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कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः अपना-अपना पहलू

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः अपना-अपना पहलू


एक नहीं दो पहलू 

पहलू में दिल बहलू 


इक आगे का पहलू 

पहलू है इक पीछे का

खुली आँख का पहलू 

पहलू आँखें मींचे का

ऊँचे का है इक पहलू 

पहलू है इक नीचे का


दाँय का इक पहलू 

पहलू है इक बाँय का

बात-बात में पहलू है

पहलू साँय-साँय का




पहलू के ही भीतर पहलू

सच में झूठ, झूठ में सच के

फँसने और बचने का पहलू

जो लगे अर्थ का पहलू

वो ही लगे व्यर्थ का पहलू

उगा हुआ-सा कोई पहलू

फिर डूबा-सा कोई पहलू


एक ओर है जहाँ

दूसरी ओर वहाँ

अपने-अपने पहलू में

चले जा रहे कहाँ

ओर-छोर ही नहीं जहाँ


कहीं नहीं है यहाँ-वहाँ

रहे जहाँ के तहाँ

कहाँ-कहाँ के टहलू

कोई नहले पर दहला

कोई दहले पर नहलू

जीने का इक पहलू

मरने का इक पहलू