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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - इवेंट में बदलते धार्मिक उत्सव

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - इवेंट में बदलते धार्मिक उत्सव

-सुभाष मिश्र

हमारे देश में एक दूसरे की देखा-देखी, अपनी जाति-धर्म और उससे बढ़कर अपना कथित जनाधार, प्रभाव, पॉवर दिखाने के लिए लोग धार्मिक उत्सव, जुलूसों और जाति, क्षेत्र विशेष से जुड़े त्यौहारों को एक बड़े इवेंट में तब्दील कर उसके जरिए अपना हित साधना चाहते हैं, अपना प्रभाव दिखाना चाहते हैं। देश के महानगरों और बड़े शहरों में रोजगार की तलाश में आकर बस गये लोगों को अपने तीज-त्यौहार, अपने धार्मिक स्थल, अपनी जातिगत-भाषागत-अस्मिता और लगाव के चलते ऐसे लोगों की जरुरत होती है जो उनके लिए अवसर उपलब्ध करा सके। आपदा में अवसर तलाशने वाले बहुत से लोगों के लिए यह मौका होता है। अपना प्रभामंडल चमकाने और अपने वोट की ताकत दिखाने का। जहां कहीं भी जनमानस इकट्ठा होता है या जिन चीजों से व्यापक जनसमुदाय को प्रभावित करने वाले कारक होते हैं, वहां बाजार भी अपनी उपस्थिति विज्ञापन, इवेंट, प्रायोजक और बहुत सारी लूट, ईमान के जरिए दर्ज कराने से नहीं चुकता। अब धार्मिक आयोजन बहुत सारे बड़े समूह जिसमें अब मीडिया समूह, उद्योग समूह होटल भी शामिल है, इवेंट का जरिया है। बाजार इवेंट में सभी उपभोक्ताओं की ज्यादा से ज्यादा भागीदारी चाहता है, किन्तु व्यक्ति धार्मिक कट्टरपंथी ताकतें, उत्सव, धार्मिक सत्ता और रूढि़वादी परंपरा और पहले से चली आ रही कथित धार्मिक रोक के कारण कभी स्त्रियों का धार्मिक स्थल पर प्रवेश वर्जित करता है तो कभी दलितों का। अब मामला इससे आगे चला गया है। मध्यप्रदेश के इंदौर और रतलाम में सार्वजनिक रास-गरबा एक तरह का इवेंट ही है, वहां पर गैर हिन्दुओं का प्रवेश वर्जित है, वहां के फ्लैक्स, बोर्ड टांगकर सांप्रदायिक सौहाद्र्र को बिगाडऩे की कोशिश जारी है। उत्तर प्रदेश में निकट भविष्य में होने वाले चुनाव के कारण छठ पर्व को अपने-अपने तरीके से भुनाने की कोशिशें भी जारी है। इसी तरह नवरात्रि के पर्व पर होने वाला गरबा भी अब एक बड़ा सार्वजनिक उत्सव हो गया है। जैसा कि गणेशोत्सव हो चाहे महाराष्ट्र में जन्माष्टमी के समय मटका फोडऩे की प्रतियोगिता हो या ईद मिलन की पार्टियां या फिर जातिगत-धार्मिक रैलियां अपनी पहचान, अस्मिता और अपनी ताकत दिखाने के लिए बहुत से नेता अपनी तरफ से इसे भत्ता प्रदान करते हैं।

हमारे यहां धार्मिक मान्यता और परंपरा के चलते बहुत से धर्मों में स्त्रियों का मंदिर-मस्जिद में प्रवेश वर्जित है। अभी हाल ही में सबरीमाला मंदिर में स्त्रियों को प्रवेश मिला है। देश के बहुत से मंदिरों में अभी भी स्त्रियों, दलित वर्ग के लोग उस तरह से प्रवेश नहीं कर सकते जैसे कि बाकी लोग। जैन धर्म की स्त्रियों के लिए बहुत से प्रतिबंध है। इसी तरह इस्लाम में भी मस्जिदों और दरगाहों में औरतों को जाने की मनाही है। औरतों को पर्दे के साथ घर में नमाज पढऩे कहा गया है, मस्जिद में मर्दों के साथ नमाज की मनाही है। अब लोग सार्वजनिक उत्सवों में भी इस तरह की पाबंदी लगाना चाहते हैं।

