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नरवा, गरुवा, घुरवा, बारी सब में भ्रष्टाचार है भारी, सरकार की महत्वाकांक्षी योजना में घपलेबाजी का सबसे बड़ा खुलासा

नरवा, गरुवा, घुरवा, बारी  सब में भ्रष्टाचार है भारी, सरकार की महत्वाकांक्षी योजना में घपलेबाजी का सबसे बड़ा खुलासा


कृष्णा नायक दोरनापाल

दोरनापाल:-किसानों के हित में चलाई जा रही राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी तथा आदर्श  कही जाने वाली योजना "नरवा, गरुवा, घुरवा, बारी"  जो किसानों के विशेष कर ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक विकास के लिए उन्नत कृषि की बुनियादी सुविधाओं से किसानों को लाभान्वित करने के उद्देश्य से कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। इन योजनाओं में राज्य सरकार राष्ट्रीय अंतराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पीठ थपथपा रहा है, लेकिन जिन ज़िम्मेदारों के हाथों सरकार की जन कल्याणकारी योजना सौंपी गई है, वे कैसे सरकार की योजनाओं की नैया डुबोने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। सुकमा जिले के भू-संरक्षण  के सहायक संचालक अधिकारी  कैलाश मरकाम इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण हैं।


मामला सुकमा जिले के छिंदगढ़ जनपद के ग्राम पंचायत मुर्रेपाल में 01 व गंजेनार के कस्तूरी नाला/नदी का है जहां पर 5 स्टॉप डैम का निर्माण कराया गया है। सरकार की प्राथमिक योजनाओं में एक नरवा योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में नहरों व नदियों के पानी को रोक किसानों को खेती के लिए समुचित मात्रा में पानी उपलब्ध कराने के लिए लाखों की लागत से स्टॉप डैम व चेक डैम का निर्माण कराया जा रहा है।

जिससे क्षेत्र के किसानों के साथ साथ स्थानीय निवासी भी बुनियादी विकास से लाभान्वित होंगे। इस स्टॉप डैम व चेक डैम के निर्माण से किसान को अपने खेतों में पानी आसानी से मिल सकेगा लेकिन सुकमा के सहायक भू-संरक्षण जिला अधिकारी कैलाश मरकाम  ने नरवा योजना को चौपट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। विभागीय अधिकारी कैलाश मरकाम ने स्टॉप डैम के निर्माण कार्य के नाम पर उल्टी ही गंगा बहा दी है। 


भू - संरक्षण के जिला अधिकारी कैलाश मरकाम ने स्टॉप डैम का निर्माण कर योजना की धज्जियां उड़ा दीं । मामले का पता चलते ही हमारे संवाददाता और आर टी आई एक्टिविस्ट पवन शाहा ने आर टी आई के माध्यम से मामले के दस्तावेज हासिल किए। मामले की वास्तविकता को जानने के लिए जब ज़मीनी स्तर पर पड़ताल की गयी, तो पता चला कि किसानों को लाभान्वित करने वाली योजना का भू संरक्षण विभाग के सहायक संचालक जिला अधिकारी कैलाश मरकाम ने अंधेर नगरी में नरवा योजना का काया पलट कर दिया।

अंधेर नगरी के अंधेर खाते में है योजना

 ये हैं आंकड़े - हाथ लगे दस्तावेजों के आधार पर जिला प्रशासन ने योजना  प्राथमिकता पर मनरेगा से सुकमा जिला के छिंदगढ़ विकासखंड के मुर्रेपाल व गंजेनार के कस्तूरी नाला/नदी में स्टॉप डैम के निर्माण के लिए विभाग को छिंदगढ़ ब्लॉक के ग्राम पंचायत के मुर्रेपाल में तकनीकी स्वीकृति व प्रशासकीय स्वीकृति क्रमांक 58 में 07/01/2019 को 44.86लाख, छिंदगढ़ ब्लॉक के गंजेनार ग्राम पंचायत के कस्तूरी नाला 5 स्टॉप डैम में क्रमश: भाग - 1 में तकनीकी स्वीकृति व प्रशासकीय स्वीकृति क्रमांक 153 में 04/12/2019 को 49.94लाख, भाग - 2 में तकनीकी स्वीकृति व प्रशासकीय स्वीकृति क्रमांक 154 में 04/12/2019 को 49.74 लाख, भाग - 3 में तकनीकी स्वीकृति व प्रशासकीय स्वीकृति क्रमांक 155 में 04/12/2019 को 49.38 लाख, भाग - 4 में तकनीकी स्वीकृति व प्रशासकीय स्वीकृति क्रमांक 156 में 04/12/2019 को 49.94 लाख, व भाग - 5 में तकनीकी स्वीकृति व प्रशासकीय स्वीकृति क्रमांक 157 में 04/12/2019 को 47.40 लाख रुपए की लागत राशि का 54.703 हेक्टेयर यानी 200 एकड़ के करीब किसानों को लाभान्वित करने के लिए प्रत्येक स्टॉप पर जिला प्रशासन द्वारा प्रशासकीय स्वीकृति दी गयी धी।


