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असम राइफल्स को लेकर सेना और केंद्र सरकार में खींचतान

असम राइफल्स को लेकर सेना और केंद्र सरकार में खींचतान

प्रभाकर मणि तिवारी

म्यांमार से लगी सीमा की वजह से उग्रवादियों को यह जगह काफी मुफीद है. पहले कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों की सरकारों के सत्ता में रहने की वजह से उग्रवाद पर अंकुश नहीं लगा पाने के आरोप लगते रहते थे. लेकिन अब बीजेपी सरकार सत्ता में है. बावजूद उसके उग्रवाद पर अंकुश नहीं लग सका है. नतीजतन मणिपुर को सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम के तहत और एक साल के लिए अशांत क्षेत्र घोषित कर दिया गया है.

इस अधिनियम पर शुरू से ही विवाद रहा है. इसके तहत सुरक्षा बलों को असीमित अधिकार मिले हैं. वर्ष 2004 में सात विधानसभा क्षेत्रों से इसे वापस लिया गया था. लेकिन बाकी जगह यह लागू है. राज्य में उग्रवाद विरोधी अभियानों की जिम्मेदारी अएसम राइफल्स के पास है. लेकिन अब इसके दोहरे नियंत्रण से होने वाली कथित दिक्कतों के लिए इसे केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत लाने की कवायद फिर जोर पकड़ रही है. इंडो-तिब्बत बार्डर पुलिस (आईटीबीपी) के साथ इसका विलय करने पर विचार चल रहा है. यह अकेला ऐसा अर्धसैनिक बल है जिस पर सेना और गृह मंत्रालय का दोहरा नियंत्रण है.

पुराना है उग्रवाद का इतिहास

पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर अपने गठन के समय से ही उग्रवादी गतिविधियों के लिए सुर्खियों में रहा है. इस उग्रवाद से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने राज्य में सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (अफस्पा) लागू कर दिया था. यह कानून पूर्वोत्तर इलाके में तेजी से पांव पसारते उग्रवाद पर काबू पाने के लिए सुरक्षा बलों को असीमित अधिकार देने के मकसद से अस्सी के दशक में बनाया गया था. इसके तहत सुरक्षा बल के जवानों को किसी को गोली मार देने का अधिकार है और इसके लिए उन पर कोई मुकदमा भी नहीं चलाया जा सकता. इस कानून के तहत सेना किसी भी व्यक्ति को बिना वारंट के हिरासत में लेकर उसे अनिश्चित काल तक कैद में रख सकती है.

11 सितंबर, 1958 को बने इस कानून को पहली बार नागा पहाड़ियों में लागू किया गया था जो तब असम का ही हिस्सा थीं. उग्रवाद पनपने के साथ इसे धीरे-धीरे पूर्वोत्तर के तमाम राज्यों में लागू कर दिया गया. मणिपुर में इस कानून के दुरुपयोग के दर्जनों मामले सामने आते रहे हैं. इस कानून की आड़ में हुई फर्जी मुठभेड़ के मामलों की जांच फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में चल रही है. इस विवादास्पाद कानून के दुरुपयोग के खिलाफ बीते खासकर दो दशकों के दौरान तमाम राज्यों में विरोध की आवाजें उठती रहीं हैं. लेकिन केंद्र व राज्य की सत्ता में आने वाले सरकारें इसे खत्म करने के वादे के बावजूद इसकी मियाद बढ़ाती रही.

मणिपुर की महिलाओं ने इसी कानून के आड़ में मनोरमा नामक एक युवती की सामूहिक बलात्कार व हत्या के विरोध में बिना कपड़ों के सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन किया था और उस तस्वीर ने तब पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोरी थीं. लौह महिला के नाम से मशहूर इरोम शर्मिला इसी कानून के खिलाफ लंबे अरसे तक भूख हड़ताल कर चुकी हैं. लेकिन मणिपुर में इसकी मियाद लगातार बढ़ती रही है. आखिर हार कर शर्मिला ने भी अपनी भूख हड़ताल खत्म कर दी थी. उक्त कानून के तहत अब राज्य को अशांत क्षेत्र घोषित किया जाता रहा है.

असम राइफल्स का इतिहास लगभग 185 वर्ष पुराना है. वर्ष 1835 में कछार लेवी के नाम से इसका गठन किया गया था. तब इसमें महज 750 जवान थे. वर्ष 1870 में इसमें बटालियनों की तादाद बढ़ा कर इसे असम मिलीट्री पुलिस बटालियन नाम दिया गया. इस बल के जवानों ने पूर्वोत्तर में कानून व व्यवस्था की स्थिति बनाए रखने में तो अहम भूमिका निभाई ही, प्रथम विश्वयुद्ध में भी ब्रिटिश सेना की ओर से हिस्सा लिया था.

बाद में इसका नाम असम राइफल्स कर दिया गया. असम राइफल्स में 46 बटालियन और 65,000 जवान और अधिकारी हैं. इस बल के जवानों के वेतन-भत्ते सेना के समान नहीं हैं. वर्ष 1962 में चीन के साथ लड़ाई के बाद इस पर सेना का नियंत्रण कायम हुआ.

