breaking news New

उत्पादन में गिरावट, संकट में तरबूज का अस्तित्व

उत्पादन में गिरावट, संकट में तरबूज का अस्तित्व

उपेक्षा से किसान निराश, सीमाकंन पर आए-दिन विवाद

बलौदा बाजार, 6 मार्च। बीते साल सीजन के समय कोरोना की दहशत के बीच बाजार का संकट था। इस बरस बाजार के साथ प्रशासनिक असहयोग के संकट से दो-चार हो रहे हैं जिले के तरबूज उत्पादक किसान। रही-सही कसर कीमतों में आ रही गिरावट पूरा कर रही है। स्थिति का आकलन, शायद पहले ही किया जा चुका था, इसलिए इस बार तरबूज की खेती में हैरत में डालने वाली गिरावट आ चुकी है।

कसडोल, लवन और पलारी, ये तीन ऐसी जगह है जहां के ग्रामीण, ग्रीष्मकालीन फसल में तरबूज, खरबूज, ककड़ी और खीरा की खेती करते हैं। महानदी के तटीय इलाके की यह फसल देश के अलावा विदेशों तक में अपनी पहचान बना चुकी है। यही महीना था, जब बीते साल कोरोना ने तेजी से इस क्षेत्र को भी अपनी चपेट में लिया था, जिसके घेरे में आने के बाद, इसे तबाह होता हुआ, पूरे देश ने देखा था। अब दूसरी लहर का दौर चालू हो चुका है और चालू हो चुका है, ठीक साल भर पहले जैसा तबाही के दृश्यों के आने का सिलसिला। जिसके बाद, अब इसकी खेती से तेजी से किनारा करने के प्रयास में है जिले का तरबूज उत्पादक किसान।


असामान्य होते दिन

जिले की जिले की जीवन रेखा महानदी में पानी अब भी बह रहा है लेकिन खामोशी इतनी ज्यादा है कि यह भय ही पैदा कर रही है। बीते बरस लगभग 70 हेक्टेयर में ले गई तरबूज की फसल इस बार 50 से 60 हेक्टेयर पर सिमट चुकी है। वजह सिर्फ दो है। पहला, बाजार का नहीं मिलना और दूसरा प्रशासन का असहयोगात्मक रवैया। पहली समस्या से जैसे-तैसे करके छुटकारा के प्रयास तो जारी हैं लेकिन प्रशासनिक असहयोग जैसी स्थितियों का हल सूझ नहीं रहा है। फसल तैयार है। पूछ-परख के साथ खरीदी भी गति पकड़ने लगी है।

साथ नहीं प्रशासन का

तरबूज उत्पादक किसानों का दर्द यह है कि लीज पर महानदी के तटीय क्षेत्र तो दे दिए गए। आज नहीं तो सीमांकन के लिए कल आएंगे अधिकारी, इस सोच ने फसल की तैयारी भी करवा दी। अब अधिकारी ना तो सीमांकन के लिए आ रहे हैं, ना ही संतोषजनक जवाब दे रहे हैं। तहसील स्तर पर निपटने वाले इस काम के लिए अब किसान जिले के संवेदनशील कलेक्टर से गुहार लगाने की तैयारी कर रहे हैं कि इस काम को करवाएं ताकि तैयार फसल बेची जा सके।


गांव में चाहिए मंडी

जिले के तरबूज उत्पादक किसानों में अब लोकल मंडी की मांग जोर पकड़ने लगी है। यह इसलिए क्योंकि जिले की इस फसल की कीमत, महाराष्ट्र के कमीशन एजेंट तय करते हैं। अपनी सुविधा के अनुसार कीमत तय करने के साथ कमीशन की राशि भी तय हो जाती है। इसके अलावा भुगतान में भी इन्हीं व्यापारियों की ही चल रही है। इसलिए भुगतान का कभी भी समय पर नहीं होना, स्थानीय स्तर पर तरबूज मंडी की मांग का मजबूत आधार बन चुकी है।

बढ़ती लागत घटती आय

तरबूज उत्पादक किसानों का एक और दर्द है। वह यह कि बाजार से खरीदी जाने वाली बीज, उर्वरक, कीटनाशक दवाओं के सही होने की कोई गारंटी नहीं दी जाती जबकि उद्यानिकी विभाग की दर्जनों योजनाओं के तहत यह सुविधा दी जाती है लेकिन जिले का उद्यानिकी महकमा जिस तरह अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट चुका है उसके बाद हताश किसान अपने दम पर फसल ले रहा है। ऐसे में लागत प्रति हेक्टेयर असमान्य रूप से बढ़ चुकी है और इसी के अनुपात में आय का दायरा सिमटता जा रहा है।

बलौदाबाजार कलेक्टर सुनील कुमार जैन ने कहा कि महानदी में किसानों को Cआबंटित पट्टे के अनुसार सीमाकंन करने के निर्देश दिए जा रहे हैं ताकि किसान पट्टे के अनुसार खेती कर सकें।