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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - सरकारी कार्य संस्कृति और छुट्टियां

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - सरकारी कार्य संस्कृति और छुट्टियां


- सुभाष मिश्र

केंद्र सरकार और अपने  पूर्ववर्ती राज्य मध्यप्रदेश के पद चिन्हों पर चलते हुए छत्तीसगढ़ में भी सरकारी कामकाज के लिए पांच दिन का सप्ताह तय हो गया।  छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने 26 जनवरी गणतंत्र  दिवस के अवसर पर यह घोषणा की।

24 घंटे के भीतर ही सामान्य प्रशासन विभाग ने मुख्यमंत्री को नई व्यवस्था 22 फरवरी से लागू करने का प्रस्ताव भेज दिया है। इस प्रस्ताव में खास बात ये है कि नवा रायपुर के दफ्तरों से लेकर मैदानी कार्यालयों में काम करने वाले अधिकारी-कर्मचारियों के कामकाज की अवधि आधा घंटा बढ़ाया गया है। इस घोषणा के बाद से ही छत्तीसगढ़ के कर्मचारियों में खुशी का माहौल है। कर्मचारी इस फैसले को लेकर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को धन्यवाद दे रहे हैं।

छत्तीसगढ़ कर्मचारी अधिकारी फेडरेशन ने सीएम भूपेश के फैसले का किया स्वागत, 5 दिन काम और 14 प्रतिशत शासन अंशदान के निर्णय को अभूतपूर्व बताया है। फेडरेशन के पदाधिकारियों का कहनाहै कि मुख्यमंत्री के इस दूरदर्शिता पूर्ण निर्णय से कर्मचारी-अधिकारियों को वर्कलोड के कारण उत्पन्न मानसिक तनाव भी दूर होगा। मुख्यमंत्री के इस निर्णय से कर्मचारियों के कार्यक्षमता में वृद्धि होगी तथा वे शासकीय कार्यों के साथ अपने पारिवारिक दायित्वों को औरअधिक बेहतर ढंग से पूर्ण करने में सक्षम होंगे।

फिलहाल नई व्यवस्था के हिसाब से देखा जाए तो साल में 161 दिन कार्यालीन यानि कामकाज और 209  दिन अवकाश है, इसमें 52 दिन रविवार, 52 दिन शनिवार 13 दिन की केजुअल लीव तीस दिन अर्जित अवकाश, मेडिकल लीव ,स्पेशललीव ,मातृत्व अवकाश, त्यौहारों और जयंती की छुट्टी है। यानि काम से ज्यादा छुट्टियां ही छुट्टियां है।

हमारे देश  में किसी महापुरुष, किसी तीज-त्यौहार , किसी जयंती, पुण्यतिथि  पर अवकाश कीपरंपरा है।  लोगों को  लगता है कि अवकाश से व्यक्ति, समाज और उत्सव तीज त्यौहार  कीमहत्ता  बढ़ती है।  बहुत सारे संगठन  समाज  अक्सर  अपने  महापुरुष , तीज त्यौहार को लेकर अक्सर सार्वजनिक अवकाश की मांग करते देखे जाते है। ये अलग बात है कि जिस महापुरुष कीजयंती पर अवकाश होता है उससे लोगों को कोई लेना-देना नहीं होता। अवकाश यानि मौज-मस्ती, पिकनिक  आराम।  सवाल यह है कि ऐसा आराम क्या किसी किसान, मजदूर, रोज कमाने-खाने वाले  को भी मिलती है क्या ?  पूरी दुनिया में जब सरकारी कामकाज में बढ़ती अवकाश की प्रवृत्ति क्या सही है ये प्रश्न लोगों के मन में आना स्वाभाविक है।  24 &7  वर्ककल्चर बढ़ रहा है। ऐसे सेक्टर से जुड़ी सेवाओं में काम वाले लोग हमें 24 घंटे काम करते दिखते हैं।  बहुत सरे लोगों के लिए यह सूत्र वाक्य हो सकता है कि-
किस किस का गिला कीजिये किस किस पर रोईए
आराम बड़ी चीज है मुहं ढंककर सोइये
मेरी अपनी कविता का एक अंश है

जिस दिन स्कूल में मास्टर पढ़ाने को तैयार होगा उस दिन किसी न किसी  बात पर इतवार होगा।

