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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - खनिज संपदा के अधिकारों का हस्तांतरण

 प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - खनिज संपदा के अधिकारों का हस्तांतरण

-सुभाष मिश्र

छत्तीसगढ़ अपनी वन और खनिज संपदा के लिए पूरे देश में अपनी अलग पहचान रखता है। छत्तीसगढ़ में कोयला, लोहा, बाक्साइड के अपार भंडार है। छत्तीसगढ़ में जहां धरती के ऊपर सघन वन आच्छादित हैं वहीं यहां की रत्नगर्भा धरती में दुनिया का सर्वश्रेष्ठ हीरा भी किंबरलाईट पाईप से भरा पड़ा है। अमीर धरती के गरीब लोगों का यह छत्तीसगढ़ किस तरह से अपनी खनिज संपदा से प्राप्त राशि यानी डी.एम.एफ (डिस्ट्रेक्ट माइनिंग फंड) का उपयोग करें इसको लेकर केंद्र राज्य के बीच रार मची हुई थी। केंद्र सरकार ने 18 अगस्त 2021 को राज्य सरकार को पत्र लिखकर डीएमएफ की जिला परिषद से प्रभारी मंत्री को हटाकर जिले के कलेक्टर को इस परिषद का अध्यक्ष बना दिया गया है। राज्य सरकार ने केंद्र से आग्रह किया था कि प्रभारी मंत्री को ही परिषद का अध्यक्ष बनाया जाये। केंद्र ने राज्य की बात नहीं मानी और अंतत: राजपथ में कलेक्टर की अध्यक्षता वाली परिषद की अधिसूचना जारी हो गई।

डीएमएफ फंड को लेकर जारी गाइडलाइन के अनुसार जिले के प्रशासनिक प्रमुख डीएमएफ के अध्यक्ष के रूप में कार्य करेंगे और जिले में खनन प्रभावित क्षेत्रों के चयनित प्रतिनिधियों को डीएमएफ के उद्देश्यों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए देश के सभी खनन प्रभावित क्षेत्र के जिलों में शासी परिषद के सदस्यों के रूप में शामिल किया जायेगा। इससे डीएमएफ के अंतर्गत निधि का सुचारू प्रबंधन सुनिश्चित होगा और डीएमएफ के अंतर्गत परियोजनाओं के निष्पादन में जनप्रतिनिधियों की समस्याओं का समाधान भी होगा। दरअसल डीएमएफ फंड के प्रमुख को लेकर केंद्र सरकार ने 23 अप्रैल 2021 को ही स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी कर दिया था, लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार ने 2 जून 2021 को केंद्र सरकार को पत्र भेजकर ये आग्रह किया था कि डीएमएफ की शासी परिषद के अध्यक्ष के रूप जिले के प्रभारी मंत्रियों को अनुमति दी जाये, लेकिन उस आग्रह को केंद्र सरकार ने ठुकरा दिया है। इस संबंध में जारी अधिसूचना के अनुसार जिले के लोकसभा सदस्य शासी परिषद के सदस्य होंगे, यदि किसी जिले में लोकसभा के एक से अधिक सांसद सदस्य हो तो उस जिले को लोकसभा के सभी सांसद सदस्य, शासी परिषद के सदस्य होंगे तथा यदि लोकसभा के किसी सांसद सदस्य का निर्वाचन क्षेत्र एक से अधिक जिलों के अंतर्गत आता है तो लोकसभा का सांसद सदस्य ऐसे सभी जिलों के शासी परिषद के सदस्य होंगे।

राज्य के राज्यसभा का सांसद सदस्य अपने द्वारा चयनित किसी एक जिले शासी परिषद के सदस्य होंगे। राज्यसभा के सांसद सदस्य अपने द्वारा चयनित जिलों का नाम राज्य के खनिज साधन विभाग के प्रभारी सचिव को संसूचित करेंगे।

