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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - ऑक्सीजन और टीकों के लिए कोर्ट कचहरी

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - ऑक्सीजन और टीकों के लिए कोर्ट कचहरी

-सुभाष मिश्र
अब हमारे देश के हर बड़े मसले को सरकार नहीं कोर्ट को ही तय करना होगा। कोरोना महामारी के बीच आक्सीजन की आपूर्ति और कोरोना वैक्सीन को लेकर जिस तरह की राजनीति, बयानबाजी और अराजकता की स्थिति निर्मित हुई है, उसका खामियाजा नागरिकों को अपनी जान देकर चुकाना पड़ रहा है। अब आक्सीजन और टीका न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद ही मिलेगा।
हमारे देश मे कोरोना टीकाकरण की शुरुआत 16 जनवरी 2021 से हुई। 19 अप्रैल 2021 को 18 से 45 वर्ष के आयु वर्ग के लोगों के लिए देशव्यापी टीकाकरण अभियान प्रारंभ हुआ। केंद्र सराकर द्वारा प्रारंभ में मुफ्त टीकाकरण के संकेत दिये गये थे, किन्तु बाद में यह कहा गया की यह वैक्सीन राज्यों को खरीदना होगा। सबसे पहले वैक्सीन की अलग-अलग कीमतों के निर्धारण को लेकर राजनीति शुरू हुई। उसके बाद वैक्सीन की उपलब्धता को लेकर।

बिना कोर्ट कचहरी के ना ईश्वर स्थापित हो सकते हैं, ना अस्पतालों की व्यवस्था दुरुस्त हो सकती है। लोगों की जान बचाने की बजाए केंद्र और राज्य सरकार कोर्ट में एक-दूसरे के खिलाफ हलफनामा देने में लगे है। छत्तीसगढ़ में टीको का आरक्षण अब कोर्ट तय करेगा। काश कोरोना की अमीरी-गरीबी, जाति और वर्ग देखकर लोगों को संक्रमित करता।
टीकारण के वर्तमान हालात को लेकर ना नौ मन तेल होगा, ना राधा नाचेगी कहावत चरितार्थ होती दिख रही है। जहां एक ओर कोरोना वैक्सीन की कमी है, तो दूसरी ओर इसे लेकर राजनीति। छत्तीसगढ़ में 18 साल से उपर आयु वर्ग का टीकाकरण अब न्यायालय के आदेश के बाद प्रांरभ होगा। तब तक घर में रहिए, सुरक्षित रहिए।

बहुत सारे राज्यों में एक मई से होने वाले 18 साल के ऊपर के लोगों के वैक्सीनेशन से टीको की कमी के कारण हाथ खींच लिए। कोरोना वैक्सीन की कमी के चलते भाजपा शासित बहुत से राज्यों में भी टीकाकरण का कार्यक्रम उस रफ्तार से शुरू नहीं हो पाया जिसकी योजना थी। छत्तीसगढ़ सरकार के 18 से 44 वर्ष आयु वर्ग में सबसे पहले अंत्योदय, बीपीएल और एपीएल की शर्ते रखकर टीकाकरण प्रारंभ किया। जिसे जागरूकता की कमी और टीके को लेकर व्याप्त डर के कारण उस तरह का रिस्पांस नहीं मिला।
देशव्यापी टीकाकरण अभियान जिसमें पहले आओ-पहले पाओ के अंतर्गत पंजीयन कराने वालों को टीके लग रहे हैं, वैसे टीके यहां सभी वर्ग को नहीं लगे। छत्तीसगढ़ में इसके लिए अंत्योदय कार्डधारियों को प्राथमिकता देकर उनसे टीकाकरण की शुरूआत की गई। इसके कारण शेष वर्ग के लोगो में सरकार को लेकर काफी नाराजगी देखी गई। टीकाकरण निर्धारण की सरकार की इस नीति/ आदेश पर कई हस्तक्षेप याचिका दायर हुई, जिसकी सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप याचिकाओं से सहमति जताई और सरकार के तर्क को अमान्य कर दिया। राज्य सरकार द्वारा अनुपात के निर्धारण में समय लगने की संभावना को देखते हुए टीकाकरण को 6 मई से स्थगित कर दिया है।

छत्तीसगढ़ सरकार ने वैक्सीन की माँग के एवज़ में कम आपूर्ति को कारण बताते हुए यह व्यवस्था दी थी कि पर्याप्त वैक्सीन आने तक उन्हें पहले वैक्सीन दी जाए जो गऱीब में भी सबसे गरीब है। यह वह वर्ग है जिसे मोबाईल तक नहीं है, और ना ही वह यह जानता है कि एप में एंट्री कैसे करना है। याचिकाकर्ता अमित जोगी का कहना है की टीकाकरण को बंद करने का फ़ैसला हाई कोर्ट की अवमानना और प्रदेश के युवाओं के साथ धोखा है। हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद छत्तीसगढ़ सरकार ने मुख्य सचिव की अध्यक्षता में सचिवों की एक कमेटी बनाई है जो कोर्ट के निर्देश पर टीकाकरण में भेदभाव, संक्रमण फैलने की संभावना और सभी पात्र व्यक्तियों की संख्या पर विचार करेगी। सरकार की इस नीति और विवाद की स्थिति के कारण टीकारण से वंचित लोगों का कहना है कि कोरोना वायरस अमीरी, गरीबी, उच्च, नीच, जाति, आरक्षण देखकर लोगों को संक्रमण नहीं करता। सरकार बेमतलब इस मामले में राजनीति कर रही है। समाज का एक बड़ा तबका टीकाकरण में इस तरह के आरक्षण व्यवस्था किए जाने की आलोचना कर रहा है। टीकाकरण के राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत जो नियम निर्देश जारी हुए हैं, उसे मानने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार बाध्य है, किन्तु छत्तीसगढ़ सरकार ने जो अपनी ओर से 18 साल से उपर के लोगों के लिए टीकाकरण की व्यवस्था कर रही है, उसने अपने तर्कों के साथ गरीबों के हक में नई व्यवस्था लागू की है।

