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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-आईएएस कैडर में बदलाव, आपदा में अवसर की तलाश

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-आईएएस कैडर में बदलाव, आपदा में अवसर की तलाश


केन्द्र सरकार भारतीय प्रशासनिक सेवा यानि आईएएस के मौजूदा कैडर में बदलाव के लिए नियमों में संशोधन करने जा रही है। कैडर की कमी के नाम पर दरअसल वह एक तरह से आपदा में अवसर की तलाश है।  केन्द्र सरकार सीडीआर कोटा यानि सेंट्रल डेपुटेशन रिजर्व की 40 प्रतिशत सीमा को ध्यान में रखकर राज्यों से पूछ रही है कि आपके पास सीडीआर में कितने अधिकारी हैं। वर्तमान में 6999 आईएएस अधिकारियों का अमला स्वीकृत है जिसमें से 5205 अधिकारी उपलब्ध हैं। 1494 पद रिक्त हैं। हर वर्ष लोक सेवा आयोग के माध्यम से मात्र 180 आईएएस अधिकारी चयनित होते हैं। केन्द्र में बढ़ती योजनाएं और नये विभागों की जरुरत को देखते हुए न केवल केन्द्र में बल्कि राज्यों में आईएएस अधिकारियों की कमी हो रही है जिसके भर्ती के कोटे को बढ़ाने के लिए बातचीत जरुर होती है किंतु यह संख्या नहीं बढऩे की वजह से आईएएस अधिकारियों की कमी है। आईएएस अधिकारियों की भर्ती प्रक्रिया के अनुसार 66.66 सीधी भर्ती से 30 प्रतिशत पदोन्नति से और 3.33 प्रतिशत अन्य सेवाओं में सिलेक्शन से भरने का प्रावधान है। आईएएस कैडर की नियुक्ति के संबंध में पहले 2011 में सेंट्रल डेपुटेशन रिजर्व 25 प्रतिशत था जो बाद में घटकर 18 प्रतिशत हो गया है। केन्द्र और राज्यों में लगातार अलग-अलग विभागों की संख्या और योजनाओं की संख्या बढ़ रही है और अधिकारियों की संख्या लगातार कम हो रही है। राज्य सरकारें अपने अधिकारियों का समय पर प्रमोशन नहीं करती। वहीं दूसरी सेवाओं से लेने वाले पदों को भी नहीं भरती हैं। इसकी वजह से लगातार आईएएस अधिकारियों की कमी बनी रहती है और एक-एक अधिकारियों के पास बहुत से विभागों की जबावदारी होती है। जिन पदों पर विशेषज्ञ सेवाओं के अधिकारी पदस्थ होने चाहिए उन विभागों में भी आईएएस अधिकारियों की पदस्थापना से यह संतुलन गड़बड़ाता है।
संविधान के भाग-14 के अनुच्छेद 309 में यह प्रावधान है कि संघ सेवा का गठन करेगा और सेवा की शर्त और इनकी भर्ती का अधिकार केन्द्र सरकार के पास होगा। वर्तमान में यूपीएससी के माध्यम से भारतीय सेवा के अधकारियों की परीक्षा और चयन होता है। उसके बाद उन्हें राज्य का कैडर आबंटित किया जाता है। राज्य कैडर आबंटित होने के बाद आईएएस अधिकारियों की पदस्थापना और पदोन्नति राज्य सरकार करती है। केन्द्र में प्रतिनियुक्ति यानि डेपुटेशन के लिए राज्य और संबंधित अधिकारी की सहमति आवश्यक है। अब केन्द्र सरकार सीधे डेपुटेशन की बात कर रही है। सभी राज्यों से इसके लिए 25 जनवरी तक जानकारी मांगी गई है। ताकि आगामी लोकसभा सत्र में इस पर चर्चा कराई जा सके।