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार बनने के बाद से डीएमएफ के मामले में नियमों में बदलाव करते हुए राज्य सरकार ने डीएमएफ के लिए प्रभारी मंत्रियों को अध्यक्ष बना दिया था। लेकिन अब केंद्र सरकार की ओर से जारी आदेश में फिर से कलेक्टर को ही डीएमएफ का पॉवर दे दिया गया है। खनिज संपदा के मामले में समृद्ध माने जाने वाले छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में डीएमएफ फंड काफी महत्वपूर्ण है। छत्तीसगढ़ में डीएमएफ को लेकर पहले से चल रही व्यवस्था को कांग्रेस सरकार बनने के बाद बदल दिया गया। कांग्रेस सरकार आने के बाद राज्य सरकार ने नई व्यवस्था बनाई थी इसके मुताबिक राज्य में जिलों की खनिज संस्थान यानी डीएमएफ कमेटी में जिले के प्रभारी मंत्री अध्यक्ष रहेंगे और कलेक्टर को सचिव की जिम्मेदारी दी गई थी। कांग्रेस सरकार ने राज्य के डीएमएफ कमेटियों में विधायकों को सदस्य के रूप में शामिल किया था। दरअसल, विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस ने लगातार डीएमएफ फंड में गड़बड़ी को लेकर आरोप लगाया था और सरकार में आने के बाद उन्होंने इस व्यवस्था में बदलाव कर दिया। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रमन सिंह ने कहा कि जब हमारी सरकार थी तब किसी मंत्री ने डीएमएफ के कामों में हस्तक्षेप नहीं किया। मंत्रियों के हस्तक्षेप से डीएमएफ का राजनीतिकरण हो रहा था। बंदरबांट हो रही थी। मंत्री विधायकों को काम दे देते थे। जिससे डीएमएफ की आत्मा मर रही थी। अब केंद्र सरकार की ओर से लाई जा रही पॉलिसी से इसमें पारदर्शिता आएगी।

छत्तीसगढ़ में खनिज से बड़े पैमाने पर राशि आती है और खनिज बाहुल्य राज्य होने के चलते छत्तीसगढ़ में यह राशि काफी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है, छत्तीसगढ़ खनिज संपदा से परिपूर्ण राज्य है। कोयला, लोहा, बाक्साइट और लोहा जैसा खनिज छत्तीसगढ़ में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। डीएमएफ की राशि से ही प्रभावित क्षेत्र का विकास होता है। इस फंड में विधायकों, सांसदों, मंत्री और जनप्रतिनिधियों के हस्तक्षेप की बात भी सामने आती रही है और खनिज प्रभावित इलाकों की बजाए उस राशि का शहरों में और अन्य सौंदर्यीकरण जैसे कार्यों में खर्च किया जा रहा है, ऐसी जानकारी भी प्रकाश में आती रही है।

राजधानी रायपुर में भी डीएमएफ फंड की राशि से सौंदर्यीकरण के कई काम किए गए हैं। कटोरा तालाब का सौंदर्यीकरण की बात हो या फिर नालंदा परिसर के निर्माण की बात हो, यह सारे निर्माण कार्य डीएमएफ की राशि से किए गए हैं। इसके अलावा आक्सीजोन का निर्माण भी डीएमएफ फंड से ही किया गया था। दंतेवाड़ा में भी निर्माण कार्यों को लेकर कांग्रेस ने तत्कालीन राज्य सरकार पर आरोप लगाया था। यही वजह है कि सत्ता मिलने के बाद कांग्रेस ने डीएमएफ को लेकर नए सिरे से समिति का गठन कर दिया था। जिसमें प्रभारी मंत्री को पावरफुल बनाया गया था।

हमारे देश में औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के नाम पर सबसे ज्यादा नुकसान हमारी प्राकृतिक संपदा जिसमें हमारा पर्यावरण, हमारे जंगल, नदियां और हमारी धरती के भीतर दबी खनिज संपदा शामिल है। कथित विकास के नाम पर अंधाधुंध जंगलों की कटाई, जमीन से मुरुम-मिट्टी का उत्खनन, भूजल और नदी के तालाबों का अनाप-शनाप उपयोग और उसे दूषित करने की सतत प्रक्रिया निरंतर जारी है। गांव-गांव में रेत, गिट्टी, मुरुम का अवैध उत्खनन अब एक संगठित गिरोह में तब्दील हो गया है। बड़े कारपोरेट हाउस सत्ता से सांठ-गांठ कर लोहा, कोयला, बाक्साइट और वन संपदा का जिस तरह से दोहन कर रहे हैं, वह सर्वविदित है। छत्तीसगढ़ की राजनीति के नेपथ्य में जो तरह-तरह के माफिया सक्रिय है उनमें सर्वाधिक वे लोग हैं जो वनांचल क्षेत्र में जल, जंगल, जमीन को नुकसान पहुंचाकर उसका अनाप-शनाप दोहन करना चाहते हैं। अमीर धरती के गरीब लोग खनिज संपदा के दोहन को होते देखने के लिए मजबूर हैं। पंचायत से लेकर सचिवालय तक खनिज की लूट के बहुत से किस्से मशहूर हैं। बहुत लोगों ने रेत से तेल निकालने के काम में महारथ हासिल कर ली है। अक्सर रेगिस्तान में झील का ख्वाब दिखाने वाले लोग सत्ता के गलियारों में दिखाई देते हैं।