गुड़ खायें गुलगुला से परहेज' जैसे कटाक्ष भी किये जाते थे.
लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा तत्कालीन कांग्रेस सरकार के विरुद्ध उभर रहे छात्र आंदोलन को समर्थन दिये जाने से  सरकार विरोधी भावनाएं जोर पकड़ने लगी,धीरे धीरे जनाक्रोश बढ़ता गया.सरकार विरोधी आंदोलन मे वैसे मुख्य भूमिका समाजवादी नेताओं की थी,लेकिन बड़ी चतुराई से संघ ने जेपी का भरोसा जीतने मे सफलता हासिल कर ली,और संघ के साथ उसकी राजनैतिक शाखा जनसंघ के नेता व कार्यकर्ता जेपी की छतरी के नीचे आ गये.  
चारों ओर से घिरती जा रही इंदिरा जी ने आपातकाल की घोषणा कर दी व सभी नेताओं को जेल मे बंद कर दिया.समाजवादी नेताओं को पहले से हड़ताल करने,पुलिस की लाठियां खाने व आये दिन जेल जाने का अभ्यास था,लेकिन जनसंघ के नेताओं के लिए जेल जाना नया अनुभव था.सैद्धांतिक व वैचारिक दूरियों के बावजूद जेल की चक्की में पिसकर निकले नेताओं में परस्पर निकटता स्थापित होना स्वाभाविक था,इसी पृष्ठभूमि मे आपातकाल हटने के बाद होने वाले लोकसभा चुनावों के पहले वामपंथियों को छोड़कर शेष लगभग सभी विपक्षी दलों ने नवगठित 'जनता पार्टी' में विलय के प्रस्ताव पर सहमति दे दी.जनता पार्टी की प्रचंड जीत,मोरार जी देसाई के नेतृत्व मे केंद्र में बनी पहली गैर कांग्रेसी सरकार में काबिल मंत्रियों की भरमार थी,ज्यादातर मंत्री, प्रधानमंत्री बनने की काबिलियत रखते थे.कहा जाता है कि,नेहरू जी के प्रधानमंत्रित्व वाले भारत के पहले मंत्रिमंडल के बाद मोरारजी देसाई की सरकार में अब तक के सर्वाधिक योग्य मंत्री रहे हैं.



जनसंघ घटक से मंत्री बने अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने इस सरकार मे अपनी प्रभावी उपस्थिति से देश का ध्यान आकृष्ट किया.अपनी विलक्षण वकृत्वकला के कारण पहले से लोकप्रिय अटलजी ने विदेश मंत्री के रूप मे अमिट छाप छोड़ी.आडवाणी जी की अप्रतिम संगठन क्षमता और अटलजी की जनस्वीकार्यता ने जनसंघ से वाया जनता पार्टी बनी भाजपा के विस्तार की मजबूत आधारशिला रख दी.यह अलग बात है कि वही आडवाणी जी आज अपने सबसे प्रिय शिष्य की उपेक्षा व प्रताड़ना के शिकार हैं,उनकी तपस्या के मीठे,सुस्वादु और पौष्टिक फल खाकर उनके शिष्य के सीने की माप भले छप्पन इंच हो गयी हो पर दिल लगातार सिकुड़ता चला गया है.
जनसंघ व भाजपा के पुराने चुनावी घोषणापत्रों व नारों पर गौर करें तो उसमें गांव,कृषि, मजदूरों और किसानों को हर चुनाव में सर्वोच्च वरीयता दी जाती रही है,लेकिन आज जब भाजपा को किसानों की तकदीर बदलने का मौका मिला है,वह देश के अन्नदाता को हिकारत की नजरों से देखते हुए,अपने प्रच्छन्न  कार्पोरेट प्रेम को पूरी बेशर्मी के साथ प्रकट कर रही है.अचानक लगाये गये लाकडाऊन के दौरान घर लौटना चाह रहे प्रवासी मजदूरों के साथ मोदीजी का निर्दय व्यवहार अभी विस्मृत भी नहीं हुआ था कि,किसानों के साथ ठीक वैसी ही हठधर्मिता और कठोरता का रवैया सामने आ गया.जब भयावह ठंड में खुले आसमान के नीचे इंसाफ मांगने के लिए सड़क पर बैठे किसान पानी की बौछारें व आंसू के गोले झेल रहे थे, तब हमारे भूतो न भविष्यत प्रधानमंत्री बनारस में लेजर शो में शामिल होकर थिरक रहे थे.वाह क्या सीन है ?
आज खेत में काम करने वाले किसान न्याय की गुहार लगा रहे हैं.अब हर हाथ को काम और हर खेत को पानी देने वाले नारे कहां गुम हो गये ?  कहां गये वो नेता जिन्होंने खुद चना चबैना खाकर भाजपा को सत्ता सिंहासन तक पहुंचाया ? कहां गयी वो भाजपा जिसने शुचिता की राजनीति का वायदा किया था ? कहां गया वो संघ जो अटलजी के हर काम मे अडंगेबाजी करके अपनी सुप्रीमेसी प्रदर्शित करता था ? कहां गये राजनाथ सिंह जिन्होंने कृषिमंत्री के रूप मे फसल बीमा सहित अनेक किसान हितैषी नीतियां लागू कर किसानों का विश्वास जीता था ? अपने कार्पोरेट दोस्तों की उत्कट अभिलाषा की पूर्ति के लिए देश भर के किसानों की जिंदगी दांव पर लगाने की दु:खद घटना पर जो मौन साधे हैं या अन्याय के समर्थन में कुतर्क गढ़ रहे हैं या तोते की तरह अपने आका की सिखायी पढ़ाई गयी बातें दुहरा रहे हैं,उन सबको किसान की हाय बहुत भारी पड़ेगी.
आज किसान खुद को अकेला और असहाय महसूस कर रहे हैं,भारत की सरकार और कोर्ट उनकी पीड़ा का संज्ञान नहीं ले रही है.आइये अन्नदाता के साथ खड़े होकर जगत नियंता से अपने हुक्मरानों को सद्बुद्धि देने के लिए प्रार्थना करें.