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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- किसान आंदोलन और सरकार

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- किसान आंदोलन और सरकार


राजनीतिक दलों से ना उम्मीदी के बीच जब ज्यादातर पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के किसान बहरी और गूंगी हो चुकी दिल्ली में बैठी केन्द्र की सरकार सत्ता को सुनाने दिल्ली आने लगे तो उन्हें जगह-जगह सीमाओं पर रोका जाने लगा। पंजाब, हरियाणा राजस्थान की दिल्ली से लगी बॉडर पर चौकसी बढ़ गई। सभी सीमाओं पर गाड़ी रोक-रोक कर यह देखा जाने लगा कि आने वाले किसान तो नहीं और वो जा कहां रहे हैं। चड़ीगढ़ के पहले कल हमसे भी पूछा गया कहा जा रहे हैं। जो लोग इन दिनों पंजाब, हरियाणा की ओर यात्रा पर हैं उनसे पूछना आम है। सीमाएं सील है, केन्द्रीय कृषि मंत्री कहते है 3 दिसम्बर को आओ तब बात होगी।  जिस तीव्रता के साथ पंजाब के किसान इस आंदोलन में भाग ले रहे है उतनी तीव्रता बाकी राज्यों में दिखाई नहीं दी है। राष्ट्रीय राजधानी के अलग-अलग एंट्री पॉइंट्स पर जुटे हजारों प्रदर्शनकारियों को शुक्रवार को नॉर्थ दिल्ली ग्राउंड में शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन की इजाजत मिल गई। हरियाणा ने भी पंजाब से लगी अपनी सीमाओं को पूरी तरह खोल दिया है।  लेकिन किसानों ने दिल्ली में एंट्री से इनकार कर दिया है। किसानों का कहना है कि इतनी दूर से दिल्ली को घेरने आए हैं, न कि दिल्ली में घिर जाने के लिए आए हैं। हजारों किसान सिंघु बॉर्डर पर ही डेरा जमा लिया है। उनका कहना है कि हम हाईवे पर ही प्रदर्शन करेंगे।

किसान कहते रहे है कि हमें कभी अन्नदाता, कभी जयजवान, जयकिसान कभी धरती पुत्र और न जाने किस-किस नाम से पुकारा जाता है कि हमें अपनी बात कहने के लिए दिल्ली आने पर रोक जा रहा हैं। दरअसल, केन्द्र सरकार ने 5 जून को कृषि सुधार अधिनियम के रूप में तीन बिल लाये जिसे सरकार किसान हितैषी बता रही है, किन्तु देश के किसान और किसान संगठन से जुड़े लोग इसे सरकार और बाजार की सांठगांठ बताकर खुद को ठगा हुआ सा महसूस कर रहे हैं। तीनों बिलों के संबंध में कहा गया है कि राज्य कानून द्वारा स्थापित कृषि उपज विपणन समितियों (एजीएससीएस) द्वारा विनियमित बाजार यार्ड के बाहर के  स्थानों में किसानों को कृषि उत्पादों को बेचने में सक्षम बनाने का प्रयास करती हैं। दूसरा अधिनियम अनुबंध खेती के समझौतों के लिए एक कानूनी ढांचा प्रदान करना चाहता है। तीसरे अधिनियम में खाद्य स्टॉक बीमा और अनाज, दालें, आलू, प्याज, खाद्य, तिलहन और आवश्यक वस्तुओं अधिनियम के तहत तेल जैसे खाद्य पदार्थों पर मूल्य नियंत्रण की मांग की गई है।

केंद्र सरकार की लाख सफार्ई और समझाइश के बावजूद देश का किसान इन तीनों बिलों को किसान विरोधी बताते हुए कह रहा है कि जीवन, स्वतंत्रता और उनके परिवार की स्वतंत्रता के लिए यह गंभीर खतरा है। दरअसल जिस तरह इस समय पूरा देश कोरोना संक्रमण से जूझते हुए अस्पतालों में आक्सीजन सिलेंडर और उपचार ढूंढ रहा है, उसी तरह देश का किसान और उसकी खेती किसानी भी आईसीयू में है। 

दरअसल, देश का किसान आत्महत्या के लिए मजबूर है। सरकारों की ऋणमाफी योजना के बावजूद किसान कर्ज के बोझ से दबा हुआ है। खेती धीरे-धीरे घाटे का सौदा होती जा रही है। यही वजह है कि अब गांव का पढ़ा लिखा नवजवान खेती से पलायन कर रहा है। वो शहर में रहकर मजदूरी करना पसंद कर रहा है, किन्तु खेती नहीं करना चाहता।

सरकार से ना उम्मीद हो चुके किसान संगठनों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी लगाई गई है, जो विचार के लिए मंजूर हो गई है।

केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्रसिंह तोमर ने कहा कि किसानों को आंदोलन का रास्ता छोड़कर सरकार के साथ बातचीत करें। किसानों के मुद्दों को लेकर राजनीति नहीं की जानी चाहिए और उन्हें भड़काना नहीं चाहिए। उन्होंने कहा कि कृषि कानूनों में सुधार किसानों के हित में है और उन्हें अपनी फसल को कहीं भी बेचने की आज़ादी दी गई है। 