ये है तकनीकी अनियमितता - ग्रामीण क्षेत्रों में अमूमन किसानों को कृषि के लिए बारिश पर निर्भर होना पड़ता है। लेकिन विभागीय अधिकारी की अनियमितता की ऐसी बानगी कि स्टॉप डैम के निर्माण कार्य सरकारी तकनीकी दस्तावेज व ज़मीनी हक़ीक़त में आधा तीतर आधा बटेर हैं। किसानों को खेती में सहजता मिले, इसके लिए समय- समय पर जल निकासी के लिए अधिकतम 3 से 4 छोटे गेट बनाए जाते हैं ताकि बाढ़ की स्थिति में पानी का निकास किया जा सके। ऐसे में स्टाप डेम में 4 से अधिक गेट  बनाने से जल का जमाव कम हो जाएगा और ज़रूरत के मुताबिक किसानों को सिंचाई के लिए जितना पानी उपयोग के लिए मिलना चाहिए, वह नहीं मिल सकेगा।

जबकि विभागीय अधिकारी कैलाश मरकाम ने तकनीकी स्वीकृति के विरुद्ध जाकर नियम से ज्यादा हर स्टॉप डैम में 9 से 10 गेट बना दिए है। इसी खराब गुणवत्तायुक्त निर्माण की वजह से कई स्टॉप डैम बारिश में बह गये। स्टॉप डैम के लिए इस्तेमाल किये गये गेट नदियों व नालों में बह गए। बहे गेट का इस्तेमाल ग्रामीण पशुपालन के लिए झोपड़ियां और मछलियों को पकड़ने के रूप में उपयोग कर रहे हैं।

वहीं स्टीमेट के तकनीकी मापदंड व ड्राइंग के आधार पर स्टीमेट के आइटम नंबर (तकनीकी वस्तु) 14/2606/S/SOR/WRD में स्टॉप डैम के निर्माण में 3 लाख की लागत से  1.50 व 1.00 मापदंड से 1.20टन के 2 नग  स्लूजिंग गेट को लगाया जाना चाहिए था। जिससे नदी व नहर के पानी की धारा (प्रवाह) को रोक कर किसानों के खेतों तक समूची मात्रा में सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध हो सके। इतना ही नहीं भू संरक्षण के सहायक संचालक जिला अधिकारी कैलाश मरकाम ने प्रशासकीय व तकनीकी स्वीकृति के नियमों का सरासर उल्लंघन करते हुए  स्टॉप डैम के स्वीकृति पर चेक डेम का निर्माण कर योजना व नियमों की उल्टी गंगा बहा दी।


प्रशासकीय स्वीकृति नियम के विरुद्ध कराया गया निर्माण - 

किसी भी अधोसंरचना के निर्माण के लिए सरकार द्वारा तकनीकी मापदंड तय किये जाते हैं, जिसके अनुरूप निर्माण कार्य कराए जाने की अपेक्षा व निर्देश के साथ प्रशासकीय स्वीकृति  दी जाती है। इस दौरान किसी तकनीकी मापदंड में बदलाव की स्थिति में प्रशासन के समक्ष युक्तियुक्त कारण प्रस्तुत कर संशोधन किया जाना होता है। इसके विरुद्ध जाकर निर्माण कार्य कराया जाना प्रशासन के नियमों का उल्लंघन कर सरकार की राशि का गलत रूप से इस्तेमाल करना गबन के दायरे में आता है, जिसका कि प्रशासन द्वारा वैधानिक कार्यवाही के साथ-साथ संबंधित से गबन राशि की वसूली का प्रावधान है।जिसका उल्लेख निर्माण कार्य के कार्य आदेश में स्पष्ट रूप से किया जाता है। बावजूद इसके नियमों को ताक में रखकर विभागीय अधिकारी द्वारा स्टाप डेम के निर्माण कार्य में अनियमितता बरती गयी है।

हितग्राही नहीं, जिला अधिकारी ले रहे योजना का लाभ -

 किसानों को लाभान्वित करने के उद्देश्य से सरकार की प्राथमिक योजनाओं का लाभ भले ही हितग्राहियों को मिले या न मिले, पर जिले के विभागीय अधिकारी निर्माण कार्य की आड़ में योजना का भरपूर लाभ ले रहे हैं। किसानों को सिंचाई से लाभान्वित करने के लिए नियमों के विरुद्ध कराए गए स्टॉप डैम के निर्माण से अब  न तो किसानों को कोई लाभ मिल पा रहा है और न ही स्थानीय रहवासियों को।  योजना के नाम पर विभागीय अधिकारी कैलाश मरकाम ने कागजी घोड़े दौड़ाकर शासन व प्रशासन के करोड़ों रुपए का भ्रष्टाचार कर डाला।


