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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-हमसे आया ना गया, तुमसे बुलाया ना गया

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-हमसे आया ना गया, तुमसे बुलाया ना गया


राजिंदर कृष्ण लिखित और तलत महमूद द्वारा गाया फिल्म देख कबीरा रोया का गाना, इस समय सभी मिलने जुलने वालों की जुंबा पर है। दरअसल यह दर्द है जो कहा भी ना जाया और रहा भी ना जाये। मेरे एक मित्र दंपति ने अपनी व्यथा बताते हुए कहा की बेटी-बहु अमेरिका में हैं, वहां जा नहीं सकते और कोरोना से उपजे भय के कारण अब किसी के यहां ना तो कोई बुलाता है और ना ही पहले की तरह बिना बताये अधिकार पूर्वक किसी के यहां भी आते जाते बनता है। कोरोना ने हमें भी पाश्चात्य बना दिया है। अब पड़ोसी रिश्तेदार, जान पहचान में भी पहले की तरह बिना बताये, अनुमति लिए बिना आ जा नहीं सकते। कितना पढ़े, कितनी टीवी देखें, कितनी वर्जुअल बातचीत करें जो मजा मिल बैठकर गपियाने में, बतरस में है वो मजा तो अब लगभग गायब सा हो रहा है। कोरोना संक्रमण के दौरान जिस सोशल डिस्टेंसिंग का पाठ पढ़ाया गया है , अब वह हमारे समाज था हिस्सा बन रहा है।

पिछले एक साल लोग कोरोनावायरस संक्रमण से बचने के लिए या तो दिन में कई बार हाथ धो रहे हैं, सेनेटाइज हो रहे हैं, काढ़ा पी रहे हैं या फिर मास्क लगाकर सोशल मीडिया पर डटे रहकर अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता का प्रदर्शन कर रहे हैं। जिन लोगों के पास मेहनत-मजदूरी के अलावा कोई विकल्प नहीं था, उन्होने कभी भी चाहकर भी अपने को घर की चारदीवारी में बन्द नहीं होने दिया। मनरेगा की मजदूरी पर काम में आने वालों की संख्या को देखकर ये भलीभांति समझा जा सकता की रोटी-रोजी के प्रश्न और चाहत किसी भी वायरस पर भारी पड़ती है। जब देश में अचानक से लॉकडाउन हुआ तो देश के लाखों-लाख मजदूरों ने बिना रेल, बिना बस और बिना किसी साधन की परवाह किसे तीनो लोक नाप दिये। जिस तरह की जीवटता, संघर्षशीलता का परिचायक इस देश के मेहनतकश नागरिकों ने दिया, उसने पूरे देश के नेतृत्वकर्ताओं को अचंभित किया।
किसी यहां उसके खुशी के मौके पर जाओ या ना जाओ पर उसके गम के मौके पर जरूर जाना चाहिए, जैसी सोच रखने वाले भारतीय समाज में कोरोना के चलते सामाजिक दूरी बढ़ा दी है। अब कोरोना के डर से शोक संतप्त परिवारों में चंद रिश्तेदार ही आवश्यक रस्मो-रिवाजों को निपटा रहे हैं। समाज में कोई किसी के घर सांत्वना देने भी नहीं जा पा रहा है। समाज प्रमुखों ने भी नए बदलाव को स्वीकार कर लिया है। बाकायदा हिदायत दे दी गई है कि किसी परिवार में शोक की घड़ी में भी न किसी को बुलाएं और न ही किसी के घर जाएं। हालात को देखते हुए जैसे-तैसे भी हो काम निपटाएं। पूरे देश में दुख की घड़ी में सोशल मीडिया का सहारा लेकर ऑनलाइन शोकसभा को अपनाने का चलन बढ़ा है।

छत्तीसगढ़ सिंधी पंचायत के निर्णय अनुसार यदि किसी परिवार में मृत्यु होती है तो परिवार के लोग ही शामिल हों। यदि परिवार में कम सदस्य हैं तो समाज के कार्यकर्ता परिवार की सहमति से कार्यक्रम निपटाएं। मृत्यु के बाद ऑनलाइन शोकसभा रखी जाए और मोबाइल पर ही श्रद्धाजंलि दी जाए। वो परिवार जो अपने परिजनों की अस्थियां विसर्जित करने प्रयागराज के संगम में जाते थे वे अब गंगा में नहीं, खारुन नदी में अस्थियों का विसर्जन कर रहे हैं। ब्राह्मण समाज, अग्रवाल समाज, माहेश्वरी समाज, गुजराती समाज में अस्थियों का विसर्जन हरिद्वार के हरकी पौडी, इलाहाबाद के संगम तट पर विसर्जन करने की परंपरा रही है। बहुत से परिवारजन अब अस्थियों का विसर्जन महानदी राजिम या खारुन नदी के महादेवघाट में कर रहे हैं। जिन समाजों में भोज करवाने की परंपरा थी, उन्होंने अब मृत्यु भोज का आयोजन लगभग बंद कर दिया है।

