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ध्रुव शुक्ल की कविताः आवाज़ उठाने की जगह

ध्रुव शुक्ल की कविताः आवाज़ उठाने की जगह


जीतने में लगा है जीतने वाला हारकर भी

हारता चला जाता है हारने वाला 

जीतकर भी

खेलता ही चला जाता है जुआ

खेलने वाला यह सोचे बिना

क्या-क्या दाँव लगाने का हक़ है उसे

अपने आपको छोड़कर


पड़ जाती है आदत

अन्याय करने वाले को

अन्याय करने की

सहने वाले को सहने की

कहने वाले को

अन्याय के बारे में कहने की

लिखने वाले को लिखने की


आदतें सुधारने वालों को

अपनी आदत छोड़कर

दूसरों की आदत सुधारने की

पड़ जाती है आदत

आवाज़ किसी की नहीं उठती

दब जाती है अपनी-अपनी आदतों में


जगह खोजता हूँ आवाज़ उठाने की

लिख आता हूँ दीवार पर

पोस्टर लगा आता हूँ चौराहों पर

पीछे से कोई आकर

चिपका देता है उसी पर एक और


अखबार के पन्नों पर नंगेपन का राज

जहाँ ढूँढे नहीं मिलती आवाज़

दूरदर्शन पर उठी आवाज़ को अचानक

दबा देता है किसी मंजन का विज्ञापन

चीखकर दबा देती है कर्कशा एंकर सुंदरी

दबा देता है दलाल पथ का शोर

जनपथ पर उठी आवाज़ को

गिर जाता है संसद में 

आवाज़ उठाने का प्रस्ताव


मनमानी की दूकानें चलाते

गै़रज़रूरी चीज़ों और विचारों से भरते जाते

सब एक-दूसरे की आवाज़ दबाते

अपनी-अपनी आवाज़ कहाँ उठा पाते