पांच दिन कार्य दिवस की वकालत करने वालों का कहना है कि प्रशासनिक संवेदनशीलता में कहीं कोई कमी नहीं हुई बल्कि कार्यों और सरकारी कर्मचारियों की उत्पादकता बढ़ी ही है। दुनिया के अधिकांशत: देशों में 5 डेज कार्यसंस्कृति पुरानी पड़ चुकी है। स्पेन, न्यूज़ीलैंड, संयुक्त अरब अमीरात, जापान जैसे दजऱ्नों देश हैं जो अपने कर्मचारियों में जिसमे कंपनी और सरकारी
दोनों हैं उनमें 4 दिन और कहीं साढ़े चार दिन की कार्यसंस्कृति लाने जा रही है। कुल मिलाकर माह में दो दिन अतिरिक्त अवकाश देकर यदि सरकार अपने तंत्र में कसावट लाने का वह भी कर्मचारी संगठनों की मांग के बाद करने जा रही है तोइसके नतीजे आने तक सोच अनावश्यक नकारात्मक न हो यह भी ध्यान रखना होगा। बहुतेरे विभागों के अधिकारियों जैसे पुलिस, राजस्व, स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली जैसे प्रमुख विभागों को रविवार हो या अन्य कोई सरकारी हॉलीडे लगातार काम करना होता है। पुलिस वालों को वीकली ऑफ जैसा मानवीय संवेदना के लिए जरूरी अवकाश भी नहीं मिल पाता। सरकारी डॉक्टरों को रात दिन इस कोरोना काल में और उसके पहले भी अपने आपको सेवा में जुटे दर्जनों विभाग हैं जिनके अमले के लोग सरकार के कामों को लोक कल्याणकारीयोजनाओं के क्रियान्वयन में रात दिन जुटे रहते हैं। यदि कोई सरकारी मुलाजि़म समय पर काम नहीं करता, लालफीताशाही और टरकाने का काम करता है तो वह पहले वाली बात अब नहीं रह गयी है। जवाबदेही और पारदर्शिता लाई गई है। सूचना का अधिकार और लोक सेवा गारंटी अधिनियम के द्वारा सरकारी तंत्र पर कसावट लाई जा रही है। लापरवाह लोगों पर अनुशासन का डंडा अबदिखता है। सरकारी नौकरी अब पहले जैसे सुविधा की स्थिति में नहीं रह गयी है। हर जगह कोई देख रहा है, कोई सुन रहा है यह भय लापरवाह लोगों में भी दिखता है। यद्यपि अभी भी इसमें सुधार कीबहुत गुंजाइश है। लोग अनुशासन से डरे लेकिऩ उनमें डर सरकारी काम के जानबूझकर लटकाने जे ढर्रे पर भी हो यह समय की नजाकतहै और सरकार यदि माह के दो दिन छूट देकर यदि कसावट का कोई प्रयास कर रही है तो सीधे आलोचना करने से कुछ नही होगा। समय देना होगा, क्या सुधार दिखता है। यह सही है कि आराम के बाद कार्य की उत्पादकता बढ़ती ही है। देखना होगा हर सरकारी कर्मचारी कामचोर नहीं होता, बहुतेरे ऐसे भी हैं जो सुदूर अपनेघर परिवार से दूर पदस्थ होते हैं ऐसे व्यक्ति को यदि इस 2 दिन अपने परिवार को समय देते यदिबन जा रहा है तो कुल मिलाकर उसके काम करने के तरीके और गुणवत्ता में सकारात्मक परिणाम मिलेगा उसमे कोई दो राय नही है।

अक्सर यह देखने को मिलता है कि सरकारी दफ्तरों में बैठने वाले अधिकांश लोग जिनमें अफसर, बाबू से लेकर चपरासी तक शामिल हैं, उनका व्यवहार आम आदमी के प्रति खास करके गरीबों के प्रति बहुत ही अमानवीय होता है। जब लोग अपने कामकाज के लिए सरकारी दफ्तरों में जाते हैं तो उन्हें या तो लोग अपनी सीट पर नहीं मिलते और यदि मिल भी जाये तो उनकी प्रवृति टालमटोल की होती है। सरकारी क्षेत्र में व्याप्त लालफीताशाही के चलते लोगो के नाम पर सरकारी तंत्र के प्रति एक तरह की वितृष्णा का भाव होता है। यदि हम छत्तीसगढ़ की राजघानी नवा रायपुर से संचालित दफ्तरों और वहां की कार्यसंस्कृति की बात करे तो लोगों को लगता था की अब अपना छत्तीसगढऱाज्य बन गया है, सब काम आसानी से हो जायेगे पर अभी भी लोगो को भोपाल जैसी दूरी महसूस होती है। राजधानी रायपुर से आकर कम होगी। रायपुर शहर की सीमित अधोसंरचना को देखते हुए करोड़ों रूपए की लागत से रायपुर से काफी दूर नवा रायपुर बनाया गया। जो शासन-प्रशासन पहले से ही जनता से दूर होकर क्वारटीन होकर बैठा था। उसे कोरोना संक्रमण का बहाना मिल गया।आज छत्तीसगढ़ के लोगों को नवा रायपुर राजधानी तक पहुंचने और अफसरों से मिलने में भगवानयाद आ जाते हैं। चाहे मामला सामाजिक सुरक्षा पेंशन का हो या गरीबों के हित में संचालित योजनाओं का सभी ओर जो ब्यूरोक्रेटिक आचरण दिखाई देता है वह बहुत ही पीड़ादायक है। सरकारी कामकाज के समय में लोग अपने व्यक्तिगत काम निपटाते हैं। बड़े अधिकारी जिनके पास एक से अधिक विभागों की जवाबदारी है वे कब और कहां मिलेंगे यह जानना भी किसी गूढ़ रहस्य को जानने जैसा है।