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कोरोनावारः कभी निकलते थे 8 या 10, अब पूरे 250..., सरपट दौड़ रहा हाथ ठेला का बाजार

कोरोनावारः कभी निकलते थे 8 या 10, अब पूरे 250..., सरपट दौड़ रहा हाथ ठेला का बाजार

राजकुमार मल

भाटापारा, 14 जून। हाथ ठेला। जी हां, यह उस चीज का नाम है, जिसने कोरोना के चालू दौर में सैकड़ों- हजारों को सड़़क पर आने से बचाया हुआ है। इसके, चलते पहिए ने जीवन की गाड़ी को खींचने में जैसी मदद की हुई है, उसकी मिसाल फिलहाल कहीं मिलती दिखाई नहीं दे रही है।

कोरोना ने रोजगार छिना  तो, रोजगार के अवसर भी दिए हैं। जिस क्षेत्र की बात हो रही है, उसे सम्मान का दर्जा अब तक नहीं मिला है लेकिन संकट के दौर में इसने यह जरूर साबित कर दिया है कि यदि हम नहीं होते तो राशन, सब्जी ,दवाइयां और प्राणवायु कैसे आप तक पहुंच पाती? जी हां, इसे हाथ ठेला कहा जाता है। जो ताजा दौर में बेहद जरूरी बन चुका है। बाजार इस कदर उफान पर है कि कभी 30 रुपए प्रतिदिन के किराए पर मिलने वाला हाथ ठेला 50 रुपए प्रति दिन में भी मुश्किल से मिल पा रहा है।


अब 250 भी कम पड़ रहे 

शहर में किराए पर चलने वाले हाथ ठेला का बाजार आश्चर्यजनक रूप से बढ़ चुका है। कोरोना के पहले मुश्किल से 8 या 10 हाथ ठेला किराए पर चलते थे। अब 250 से 300 हाथ ठेला भी कम पड़ रहे हैं। किराया  फिलहाल 30 रुपए प्रतिदिन ही   हैं लेकिन मांग इतनी ज्यादा है कि  40 से 50 रुपए तक लिए जाने की खबर है।

यहां भी मारामारी

किराए पर मिलने वाले हाथ ठेला के बाजार में दो किस्म के ठेले चलन में हैं। पहला, सब्जी और फल का ठेला। दूसरा भारी वहन क्षमता वाले ठेले। इनमें छड़, सीमेंट और  अनाज जैसे भारी सामान लादे जाते हैं। किराया की दरें समान हैं लेकिन अनलॉक बाजार में ऐसी क्षमता वाले ठेले की भी मांग, बेतरह निकली हुई है क्योंकि बारिश के पहले, स्टॉक की मनोवृत्ति बन चुकी है।