मामले की जांच के बाद ज़िम्मेदार पर होगी कठोर कार्यवाही - डी. एन. कश्यप 

- मुख्य कार्यपालन अधिकारी  (सी.ई.ओ.) जिला पंचायत सुकमा श्री डी.एन. कश्यप ने मामले को गंभीरता से संज्ञान में लेते हुए जांच की बात कही है। साथ ही कहा कि अगर मामले में ज़िम्मेदार अधिकारी दोषी पाए जाते हैं, तो उन पर शासकीय प्रावधानों के अनुसार कड़ी कार्यवाही की जाएगी।  इस मामले में कृषि विभाग के अधिकारी सहायक संचालक पी.आर. बघेल का कहना है कि हम मामले की जांच कर ज़िम्मेदार अधिकारी को दोषी पाने पर नियमों के तहत रिकवरी की कार्यवाही करेंगे। साथ ही विभागीय कार्यवाही भी होगी।

 विभाग की कार्यशैली  पर भी कई सवाल - 

भले ही विभाग मामले में जांच कर कार्यवाही की बात कह रहा हो लेकिन भ्रष्टाचार के इस मामले में अब प्रशासन और विभाग की कार्यशैली पर भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं। विभागीय अधिकारी द्वारा ही योजना में निर्माण कार्य के नाम पर इतनी बड़ी अनियमितता की गयी, जिससे विभाग के आला अधिकारी जानकारी होने से इंकार कर रहे हैं, और जांच कराने का दंभ भर रहे हैं।

ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि  बिना  जांच और भौतिक सत्यापन के  इतनी बड़ी राशि का भुगतान आखिर किस आधार पर किया गया, विभाग के ज़िम्मेदार अधिकारियों की कार्यशैली भी संदेहास्पद है। भ्रष्टाचार के इस मामले में कई जिम्मेदार सरकारी मुलाजिमों की संलिप्तता की ओर भी इशारा करती है।

ऐसे में अब यह देखना है कि मामले में जांच की बात कह रहे अधिकारी भ्रष्टाचार के इतने बड़े मामले में ज़िम्मेदार अधिकारी पर प्रशासकीय स्वीकृति के कार्य संपादन की शर्तो के अनुसार क्रमांक 10 में  कार्य प्रांकलन/ तकनीकी स्वीकृति में दर्शाए मापदंड व ड्राइंग के अनुरूप कार्य में त्रुटि पाए जाने पर अधिकारी की ज़िम्मेदारी होना, जिससे प्रशासकीय स्वीकृति के कार्य संपादन की शर्तो के अनुसार क्रमांक 41 स्वीकृत कार्यों में क्रियान्वयन एजेंसी के विरुद्ध किसी भी प्रकार की अनियमितता प्रमाणित होने की स्थिति में स्वीकृत सम्पूर्ण राशि भू - राजस्व की भांति निर्माण एजेंसी से वसूली की कार्यवाही की जाएगी ? या सिर्फ कार्यवाही के नाम पर कार्यवाही खानापूर्ति की औपचारिकता पूरी कर प्रशासन सरकार की इस तरह की जन कल्याणकारी योजना का दुबारा  बंटाधार करने के लिए प्रोत्साहित करेगा ?

बस्तर बन्धु का स्पष्ट मत है कि सूक्ष्म जांच होनी चाहिए और सत्य सामने आना चाहिए। कड़ाई से रिकवरी कर प्रदेश के अन्य भ्रष्ट अधिकारियों /आम लोगों के समक्ष एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। कवासी लखमा इसी जिले से कैबिनेट मंत्री हैं । यूं कहा जा सकता है कि वे इस एरिया के मुख्यमंत्री ही हैं! देखना होगा कि वे अपनी छवि के अनुरूप इस गंभीर मामले में क्या और कैसा संज्ञान लेते हैं ?

हम यह विशेष रूप से रेखांकित करना चाहेंगे कि नक्सलवाद का दंश झेल रहे संपूर्ण बस्तर संभाग का यह सुकमा जिला वह अतिसंवेदनशील जिला है जहां के तत्कालीन कलेक्टर अलेक्स पाल मेमन जी का सन् ,,,,,,, में नक्सलवादीयों ने अपहरण कर सरकार के छक्के छुड़ा दिए थे और पूर्व कलेक्टर व भारत जन आंदोलन के नेता स्व. बी. डी. शर्मा व दक्षिण बस्तर के पत्रकार साथियों की मध्यस्थता से कलेक्टर साहबान की नक्सली कब्जे से मुक्ति हो पायी थी।

ऐसे संवेदनशील बस्तर के सुदूर जनजातीय बहुल जिले में  मुख्य मंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट "नरवा, गरूवा, घुरवा, बारी"  के क्रियान्वयन में जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा किये जा रहे दुसाहसिक भ्रष्टाचार से जहां योजना को पलिता लगने, सरकार की बदनामी का खतरा दिख रहा है वहीं विपक्षियों के साथ - साथ रात वाले भाई कहलाने वाले नक्सलियों को भी गैर जिम्मेदार अधिकारी उनकी जमीन मजबूत करने का सामान प्लेट में सजा कर दिये जा रहे हैं, सरकार राज्य के सभी नक्सल प्रभावित जिलों व क्षेत्रों में संवेदनशील व ईमानदार अधिकारियों को ही पदस्थ करे, तो ही नक्सल मोर्चे पर वह अच्छे परिणाम की आशा कर सकती है, वर्ना हकीकत तो सब देख ही रहे हैं।