प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- मो सम कौन, कुटिल खल कामी

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- मो सम कौन, कुटिल खल कामी


सूरदास ने यूं ही नहीं कहा था कि मो सम कौन कुटिल खल कामी। संत कबीर ने कहा था 'बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय। महात्मा गांधी ने अपनी जीवनी और अपनी पुस्तक सत्य के प्रयोग में पूरी ईमानदारी से अपनी खामियों, कमजोरियों को स्वीकारा। गांधीजी के बाद ऐसा कोई नेता नहीं आया जो इतनी ईमानदारी से अपने सत्य को स्वीकार करें। गांधी जी कहते हैं कि 'मुझे सत्य के शास्त्रीय प्रयोगों का वर्णन करना है, मैं कितना भला हूं, इसका वर्णन करने की मेरी तनिक भी इच्छा नहीं है। जिस गज से स्वयं मैं अपने को मापना चाहता हूं और जिसका उपयोग हम सबको अपने-अपने विषय में करना चाहिए, उसके अनुसार तो मैं अवश्य कहूंगा कि उनसे तो अभी मैं दूर हूं।

हमारे देश में आत्मचिंतन, आत्मआलोचना की जो परपंरा थी वह धीरे-धीरे समाप्त हो रही है। जैन धर्मावलंबी साल में एक बार क्षमा पर्व मनाकर अपनी गलतियों के लिए क्षमा मांग लेते हैं। क्रिश्चयन चर्च में जाकर कन्फेशन करके अपनी गलती, अपने अपराध स्वीकार करते हैं। हमारे यहां भी लोग अपने ईश्वर के सामने अपनी गलतियों की क्षमा मांगते हैं। पितृपक्ष समाप्त हुआ है। कितने लोगों ने अपने पुरखों, अपनी राजनीतिक विरासत के पितृ पुरूषों से वाकई क्षमा मांगी? यह क्षमा मांगने, अपनी गलती स्वीकारने का समय नहीं है। यह आत्ममुग्धता, आत्मप्रशंसा और झूठी प्रशंसा करने वालों को प्रमोट करने का समय है। सभी को ठकुरसुहाती अच्छी लगती है जो भी इस समय आपकी आलोचना कर रहा है, कमी बता रहा है उसे ब्लाक करने का, उसके खिलाफ जो हो सकता है वो करने का समय है। दुष्यंत कुमार के शब्दों में कहूं तो - 'ये मत कहो, आकाश में कुहरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।
हरिशंकर परसाई के शब्दों में कहूं तो 'दूसरों के ईमान के रखवाले हर क्षेत्र में जैसे बढ़ रहे हैं, वैसे ही साहित्यिक क्षेत्र में। अपना ईमान किश्तों में ये नैतिकतावादी कबाडिय़ों को बेचकर खलास कर चुकते हैं, तब सड़क पर चिल्लाते फिरते हैं - फलाँ ने अपना ईमान बेच दिया। अमुक अपना ईमान बेच रहा है, उसे रोको। रोक नहीं सकते तो उसे धिक्कारो! कुछ की हालत उस पुलिस-हवलदार जैसी है जो रात को किसी का माल चोरी करके घर में रख लेता है और फिर शहर में चोरी रोकने डंडा और सीटी लेकर निकलता है। या कोई उस सिपाही की तरह है, जो किसी घर से जेवर चुराना चाहता है, पर चुरा नहीं पाता, इसलिए चौकसी करने लगता है कि कोई दूसरा जेवर न चुरा ले। कई ऐसे हैं, जिनके ईमान का कोई ग्राहक नहीं मिलता, तो वे चिल्लाते फिरते हैं-वह ईमान बेच दिया! इसका मतलब है-मेरे पास भी बेचने को माल है। महँगा सस्ता निकाल दूंगा। ग्राहक सम्पर्क करें।Ó यह एक अंधी प्रतिस्पर्धा का अपने आपको श्रेष्ठ बताकर दूसरों को नीचा दिखाने का समय है। इस काम को पूरे योजनाबद्घ तरीके से रणनीति के तहत किया जा रहा है।

