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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-एक गाय की मौत

 प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-एक गाय की मौत

आज हमारे अखबार के ऑफिस के सामने एक कम उम्र की गाय की मौत हो गई। गाय का कोई मालिक सामने नहीं आया। रोका-छेका योजना के तमाम निर्देशों के बावजूद व्यस्तम सड़कों, कॉलोनियों, मोहल्लों की सकरी सड़कों में गायों का आवारगी से घूमना आम बात है। छत्तीसगढ़ सरकार ने गोधन न्याय योजना के जरिए दो रुपये किलो गोबर भी खरीदना प्रारंभ कर दिया है। सरकार की दोनों ही योजनाओं को लाने के समय यही मंशा रही होगी कि हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धुरी हमारे पशुधन की लोग देखभाल करेंगे, उन्हें पूजने की बजाय पालेंगे। बदलते सामाजिक परिदृश्य में जो भी किसी तरह से अनुपयोगी है या बहुत कम उपयोगी है, वह हाशिये पर है। चाहे वह गाय हो या घर के बुजुर्ग। जो लोग संस्कृति की दुहाई देते हैं, जिन्होंने गोहत्या को रोकने, गौमास खाने वालों की मॉब लिचिंग के जरिये हत्या करने से परहेज नहीं किया, वे लोग गायों की देखभाल के लिए आगे नहीं आते। हमारे बहुत से साथियों ने नगर निगम सहित बहुत से एनजीओ, स्वयंसेवकों और यहां तक की परंपरागत रूप से मरी हुई गायों को ले जाने वालों को फोन किया, उनसे संपर्क किया। अधिकांश जगहों से टाल मटोल जैसा जवाब मिला। अंतत, पुलिस हस्तक्षेप और नगर निगम की पहल से गौमाता हटी।

 महात्मा गांधी ने जिस ग्राम स्वराज की कल्पना की थी, उसमें ग्राम इकाई में सबके काम आपस में बटे हुए थे। धीरे-धीरे ग्राम इकाइयां, जातिगत कार्यों को कमतर मानकर ऐसी नई व्यवस्था की तरह हम अग्रसर हो रहे हैं, जिनमें मुनाफे पर ज्यादा जोर है। महंगे-महंगे जूते, चप्पल, चमड़े के बैग सामान की दुकान तो हर कोई खोलना चाहता है, किन्तु मरे हुए जानवरों के चमड़े से लोगों को परहेज है। जो भी मेहनत, मजदूरी और अस्पृशयता से जुड़ा पाप हैं, उसे लोग परपंरागत मानकर उन्हीं लोगो से कराते है जो सदियों से ये कर रहे है। मीठा-मीठा गप, कड़वा-कड़वा थू।

हम रेडीमेड युग में जी रहे है, जहां हर चीज ऑनलाईन चाहिए। चप्पल बेचेंगे पर उसकी बद्दी नहीं बदलेंगे, मरम्मत नहीं करेंगे ये काम दूसरो का है।

हमारे देश में अधिकांश लोग भैंस का दूध पीते हैं, पर आदर भाव हमारा गौमाता के प्रति है। पूरी दुनिया में जो गाय दूध देने के काम आती है, वही गाय हमारे देश में दंगा कराने के काम आती है। गाय की दुहाई देने वाले गाय को पूजने की बात करने वालों को गाय की दुर्दशा से कोई खास लेना देना नहीं है। यहीं वजह है कि पालतू गायें भी घर और गोठान से ज्यादा सड़कों-चौराहों पर नजर आती है।

दरवाजे पर आई गायों को प्रेम से गुड़-रोटी खिलाने वाले गायों के झुण्ड को देखकर उसी तरह घबराए हुए रहते है जैसे राजनीतिक पार्टियों से जुड़े को देखकर जो चंदा मांगने बार-बार आ जाते है, और प्रसाद जहां मिलता हैं लोग उसी के पास जाते हैं। चंदा और विज्ञापन देने वाले की महिमा और कीर्ति दिन प्रतिदिन बढ़ती जाती हैं। जिस तरह भगवान के नाम पर लिया जाने वाला चंदा भगवान तक नहीं पहुंचता, उसी तरह गौरक्षा, गौशाला के नाम पर लिया गया अनुदान भी गायों तक नहीं पहुंचता। गाये मजबूरी में पालीथिन, पेपर और कचरा खाती हैं। हम गाय हमारी माता का जयघोष करके खुश होते हैं। गौरक्षा के नाम पर दूसरों के चूल्हें-चौकों में फूंककर उनके मॉस खाने के नाम पर लोगों का कत्लेआम करने से बाज नहीं आते।

