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हरित क्रांति की फिल्म में किसान

हरित क्रांति की फिल्म में किसान

ध्रुव शुक्ल

भारत में हरित क्रांति की फिल्म की निर्माता हमारी सरकारें हैं। पंडित नेहरू से लेकर श्री नरेन्द्र मोदी तक यह फिल्म बनती चली आ रही है। आधी सदी से इस फिल्म की पटकथा बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ लिख रही हैं। आजादी के बाद देश में भाँति-भाँति के राजनीतिक दलों के नेताओं और किसानों के वोट बैंक का राजनीतिक सौदा करने वाले किसान नेताओं ने इस फिल्म में नायक और खलनायक की भूमिकाएँ भी निभायी हैं। 

इस फिल्म में हम देश की धरती पर हरी-भरी फसलों के बीच किसानों की समृद्धि के चित्र देखते आये हैं। अन्न के बदले सोना उगलती धरती के उपकार के गीत भी सुनते आये हैं। पर इस धरती को जोतने वाले किसान उस संस्कृति को कैसे भूल गये जो सदियों से उत्तराधिकार में मिली खेती से जुड़ी थी। 

खेतों को ट्रेक्टरों से रौंदा गया। ज़हरीले खाद को उर्वर धरती की नसों-नाड़ियों में प्रवाहित करके उसमें आयातित बीज बोये गये। पशुओं को प्राकृतिक चारे से दूर बाज़ारू पशु आहार पर पाला जाने लगा। धरती की प्यास बुझाने वाला जल इतना नीचे उतर गया कि उसे पम्पों से ऊपर उठाना पड़ रहा है। खेती से जुड़े चूल्हे-चौके के पारंपरिक संस्कार खेतों में पराली की तरह जलकर खाक होने लगे।

देश की आबादी आधी सदी से ज़हरीला अन्न और साग-भाजी खा रही है ।अब तो नकली दूध भी पी रही है। आर्गेनिक खेती के बहुराष्ट्रीय धंधे की लूट का शिकार हो रही है। आखिर यह सब सरकार और वैश्विक बाज़ार के करार से ही तो हो रहा है और देश के समृद्ध किसान इस अनीतिपूर्ण धंधे से सहमत नज़र आते हैं। वे कर्ज़ में डूबकर घी पी रहे हैं और बाँझ होती धरती को बेचकर मालामाल हो रहे हैं। 

छोटी जोत के किसानों को इस अंधे लाभ की खेती ने इतना थका डाला है कि वे अपने छोटे-छोटे उर्वर खेतों को बेचकर खेती करना छोड़ रहे हैं। नये कानून उन्हें उनके ही खेतों में बेगारी बनाकर ही दम लेंगे। अब उनका सामना मदर इण्डिया फिल्म के सुख्खी लाला से नहीं उस वैश्विक साहूकार से है जिसे वे जानते तक नहीं।