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डॉ एम डी सिंह की कविताः तेरी बातों में न आ जाऊं...

डॉ एम डी सिंह की कविताः तेरी बातों में न आ जाऊं...


तेरी बातों में न आ जाऊं इसलिए मुकर रहा हूं

कहीं तुझसे न उलझ जाऊं बच-बच के गुज़र रहा हूँ


तेरी बातों के सलवटों में करवटें गिनते-गिनते 

ख्वाबों की खाईयों में धीरे-धीरे उतर रहा हूं


उनसे मिल के मेरी आदत कहीं और न बिगड़ जाए

लो देख भी लो यारों मैं इसी डर से सुधर रहा हूं


किसी दामन पे लग न जाऊं कहीं दाग बनके मैं भी 

अपनी शरारती हरकतों के परों को कुतर रहा हूं


कहो जाके बिजलियों को और गिरने से बाज़ आएं

चोट खाने की आदतों से लम्हा-लम्हा उबर रहा हूं