एक फिल्म थी 'पेज थ्री। कोरोना काल में उसका गाना भी काफी चर्चा में रहा है जो कोरोना काल के हालातों को बयां करता है। कितने अजीब रिश्ते हैं यहां के, दो पल जिते हैं, साथ-साथ चलते हैं, जब मोड़ आए तो बच के निकलते हैं।

कोरोना संक्रमण के दौरान आपसी रिश्तों को या कहें डिस्टेंस रिलेशनशीप को बचाये, बनाये रखने में मोबाइल, ईंटरनेट कनेक्शन स्मार्ट टीवी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह उनके लिए आसान रहा जिनके पास आधुनिक संसाधन, नेटवर्क था। उन्होंने इसका भरपूर उपयोग किया। सामान्यत: लोग घरेलू रिश्तों के तनाव से बचने के लिए लोग दोस्तों और सहकर्मियों का सहारा लेते हैं। लेकिन, सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों के चलते लोगों का ये सपोर्ट सिस्टम भी लोगों के पास से जाता रहा। लोगों की पुरानी गतिविधियां जिनमें लोगों से मिलना-जुलना, जिम जाना और बाहर खाना-पीना लॉकडाउन के दौरान बंद हो गया। लोगों से जुडऩे के लिए डिजिटल नेटवर्क जैसे की सोशल मीडिया, वीडियो काल, मैसेज वगैरह के भरोसे ज्यादा हो गए। मगर दुनिया में बहुत से लोग ऐसे हैं, जिनके पास इस तकनीक का सहारा नहीं है। हांग कांग की चाइनीज यूनिवर्सिटी की मनोवैज्ञानिक फैनी च्यूंग कहती हैं, तकनीकी संसाधनों की उपलब्धता को लेकर बहुत असमानता है। आज भी बहुत से लोगों के पास संवाद के ये साधन नहीं है। वहीं युवा पीढ़ी आज इसी डिजिटल सपोर्ट सिस्टम के सहारे है। हो सकता है कि फौरी तौर पर ये वर्चुअल दुनिया राहत देती हो। मगर, इस आभासी दुनिया में ज्यादा वक्त बिताने के बाद युवा पीढ़ी और भी अकेलापन महसूस करने लगती है। कोरोना के दौरान किये गये लॉकडाउन से घरों में साथ-साथ ज्यादा समय गुजारने को मजबूत दंपत्तियों के बीच घरेलू हिंसा और तलाक के मामलों में भारी इजाफा हो गया है।

शादी-ब्याह मंगलकार्यों में सम्मानजनक तरीके से नहीं बुलाये जाने वाले फुफा, मौसा और जाजीजी ने लगभग चुप्पी साध ली। यदि उन्हें बुलाया भी गया तो उन्होंने नियम कानून, कोरोना महामारी आदि का बहाना करके आने से मना कर दिया। कोरोना ने सबको रूठना, मनाना जैसी कवायद से मुक्ति दिलाई। कोरोना के चलते लोगों ने जहां अपने प्रियजनों की मृत्यु जैसे दुख के अवसर पर भी अपने को दूर रखा है वहीं खुशी के मौके पर भी दूर से ही अपनी खुशी का इजहार किया।

कोरोना संक्रमण के दौरान समय-समय पर जारी अलग-अलग गाईड लाईन ने लोगों का मानस बदलने में अहम भूमिका निभाई है। लोगों से कहा गया और कहा जा रहा है कि पब्लिक प्लेस और वर्क प्लेस पर मास्क लगाना जरूरी है।

पब्लिक प्लेस, वर्क प्लेस और ट्रांसपोर्ट सेवाओं के इंचार्ज की यह जिम्मेदारी होगी कि वह सरकार के निर्देशों के अनुसार सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कराए। किसी भी संस्थान या पब्लिक प्लेस के मैनेजर को 5 या उससे ज्यादा लोगों के एक साथ जमा करने की इजाजत नहीं होगी। शादी या अंतिम संस्कार पर डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट का निर्देश मान्य होगा। पब्लिक प्लेस पर थूकने पर सजा के साथ जुर्माना भी होगा। शराब, गुटखा और तंबाकू उत्पाद की बिक्री पर प्रतिबंध रहेगा। काफी लंबे समय तक यात्री ट्रेनों की सभी तरह की आवाजाही बंद रही। पब्लिक ट्रांसपोर्ट में इस्तेमाल होने वाली बसें नहीं चली। मेट्रो रेल सेवाएं बंद रही।

मेडिकल वजहों को छोड़कर बाकी सभी लोगों का एक दूसरे से जिलों और एक से दूसरे राज्यों मूवमेंट को रोका गया। सभी तरह के एजुकेशन, ट्रेनिंग और कोचिंग इंस्टीट्यूट्स बंद रहे, जो धीरे-धीरे खुल रहे हैं। कोरोना की वैक्सीन आ गई है किन्तु अभी फ्रंट लाईन वर्कर को ही मिली है किन्तु इसका सकारात्मक प्रभाव समाज में भी दिखाई दे रहा है।