टीकाकरण में अत्योदय जैसी आरक्षण व्यवस्था का जमीनी धरातल पर यह परिणाम देखने को मिला की बहुत सारे वैक्सीनेशन सेंटर जो गरीब तबके की बसाहट के आसपास के अस्पताल थे, वहां भी लोग टीकाकरण के लिए नहीं आये। इसके उल्ट बहुत सारे ऐसे लोग टीकाकरण के लिए आए जिनका पास अंत्योदय कार्य नहीं था, उन्हें बिना टीका लगवाए वापस लौटना पड़ा।
अभी पूरे देश में आक्सीजन आपूर्ति और टीकाकरण को लेकर सरकारों की न्यायालयों में काफी फजीहत हो रही है। न्यायालयों के आदेश पर सरकार बार-बार आक्सीजन आपूर्ति, टीको के प्रबंधन की जानकारी दे रही है। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्रीय मंत्रियों द्वारा लगाए गये आरोपो का जवाब देते हुए कहा कि कोरोना वायरस प्रतिरक्षण टीकाकरण में कोई राजनीति नहीं है, उनके राज्यों में टीको की कमी है। केंन्द्र सरकार को सावर्जनिक तौर पर टीके की खुराक संबंधी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

चाहे मामले आक्सीजन वितरण का हो या टीकाकरण का केंद्र के पास आपदा प्रबंधन की कोई स्पष्ट नीति नहीं है। वर्तमान में यह स्पष्ट ही नहीं है कि किस राज्य की जरूरत कितनी है, वहां संक्रमण का स्तर कितना है और उसे कितनी आक्सीजन चाहिए। जो लोग टीकाकरण के लिए पात्र हैं, उन्हें कब और कैसे वैक्सीन मिलेगा। कोर्ट में खड़े होकर सरकारे रोज नये-नये आंकड़े व्यवस्था  के बता रही है। इस कुप्रबंधन के कारण राज्यों के बीच भी आपसी टकराहट बढ़ रही है। एक राज्य दूसरे राज्य के लिए आबंटित आक्सीजन के सिलेंडर, टेंकर रोक रहा है। जिस राज्य ने टीको के लिए पहले से आर्डर दे दिया है वह भी अपने नागरिकों को यह बताने की स्थिति में नहीं है कि उसे कब-कब कितने टीके मिलेगे। इस बीच देश में कोरोना वैक्सीन बनाने वाली कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट के आदार पूनावाला ने ब्रिटेन में बैठकर यह आरोप लगाया है कि उन्हें भारत में धमकियां मिल रही है। वे कोविड-19 टीके की मांग को लेकर अप्रत्याशित दबाव और आक्रमक स्थिति उत्पन्न होने के बाद ब्रिटेन चले गये हैं। महाराष्ट्र के राज्य गृहमंत्री शंभुदास देसाई उनसे रिपोर्ट लिखाने कह रहे हैं, तो वहीं अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री नवाब मलिक का दावा है कि पूनावाला आज जिस स्थिति में है उसके लिए वह स्वयं जिम्मेदार है। पूनावाला ने पहले केंद्र के लिए कोविशील्ड की एक खुराक की कीमत 150, राज्यों के लिए 400 रुपए और निजी अस्पतालों के लिए 700 रुपये दर तय की थी। एक ही टीके के लिए अलग-अलग दरों को लेकर उन पर और केंद्र सरकार पर बहुत से लोगों ने निशाना साधा।
देश में जब सरकार के स्वास्थ्य सलाहकार कोरोना की तीसरी लहर की चेतावनी दे रहे हैं और हम मौजूदा पंजीकृत लोगों को भी टीके उपलब्ध नहीं करा पा रहे हैं, ऐसे समय में कनाडा की सरकार 12 से 15 साल के बच्चों को कोरोना वायरस से सुरक्षा प्रदान करने के लिए फाइजर बायोएनटेक की वैक्सीन लगाने जा रही है।

हमारे देश में अबतक 16 करोड़ 26 लाख लोगों को जिन्हें टीके लगा चुके हैं। उनमें से 14 करोड़ 84 लाख लोगों को वैक्सीन का पहला और एक करोड़ 23 लाख लोगों को दूसरा डोज लगा है। 18 से 44 वर्ष आयु समूह के 6 करोड़ 71 लाख लोगों को अब तक वैक्सीन का पहला डोज लगा है। इस समय देश में वैक्सीन के 1 करोड़ 18 लाख डोज उपलब्ध है। हमारे देश की बहुत बड़ी आबादी अभी भी टीकाकरण से वंचित है। विशेषज्ञों का मानना है कि कोविड 19 के दोनों डोज लगने सेकोरोना संक्रमण का खतरा कम हो जाता है।
यदि हमने समय रहते टीकाकरण कार्यक्रम, टीको के उत्पादन और आक्सीजन की आपूर्ति पर ध्यान दिया होता तो हमारी सरकारों को रोज-रोज न्यायालयों की चौखट पर खड़े होकर सफाई नहीं देनी पड़़ती। देश का शीर्ष नेतृत्व जब अति आत्म विश्वास और आत्म निर्भरता के मंत्र से लबरेज होकर आत्ममुग्ध हो तो फिर ऐसे ही अच्छे दिन देखने ही पड़ते हैं।
प्रसंगवश मिर्जा गालिब का ये शेर
इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फऩा हो जाना
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