केन्द्र सरकार के इस रवैये को लेकर राज्यों में बेहद नाराजगी है। राज्यों का मानना है कि आईएएस कैडर रुल 1984 में संशोधन कर केन्द्र सरकार आईएएस का तबादला करने की शक्ति अपने हाथ में रखना चाहती है। इसके पहले पश्चिम बंगाल के चुनाव के समय वहां के मुख्य सचिव का तबादला केन्द्र सरकार ने बिना राज्य सरकार और संबंधित अधिकारी की सहमति के किया था। जिसके लेकर काफी विवाद की स्थिति निर्मित हुई थी। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी, जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के साथ-साथ राजस्थान, झारखंड, केरल, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री यहां गैर भाजपाई सरकार है सबने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इस नियम में संशोधन करने की बात कही है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने कहा है कि मुझे लगता है कि संशोधित संशोधन प्रस्ताव पूर्व की तुलना में अधिक कठोर है और वास्तव में यह हमारी महान संघीय राजनीति की नींव और भारत की संवैधानिक योजना की बुनियादी संरचना के खिलाफ है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के एस्टालिन ने कहा है कि वर्तमान प्रतिनियुक्ति नियम स्वयं संघ के पक्ष में भारी है और सख्ती लाने से सहकारी संघवाद की जड़ कमजोर हो जाएगी। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा है कि इसका राजनीतिक दुरुपयोग हो सकता है। उन्होंने कहा कि अखिल भारतीय सेवा के कैडर से जुड़े नियमों में संशोधन का प्रस्ताव, अधिकारियों की पदस्थापना के अधिकार एकपक्षीय रूप से बिना राज्य सरकार और संबंधित अधिकारी की सहमति के प्रदान करते हैं। यह संविधान में रेखांकित संघीय भावना के खिलाफ है। उधर, राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत ने कहा कि इस संशोधन के बाद कोई भी अफसर निष्ठा से काम नहीं कर पाएगा। उस पर एक्शन की तलवार लटकी रहेगी। उन्होंन कहा कि इस संशोधन से केंद्र और राज्य सरकारों के लिए तय संवैधानिक क्षेत्राधिकार का उल्लंघन होगा।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से लगातार सेंट्रल एजेंसियों पर केन्द्र सरकार अपनी पकड़ मजबूत करते जा रही है। इसी क्रम में सरकार के आईएएस कैडर संशोधन को भी देखा जा रहा है। राज्यों को यह डर है कि केन्द्र भविष्य में अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर आईपीएस, आईएफएस की तबादले की ताकत अपने पास रखेगी और अपना सीधा नियंत्रण इन अधिकारियों पर रखकर अपने तरीके से संचालित करेगी। अधिकारी हमेशा इस सांसत में रहेंगे कि कब दिल्ली से आर्डर आ जाए और कब उन्हें केन्द्र में प्रतिनियुक्ति पर जाना पड़े। वर्तमान की व्यवस्था में राज्य सरकार अपने चहेते अधिकारियों को जहां चाहे वहां पदस्थ करती है यही वजह है कि आईएएस अधिकारी सत्ता के केन्द्र के इर्द-गिर्द अपनी वफादारी दिखाते हैं। ताकि उन्हें अच्छी पोस्टिंग मिलती रहे। इस संशोधन के बाद केन्द्र राज्य सरकारों से कहेगी कि आप अपने अधिकारियों की लिस्ट और नाम दे दो हम आदेश जारी करेंगे। यदि आप उन्हें रिलीव नहीं करेंगेे तो हम निश्चित तारीख के बाद उन्हें रिलीव मानकर उनकी पोस्टिंग कर देंगे।

एक समय था जब भारत की सर्वोच्च सेवा समझे जाने वाले आईएएल कैडर के लोग भारत सरकार में डेपुटेशन या प्रतिनियुक्ति में जाने, इमपैनलमेंट अपने आपको गौरवान्वित महसूस करते थे किंतु अब धीरे-धीरे यह क्रेज भी कम हो रहा है। अधिकारी अच्छी पोस्टिंग और सुख-सुविधाओं के चक्कर में अपने राज्य मेंं ही रहना ज्यादा पसंद करते हैं। अब बहुत सारे अधिकारी केन्द्र में जाकर प्रतिनियुक्ति में जाकर काम करना नहीं चाहते। केन्द्र में अधिकारियों की कमी के मुद्दे को मोदी सरकार ने आपदा में अवसर की तरह समझकर इस पूरे कैडर को अपने हिसाब से पदस्थ करने की तैयारी कर ली है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह देश को संघीय व्यवस्था की ओर ले जाने की कोशिश है।  
आईएएस कैडर रुल्स 1954 में हो रहे संशोधन पर छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्य सचिव सुयोग्य मिश्र का कहना है कि इससे राज्यों के कामकाज पर असर पड़ सकता है, हालांकि पूर्ण रूप से अधिकारियों पर केन्द्र का ही प्रभाव हो जाएगा। ये फिलहाल नहीं होगा क्योंकि अफसरों के सीआर लिखने के अधिकार के संबंध में कोई बदलाव नहीं हो रहा है।