गांधी जी के सत्य के प्रयोग की तरह हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिनका जन्मदिन गोदी मीडिया में झूठी उपलब्धियों को महिमामंडन करते हुए मना, वे भी चाहे तो देश के साथ मेरे प्रयोग लिख सकते हैं, या लिखवा सकते हैं। गोदी मीडिया जिसमें बड़े-बड़े चैनल शामिल है ,उन बातों को उपलब्धि बता रहे हैं जिनके कारण आज देश की फजीहत हो रही है। नोटबंदी, तालाबंदी से लेकर चीन को सबक सीखाने तक की बात कही जा रही है। आप जैसा कोई नहीं की टैग लाईन के साथ महिमामंडन की जो बात कही जा रही है उसमें 2015 में ओबामा की भारत यात्रा से लेकर स्वच्छ भारत मिशन, कालाधन लाने की बात, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 खत्म करने, सर्जिकल स्टाइक के जरिये पाकिस्तान को सबक सीखाने और देश की जनता को कोरोना संक्रमण से निपटने, सोशल डिस्टेसिंग की जरूरत, आत्मनिर्भर भारत का पाठ पढ़ाना बनाना शामिल है।

कोई व्यक्ति किस तरह आत्ममुग्धता और आत्मप्रशंसा से अभिभूत हो सकता है उसकी वे एक जीवंत मिसाल था ,मीडिया पर मना यह जन्मदिन। हमारे यहां जैसी चले बयार पीठ तैसी कीजिए वाला लेखन, आचरण कुछ ज्यादा ही दिखाई दे रहा है।

अपने को महिमामंडित करने लिए हमारे यहां जो अधिकांश बायोग्राफी लिखी गई है या लिखवाई गई है, इंटरव्यू दिये जा रहे हैं उनमें आधा सच होता है। वे अपनी छवि की चिंता के साथ लिखी, दिखाई जाती है। सच्चाई उतनी ही रखी जाती है, जितने से छवि न टूटे। कैमरा देखते ही आदमी का आचरण, बॉडी लैंग्वेज बदल जाती है। विदेशों की तरह अपने बारे में संपूर्ण सच की बायोग्राफी किसी ने भी लिखी हो, ऐसा पढऩे-सुनने में नहीं आया। सवाल यहां पर यह है कि एक व्यक्ति, जो अपने भीतर के सारे सच-झूठ को जानता है और अपनी सारी बातों को अपने सीने में दबाकर कैसे रख पाता है? मुझे लगता है कि आदमी हर पल अपने आप से, अपने भीतर, अपने सच और झूठ का सामना करता है किंतु लाभ-हानि, मान-सम्मान, सामाजिक मर्यादा एवं देश काल परिस्थिति को देखकर वह अपने सच को उद्घाटित करता है तथा सच को इसी तरह उद्घाटित भी होना चाहिए। कोई भी सच मनुष्य से बड़ा नहीं है।
हर आदमी के भीतर जो कुछ गोपन है, उसे वह कहीं-न-कहीं प्रकट करता है। यह अलग बात है कि सच वह किसके सामने स्वीकार रहा है! एक व्यक्ति अपने जीवन की सारी पूँजी, सारी संपत्ति अपने बेटे-बेटियों एवं परिवारजनों को देना चाहता है। इसके लिए वह व्यक्ति अपने किसी विश्वस्त के माध्यम से वसीयत भी लिखता है, किंतु उसकी यह शर्त रहती है कि यह वसीयत उसकी मृत्यु के उपरांत पढ़ी जाए, सार्वजनिक की जाए। यह अपने आपमें कितनी बड़ी विडंबना है कि जो व्यक्ति अपना सब कुछ अपने परिजनों के नाम पर कर इस दुनिया से जा रहा है, वह भी इस सच को अपने जीते जी सबके सामने प्रकट नहीं करना चाहता। वह जानता है कि इस सच का सामना सभी लोग नहीं कर पाएंगे और इसके बाद जो प्रतिक्रिया होगी, उस सच का सामना वह व्यक्ति खुद नहीं कर पाएगा। इस व्यक्ति की मृत्यु के उपरांत शवयात्रा में शामिल लोग बार-बार राम नाम सत्य है, सत्य बोलो गत है की टेक लगाते हुए उसका क्रिया कर्म करते हैं और वह अपने सच के साथ पंचतत्व में विलीन हो जाता है। वसीयत खुल जाने के बाद का सच जाने बिना, जो मृतक के लिए प्रेम और धिक्कार, दोनों अलग-अलग उत्पन्न कर सकता है। एक संयुक्त परिवार में रहने वाला व्यक्ति, जो सबके लिए मददगार है, खुला हुआ है, वह व्यक्ति भी बहुत सारी ऐसी सहायता या कार्य अपने परिवार के अन्य सदस्यों से छिपाकर करता है, जो कि किसी भी दृष्टि से अनुचित नहीं है। संभवत: यह उसके कर्तव्य पालन, दायित्वों के अंतर्गत भी आता है, किंतु वह इसे भी छिपा जाता है।