किसानों को सबसे बड़ा डर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP- Minimum Support Price) खत्म होने का है। इस बिल के जरिए सरकार ने कृषि उपज मंडी समिति (APMC-Agricultural produce market committee) यानी मंडी से बाहर भी कृषि कारोबार का रास्ता खोल दिया है।

सरकार ने बिल में मंडियों को खत्म करने की बात कहीं पर भी नहीं लिखी है, लेकिन उसका इंपैक्ट मंडियों को तबाह कर सकता है। इसका अंदाजा लगाकर किसान डरा हुआ है। इसीलिए आढ़तियों को भी डर सता रहा है। इस मसले पर ही किसान और आढ़ती एक साथ हैं। उनका मानना है कि मंडियां बचेंगी तभी तो किसान उसमें एमएसपी पर अपनी उपज बेच पाएगा।

इस बिल से 'वन कंट्री टू मार्केट वाली नौबत पैदा होती नजर रही है। क्योंकि मंडियों के अंदर टैक्स का भुगतान होगा और मंडियों के बाहर कोई टैक्स नहीं लगेगा। अभी मंडी से बाहर जिस एग्रीकल्चर ट्रेड की सरकार ने व्यवस्था की है उसमें कारोबारी को कोई टैक्स नहीं देना होगा। जबकि मंडी के अंदर औसतन 6-7 फीसदी तक का मंडी टैक्स (Mandi Ta&) लगता है।

किसानों की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि आढ़तिया या व्यापारी अपने 6-7 फीसदी टैक्स का नुकसान न करके मंडी से बाहर खरीद करेगा। जहां उसे कोई टैक्स नहीं देना है। इस फैसले से मंडी व्यवस्था हतोत्साहित होगी। मंडी समिति कमजोर होंगी तो किसान धीरे-धीर बिल्कुल बाजार के हवाले चला जाएगा। जहां उसकी उपज का सरकार द्वारा तय रेट से अधिक भी मिल सकता है और कम भी।

एक बिल कांट्रैक्ट फार्मिंग से संबंधित है। इसमें किसानों के अदालत जाने का हक छीन लिया गया है। कंपनियों और किसानों के बीच विवाद होने की सूरत में एसडीएम फैसला करेगा। उसकी अपील डीएम के यहां होगी, न कि कोर्ट में। किसानों को डीएम, एसडीएम पर विश्वास नहीं है क्योंकि उन्हें लगता है कि इन दोनों पदों पर बैठे लोग सरकार की कठपुतली की तरह होते हैं। वो कभी किसानों के हित की बात नहीं करते।

केंद्र सरकार जो बात एक्ट में नहीं लिख रही है उसका ही वादा बाहर कर रही है। इसलिए किसानों में भ्रम फैल रहा है। सरकार अपने ऑफिशियल बयान में एमएसपी जारी रखने और मंडियां बंद न होने का वादा कर रही है, पर इस आशय का कोई संशोधन बिल में नहीं कर रही है।

किसान बिल को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस शासित राज्यों की सरकार आमने- सामने है। छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली सरकार ने छत्तीसगढ़ विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर कृषि उपज मंडी (संशोधन) विधेयक 2020 को मंजूरी दी हैं। जिससे पूरे राज्य को कृषि उपज बेचने के लिए एक बाजार के रूप में घोषित किया, जो केन्द्र के कृषि कानूनों को नकारने के लिए कृषि उत्पाद बेचने के लिए प्रायवेट सेक्टर को सीधे किसानों से उपज खरीदने की अनुमति देता है। छत्तीसगढ़ में 80 प्रतिशत छोटे और सीमांत किसान हैं, जिनके पास खाद्यान्न भंडारण की क्षमता नहीं है, न ही बाजार से मोलभाव करने का साहस। आदिवासी बाहुल्य राज्य होने के कारण यहां का आदिवासी किसान भलीभांति जानता है कि सक्षम मंडी के अभाव में उसे व्यापारियों ने किस तरह लूटा है। नमक के बदले उसकी मंहगी लघु वनोपज हथियाने वाले बाजार के व्यापारियों पर वह क्यों भरोसा करेगा?

किसान मंडी संशोधन अधिनियम में न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करने का प्रावधान करने की मांग कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ में किसानों की धान समर्थन मूल्य से अधिक यानी 2500 रुपये क्विंटल खरीदने वाली छत्तीसगढ़ की सरकार ने राजीव गांधी न्याय योजना के जरिये किसानों को चार किश्तों में बकाया राशि का भुगतान किया। किसानों की कर्जमाफी, गोबर खरीदी जैसे निर्णय से सरकार ने अपनी किसान हितैशी नीति स्पष्ट की है। भूपेश सरकार ने मंडियों के जरिये से एक दिसम्बर से धान खरीदी के लिए किसानों को टोकने देना भी शुरू कर दिया है।

किसानों की समस्या को लेकर सरकार को तत्काल कदम उठाना चाहिए, दिल्ली और आसपास के राज्यों में अराजकता की स्थिति निर्मित हो सकती हैं।