पूरी दुनिया में अलग-अलग स्थानों पर स्त्रियां अपने साथ होने वाले सभी तरह के भेदभाव से लड़ रही है, दलित भी अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं। ऐसी सारी लड़ाई के बीच कथित धार्मिक ताकतें ऐसा माहौल निर्मित करने में लगी है, जो हमें एक बार फिर से मध्यकालीन युग की ओर ले जाता है। वैसे तो हमारे देश में बालगंगाधर तिलक जैसे लोगों ने गणेशोत्सव की शुरुआत स्वतंत्रता आंदोलन में सबकी भागीदारी के लिए किया था। बंगाल में दुर्गा पूजा प्रत्येक बंगाली मानता है, पर अब रास-गरबा लगता है केवल हिन्दू ही मनायेंगे।

भारत सहित बहुत से देशों में इस समय धर्म-संप्रदाय, नस्लीय मुद्दों को लेकर अलग-अलग समुदायों के बीच तनाव की स्थिति बनी हुई है। अमेरिका में 9/11 के बाद अब वल्र्ड ट्रेड सेंटर की इमारत को उड़ाते हुए दो हजार लोगों की जानें गई तो इसे इस्लामी आतंकवाद का नाम देकर अमेरिका ने अफगानिस्तान के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। बीस साल बाद जब अमेरिका अफगानिस्तान से दुनिया के सबसे बड़े आतंकवादी ओसामाबिन लादेन को मार कर वापस चला गया तो भी वहां कट्टरपंथी तालिबान का ही शासन है। कथित इस्लामी आतंकवाद से इस समय बहुत से इस्लाम को मानने वाले ही मारे जा रहे हैं। गुजरात में हुए दंगे और गोधरा कांड के बाद से हमारे देश में धर्म की राजनीति तेज हुई है। देश में निकली रथ यात्रा के जरिए मध्ययुगीन मुस्लिम शासकों के बहाने मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा और घृणा का वातावरण निर्मित किया गया। हिन्दुत्व के उभार की राजनीति के बीच धर्मांतरण के मामले में इसाई मिशनरियों को भी निशाने पर लिया गया। ओडि़शा से एक पादरी ग्राहम स्टेस की हत्या हुई। पूरे देश में धर्म और जाति को राजनीति के साथ जोड़कर अलग-अलग दलों के नेताओं ने अपने-अपने एजेंडे तय किये। देश में जो उदारवादी लोकतांत्रिक माहौल था वह धीरे-धीरे कहरपन में तब्दील होने लगा। सोशल मीडिया ने दूसरे तरफ आग में घी का काम किया। अब किसी भी व्हाट्सअप ग्रुप को उठाकर देखिए उसमें नफरत का बारूद सुबह से उड़ेला जा रहा है। देश में बहुत से धार्मिक, जनसंचार और सांस्कृतिक संस्थाओं के जरिए से नागरिक समुदाय में सभी स्तरों पर जहर घोला जा रहा है। इस जहर का असर सबसे ज्यादा मध्यवर्ग के बीच फैला। देश में हुए आर्थिक विकास में सबसे ज्यादा फायदे में रहे इसे वर्ग को यह डर सताने लगता कि यदि निम्न वर्ग आर्थिक और सामाजिक अधिकारों के प्रति लडऩे लगा और अपने मूल मुद्दों को समझ गया तो हमारी सुख-सुविधा, संपत्ति का क्या होगा? बहुत सारे लोगों ने इस्लाम को आतंकवाद से जोड़ दिया, जबकि इस्लाम कहीं भी निर्दोषों के प्रति हिंसा को जायज नहीं मानता, जबकि आतंकवाद निर्दोषों की जान लेता है। पूरी दुनिया में हुई आतंकवादी घटनाएं इस बात का गवाह है कि आतंकी का कोई दीन इमान नहीं होता।
प्रसंंगवश कृष्ण कल्पित की कविता-
धर्म हो या नहीं
पर अधर्म न हो
रोशनी हो या न हो
अंधेरा न हो
प्यार हो या नहीं
नफरत नहीं हो
न्याय हो या नहीं
अन्याय न हो
यह आर्यावर्त की नई प्रार्थना थी
नयी आयत नयी ऋचा नया राष्ट्र-गीत
नया आर्तनाद!