हमारा सामाजिक ढांचा या कहें हमारे कथित संस्कार ऐसे हैं, जो हमें बहुत से सच को बोलने से रोकते है। हमें बचपन से ही यह सिखाया जाता है कि आदमी को सच बोलना चाहिए और दूसरी ओर यह भी बताया जाता है कि सच हमेशा कड़वा होता है, आदमी को हमेशा मीठा बोलना चाहिए। इस तरह के विरोधाभास के बीच हम जीवन जीते हैं।

जैसी हमारी अर्थव्यवस्था मिश्रित है वैसी हमारी नैतिकता भी मिश्रित है। दरअसल, हम जिस दुनिया में रहते हैं जो कुछ हम कामकाज करते हैं इस कामकाज के दौरान हमें बहुत सारे समझौते करने पड़ते हैं, बहुत सारे झूठ बोलने पड़ते हैं। यदि हम व्यवसायी हैं, हम मीडिया में हैं, सरकारी नौकरी में हैं, तो कभी न कभी कुटिलता, छल, झूठ का सहारा लेना पड़ता है किन्तु यदि राजनीति में है तो वहां अच्छा खासा व्यापार झूठ का है। अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए आदमी को क़दम-क़दम पर समझौते करने पड़ते हैं। हम देखते हैं कि जब अपने बारे में कुछ कहने की, लिखने की बात आती है तो लोग इस तरह से दिखते हैं, जैसे उनसे ज़्यादा ईमानदार पारदर्शी और सच बोलने वाला कोई दूसरा नहीं है। दरअसल, यह आत्ममुग्धता का समय हैं जहां प्राय: ऊपर से नीचे तक सब अपना अपना यशोगान कर रहे हैं। कोई पूरी यह स्वीकारने को तैयार नहीं है कि उसने जो कुछ हासिल किया जिन लोगों के बीच रहा उनके साथ उसने कोई छल न किया हो, कोई कपट न किया हो। हर आदमी अपने गिरेबान को पाक साफ़ बताने में लगा हुआ है। साहित्य और कला की दुनिया में लोगों ने यह ईमानदार कोशिश की है कि वे अपनी आपबीती लोगों के सामने लाए पर उसमें भी कम लोगों में यह साहस कर पाए हैं कि वे अपने स्याह पक्ष को उजागर करे। जिन लोगों ने ऐसी कोशिश की उन्हें लोगों ने सहजता से नहीं स्वीकार। हमारी भारतीय राजनीति में महात्मा गांधी जैसे कम ही लोग हुए हैं जो सत्य के प्रयोग जैसी किताब लिखने का साहस करें। अधिकांश किताबें जो किसी बड़ी शख्सियत पर लिखी गई है वह उसकी प्रशंसा में है। कुछ लोगों के बारे में यदि अंतरंग किस्से लिखे भी गए हैं तो वे उस व्यक्ति के मरने के बाद लिखे गए हैं या फिर इस बदनीयती से लिखे गये ताकि उस पर कलंक लगाया जा सके। लोग अपने बारे में अपने भोगे हुए यथार्थ के बारे में बिना किसी का कपोल कल्पना के नहीं लिखते। कवि भवानी प्रसाद मिश्र की कविता है कि 'जैसा तू लिखता है वैसा तू दिख । न लोग वैसा लिखते हैं, ना ही दिखते हैं।