गायों की अस्वाभाविक मौतों के तमाम अध्ययन यही बताते हैं कि उनकी असामयिक मौत का अहम कारण उनके द्वारा प्लास्टिक कचरे का सेवन करना है। यू ट्यूब पर 'प्लास्टिक काउÓ नामक डाक्यूमेंट्री पर मरी हुई गाय के आपरेशन को दिखाया गया है, जिसमें एक गाय के पेट से लगभग 52 किलोग्राम प्लास्टिक के थैले निकालते दिखाए गए हैं। राजस्थान, उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में गौशाला में हुई गायों के मौत के बहुत से मामले हमें गायों के प्रति हमारा रवैया बताते हैं। हमारे देश की सरकार ने गाय के प्रति अपनी आस्था दिखाने के लिए राष्ट्रीय कामधेनु आयोग भी गठित किया है। आयोग द्वारा भारत में 25 फरवरी को गौ-विज्ञान पर राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा आयोजित की जा रही है। कामधेनु गौ विज्ञान प्रचार-प्रसार परीक्षा एक घंटे लंबी और निशुल्क होगी और इसमें बच्चे, वयस्क और विदेशी नागरिक भी हिस्सा ले पाएंगे। परीक्षा में 100 बहु-विकल्प वाले सवाल पूछे जाएंगे। सवाल हिंदी, अंग्रेजी और 12 प्रांतीय भाषाओं में पूछे जाएंगे। परीक्षा का उद्देश्य गाय के बारे में आम लोगों के ज्ञान के स्तर के बारे में पता लगाना और उन्हें सिखाना और संवेदनशील बनाना है। परीक्षा में गोपालको, किसानों और उन लोगों को भी इसमें शामिल किया जाता जो गाय को खुला छोड़ते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि गाय एकमात्र ऐसा प्राणी है, जो ऑक्सीजन लेता है और ऑक्सीजन ही छोड़ता है, जबकि इंसान के साथ अन्य प्राणी ऑक्सीजन लेती हैं और कार्बनडाई ऑक्साइड छोड़ते हैं। पेड़-पौधे कार्बनडाई ऑक्साइड लेते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं।


भारत के बहुसंख्यक हिन्दू समाज में कई लोग गाय को पूज्य मानते हैं। लोगों को इस आवश्यक लगाव के कारण गाय राजनीतिक और संप्रदायवादी झगड़ों का कारण बन गई। सांस्कृतिक विविधता और संवैधानिक तौर पर धर्म-निरपेक्षता की नीति में विश्वास करने वाले देश के कई हिस्सों में गाय को मारना और बीफ  खाना गैर-कानूनी बना दिया गया है। गाय का मांस खाने वाले लोगों पर हमले किए हैं। जबकि हकीकत है कि ये समूह या तो पारंपरिक रूप से बीफ  खाते रहे हैं या मरी हुई गायों के कंकालों को ठिकाने लगाते रहे हैं।

गाय के प्रति सम्मान दिखाने इस बार दीवाली में गाय के गोबर से बने दीये जलाए गए। इस दिए से जहां प्रदूषण कम हुआ साथ ही प्रकृति को शुद्धता भी मिली, जबकि दीये बना रहे लोगों को रोजगार भी हासिल हुआ। गोरक्षा आंदोलन और उससे उपजी स्थितियां विश्लेषण करने पर हम पाते हैं कि गोवंश का मुद्दा दशकों से सरकारी अदूरदर्शिता से ग्रसित रहा है। अधिक दूध उत्पादन के लालच में हमने जर्सी, होल्सटीन फ्रिजियन जैसी विदेशी नस्लों को बढ़ावा देने से पहले यह नहीं सोचा कि छह-सात ब्यांत के बाद जब ये गाय दूध देना कम कर देंगी तो उनका क्या होगा, उनके नर बछड़ों का क्या होगा। विदेशों की नकल करते समय, जहां पर उनको दूध कम होने के बाद और नर बछड़ों को कत्लखाने भेज दिया जाता है, हमें ध्यान रखना चाहिए था कि हमारे देश के अधिकांश राज्यों में पूर्ण अथवा आंशिक गोवध बंदी है। ऐसी स्थिति में अनुपयोगी गोवंश अवैध रूप से कत्लखाने जाएगा।

हमारे देश में कभी घी में गाय की चरबी मिलाने का मामला हो या कोरोना वैक्सीन बनाने में गाय का खून उपयोग में लाने का मामला, कट्टरपंथी ताकते सक्रिय हो जाती है। मुनाफाखोर व्यापारी, कंपनियों के लिए धंधे और मुनाफे की नैतिकता अलग होती है। यही वजह है कि बहुत सारे उत्पादों में उन चीजों की मिलावट होती है, जिनके बारे में लोग सार्वजनिक रूप से आलोचना करते हैं।

छत्तीसगढ़ में गोधन न्याय योजना के माध्यम से 20 जुलाई 2020 से किसानों, पशुपालकों को लाभ पहुंचाने गोबर खऱीदा जाता रहा है। इस योजना के तहत पशुपालक से खऱीदे गए गोबर का उपयोग सरकार वर्मी कंपोस्ट खाद बनाने के लिए किया जा रहा है। पालतू जानवरों के प्रति सरकार की संजीदगी के बावजूद समाज और सरकारी मोहकमें में जो जागरूकता, संवेदनशीलता दिखनी चाहिए वह नदारद है। केवल गौ माता की जय बोलने से काम नहीं चलेगा। गोधन को वाकई में न्याय चाहिए।