दरअसल लंबे समय से असम राइफल्स के विलय की कवायद चल रही है. हालांकि सेना के कड़े विरोध के बाद केंद्र सरकार ने बीते साल लोकसभा में कहा था कि ऐसा कोई प्रस्ताव फिलहाल विचाराधीन नहीं है. बावजूद इसके इस पर कब्जे को लेकर तनातनी लगातार बढ़ रही है. सेना चाहती है कि असम राइफल्स का विलय उसके साथ कर दिया जाएगा. दूसरी ओर, गृह मंत्रालय की दलील है कि चूंकि तमाम अर्धसैनिक बल उसके अधीन हैं. इसलिए असम राइफल्स पर भी सिर्फ उसी का नियंत्रण होना चाहिए.

असम राइफल्स के लगभग 80 फीसदी अधिकारी सेना से आते हैं. पूर्वोत्तर में कानून व व्यवस्था की स्थिति की निगरानी और उग्रवाद-विरोधी अभियानों में यह सेना के साथ मिल कर काम करता है. यह कुछ वैसा ही है जैसे कश्मीर घाटी में राष्ट्रीय राइफल्स के जवान सेना के साथ मिल कर काम करते हैं.

कोलकाता स्थित सेना के पूर्वी कमान मुख्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं, "अगर असम राइफल्स गृह मंत्रालय के अधीन चला जाएगा तो इसमें सैन्य अधिकारियों को नियुक्त नहीं किया जा सकेगा. इससे इस बल की मारक क्षमता में कमी आएगी. इसके अलावा पूर्वोत्तर में उग्रवाद-विरोधी अभियानों को भी झटका लगेगा.” वह बताते हैं कि असम राइफल्स और भारतीय सेना के बीच बेहतर तालमेल ही पूर्वोत्तर में तमाम उग्रवाद-विरोधी अभियानों की कामयाबी की प्रमुख वजह रही है.

जानकारों का कहना है कि गृह मंत्रालय की ताकतवर आईपीएस लॉबी विलय की भरसक कोशिशें कर रही हैं. इससे दूसरे अर्धसैनिक बलों की तरह असम राइफल्स में आईपीएस अधिकारियो की तैनाती की राह खुल जाएगी.

सेना के एक रिटायर्ड मेजर नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, "आईपीएस अधिकारी लड़ाई या उग्रवाद-विरोधी अभियानों के लिए प्रशिक्षित नहीं होते हैं. ऐसे में आईपीएस अधिकारियों के अधीन असम राइफल्स को रखना और आईटीबीपी के साथ बल का विलय करना निश्चित ही खतरनाक है. ऐसी स्थिति में पूर्वोत्तर में एक बार फिर उग्रवाद तेजी से सिर उभार सकता है.” असम राइफल्स के महानिदेशक पद पर भी सेना के अधिकारी की नियुक्ति होती रही है.

सेना का मानना है कि इस विलय से भारत के सीमा प्रबंधन, पूर्वोत्तर भारत के सुरक्षा परिदृश्य और भारत-चीन सीमा की निगरानी पर नकारात्मक असर पड़ेगा. साथ ही भारत-म्यांमार सीमा की सुरक्षा भी प्रभावित होगी.विलय के बाद चीन से लगी पूर्वी सीमा अपने पारंपरिक अभियानों में सेना को असम राइफल्स का साथ नहीं मिल पाएगा.

अदालत पहुंचा मामला

असम राइफल्स पर पूर्ण नियंत्रण के लिए सेना और केंद्रीय गृह मंत्रालय की खींचतान पुरानी है. वर्ष 2009 में इसके आईटीबीपी में विलय का प्रस्ताव केबिनेट की सुरक्षा समिति के समक्ष रखा गया था. लेकिन समिति ने इसे खारिज कर दिया था. उसके बाद वर्ष 2013 में भी गृह मंत्रालय ने असम राइफल्स का पूरा नियंत्रण अपने हाथों में लेकर सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के साथ इसके विलय का प्रस्ताव रखा था. लेकिन रक्षा और गृह मंत्रालय के अधिकारियों के बीच कई दौर की बैठकों के बावजूद इस मुद्दे पर गतिरोध कायम रहा.

वर्ष 2019 में अमित शाह के गृह मंत्री बनने के बाद असम राइफल्स के आईटीबीपी में विलय की योजना बनाई गई. लेकिन यह मामला फिलहाल सुरक्षा मामलों की केबिनट कमिटी के पास है. उसके बाद से ही सेना असम राइफल्स के साथ ही आईटीबीपी पर नियंत्रण के लिए जोर दे रही है.

इस बीच, पूर्व जवानों के संगठन असम राइफल्स एक्स-सर्विसमेन वेलफेयर एसोसिएशन ने इस मुद्दे पर हस्तक्षेप की मांग करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका भी दायर की है. इसमें दोहरे नियंत्रण की समस्या के अलावा जवानों के वेतन-भत्ते सेना के समान करने की भी मांग उठाई गई है.

असम राइफल्स के महानिदेशक रहे रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल जीके दुग्गल का कहना है कि असम राइफल्स की भूमिका और उपलब्धियों को ध्यान में रखते हुए आईटीबीपी या दूसरे किसी अर्धसैनिक बल के साथ इसके विलय का मतलब राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता करना होगा. पूर्वोत्तर में उग्रवाद से निपटने में इस बल की भूमिका बेहद अहम रही है. ऐसे में इस दिशा में कोई भी कदम तमाम पहलुओं पर गंभीरता से विचार के बाद ही उठाना चाहिए.