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कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः डर का धंधा

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः डर का धंधा

घर तो होता नहीं किसी का

होता तो क्यों छोड़ चले जाते हैंं उसको

न जाने किस घर में हैं


डर होता है खूब सभी में

अपने-अपने डर में हैं

जीवन है तो बीमारी है


डर तो बड़ी महामारी है

जब से जनम हुआ फैली है

डर के कारण जीवन की चादर मैली है


छुआछूत है डर के कारण

डर के कारण भाग्य-भूत है

डर राजा का राजदूत है


डर फैलाओ,राज करो,यह महामंंत्र है

डरे हुओं से रचा गया यह लोकतंत्र है

डर की ऐसी छूत लगी है


दुनिया रची-बसी है डर में

जब दुनिया में डर का रोना-धोना है

तब फिर डर का धंधा होना ही होना है


जीवन के हर किस्से में

मौत सभी के हिस्से में

जब मौत किसी से डरे नहीं

तो जीवन क्यों डरता रहता है

ऐसा क्या करता रहता है