कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः कहाँ मिलेंगे जन-गण मंगलदायक भरे बाज़ार में!

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः कहाँ मिलेंगे जन-गण मंगलदायक भरे बाज़ार में!


बने-बनाये घर मिलते बाज़ार में

बने-बनाये डर मिलते बाज़ार में

बने-बनाये पर मिलते बाज़ार में

नहीं मिलती है 

अपने मन की उड़ान भरे बाज़ार में!


बने-बनाये प्रेम मिलें बाज़ार में

बने-बनाये फ्रेम मिलें बाज़ार में

बने-बनाये गेम मिलें बाज़ार में

नहीं मिलता है

अपने मन का खेल भरे बाज़ार में!


बने-बनाये मुख मिलते बाज़ार में

बने-बनाये रुख़ मिलते बाज़ार में

बनी-बनायी तुक मिलती बाज़ार में

नहीं मिलती है

अपने मन की बात भरे बाज़ार में!


बने-बनाये नेता मिलें बाज़ार में

बने-बनाये अभिनेता मिलें बाज़ार में

बने-बनाये विक्रेता मिलें बाज़ार में

कहाँ मिलते हैं

जन-गण मंगलदायक भरे बाज़ार में!


बने-बनाये स्वाद मिलें बाज़ार में

बने-बनाये वाद मिलें बाज़ार में

बने-बनाये विवाद मिलें बाज़ार में

नहीं मिलता है

जीवन का संवाद भरे बाज़ार में!


होता रहता प्रकट, रटा-रटाया दुख

बने-बनाये सुख, पटे पड़े बाज़ार में

कहाँ ज़रूरत कुछ रचने की

सब मिलता है बना-बनाया भरे बाज़ार में!