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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - कोउ नृप होय हमैं का हानि

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - कोउ नृप होय हमैं का हानि

-सुभाष मिश्र

तुलसीदास चरित्र रामचरित्र मानस में दासी मंथरा ने रानी कैकई से यह चौपाई कही थी यह चौपाई तटस्थतावादियों, भाग्यवादियों और ठंडे किस्म लोगों को हमेशा से भाती रही है कि -
कोउ नृप होइ हमैं का हानी
चेरि छाडि़ अब रानी

राम राज्य में सत्ता पलट के समय एक दासी द्वारा कही गई यह बात कि सत्ता बदलने से क्या फर्क पड़ेगा। मैं तो दासी की दासी ही रहूंगी, रानी आप सोचो आपका क्या होगा?
हमारा पड़ोसी राष्ट्र अफगानिस्तान सत्ता पलट के बाद अब तालिबान हो गया है। ईरान की ही तरह यहां भी धार्मिक नेता मुल्ला अखुंदजदा तालिबान का होना हमारे लिए क्या मायने रखता है, उसका क्या असर हमारे देश में पड़ेगा, उसे समझने जाने के लिए हमें हमारे सोशल मीडिया पर आ रही पोस्ट के अलावा हमारे देश के विदेश मंत्री, राजनेताओं और विदेश नीति के जानकारों की बातों को सुनना समझना पड़ेगा।
तालिबानी एक तरह की कट्टरपंथी सोच है जो कथित धार्मिक मान्यताओं के आधार पर स्त्री-पुरुष में भेद करके धर्म के नाम पर ऐसी शासन व्यवस्था चाहती है जिसमें कुछ ही लोगों के पास जो कि पुरुषवादी सोच के है, उनके पास सारे अधिकार हैं। ऐसे लोग आधुनिक, वैज्ञानिक सोच और बराबरी के अधिकारों के सहज खिलाफ होते हैं। हमारे देश में भी डेमोक्रेसी के बावजूद अभी भी बहुत सारे लोग पार्टियां तालिबानी सोच की ही हैं। उनका बस चलें तो अभी भी तुलसीदास की किसी संदर्भ विशेष में कही गई यही चौपाई दोहरायेगें
ढोर, गंवार, शुद्र, पशु, नारी
ये सब ताडऩ के अधिकारी

ओ.टी.टी. प्लेटफार्म डिज्नी+हाट स्टार पर एक सीरिज द एम्पायर शुरू हुई है।
इस सीरीज की कहानी एलेक्स रदरफोर्ड की किताब Empire of the moghul-raiders from the north पर बेस्ड है। ये सीरीज मुगल साम्राज्य के उत्थान से लेकर पतन तक की कहानी बताती है, जिसकी शुरुआत बाबर को बादशाह बनाए जाने से होती है। मगर इस सीरीज के रिलीज होते ही सोशल मीडिया पर #uninstallhotstar ट्रेंडहोना शुरू हो गया। इन लोगों का कहना है कि ये सीरीज बाबर जैसे क्रूर शासक का महिमा मंडन करती है। जिस बाबर को हमारे देश के बहुत से कथित राष्ट्रवादी संगठन गाली देकर उसे मुसलमानो के साथ जोड़ते हैं, वो राजा इस सीरिज में काबुल से हिन्दुस्तान आकर पानीपत में अपनी जीत दर्ज करता है और वहीं से मुगल सल्तनत की शुरुआत होती है। द एम्पायर सीरिज का बाबर अब तक किस्से कहानियों में गढ़े गये लुटेरे बाबर से अलग है। इतिहास और वर्तमान की कुछ घटनाओं को लेकर लोग देश के भीतर ऐसे हालात पैदा करना चाहते हैं जिससे देश में हिन्दू-मुसलमान के बीच वैंमनस्यता बढ़े जिसका लाभ राजनीतिक दल चुनाव के दौरान उठा सकें।
फिल्म इंडस्ट्री में इन दिनों एक नई बहस शुरू हो गई है। हाल ही में डायरेक्टर कबीर खान ने एक इंटरव्यू में मुगलों को असली राष्ट्र निर्माता कहा था। उन्होंने यह भी कहा था कि वे उन फिल्मों की रिसपेक्ट नहीं कर सकते जिनमें मुगलों को गलत ढंग से दिखाया जाता है। इस बयान के बाद गीतकार मनोज मुन्तशिर ने एक वीडियो शेयर किया था, जिसमें उन्होंने मुगलों की तुलना डकैतों से की।
पटकथा लेखक मयूर पुरी ने ट्वीट किया, घृणा बीच क्यों, मनोज भाई? किसी भाई का पूरी तरह से गुलाबी इतिहास नहीं है। पर लेखकों को आग लगने का नहीं, आग बुझाने का काम करना चाहिए। कृपया बुरा न मानें, लेकिन मैं थोड़ा निराश हूं कि आप इस तरह का काम कर रहे हैं।
राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता जगदानंद सिंह ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को भारत का तालिबान कहा। राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के करीबी सहयोगी ने कहा कि तालिबान एक नाम नहीं बल्कि अफगानिस्तान में एक संस्कृति है, जैसा कि भारत में आरएसएस है। उन्होंने कहा तालिबान को अफगानिस्तान में सांप्रदायिक नफरत फैलाने के लिए जाना जाता है और आरएसएस भारत में भी ऐसा ही कर रहा है। बयान पर संज्ञान लेते हुए बिहार की बीजेपी इकाई ने तीखी प्रतिक्रिया दी। बीजेपी प्रवक्ता अरविंद सिंह ने एक प्रमुख दैनिक से बात करते हुए कहा उनका (जगदानंद सिंह) बयान हिटलर सिंह जैसा है।
अफगानिस्तान में इस समय जो कुछ घटित हो रहा है उसने सारी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है। निर्दोष अफगान नागरिकों विशेषकर महिलाओं और बच्चों के साथ तालिबानी आंतकियों की बर्बरता की जो खबरें रोजाना ही सामने आ रही हैं, वे मानवता के लिए कलंक हैं और पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। तालिबानी बर्बरता को किसी भी सूरत में सही नहीं ठहराया जा सकता। अमेरिकी ने अगर अफगानिस्तान के नागरिकों को उनके हाल पर छोड़ कर वहां से पलायन करने का फैसला किया है तो इसका मतलब यह नहीं तालिबानियों को खुली छूट मिल गई। तालिबानी जीत से प्रभावित होकर जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की मुखिया मेहबूबा मुफ्ती ने हाल में ही इस मुद्दे पर जो विवादित बयान दिया है उससे तो यही साबित होता है मानों वे तालिबान आतंकियों की बर्बरता का औचित्य सिद्ध कर रही हैं।
जम्मू-कश्मीर को लेकर हमारे देश में सियासी पारा हमेशा चढ़ा रहता है। मोदी सरकार ने कश्मीर से धारा 370 हटाकर उससे विशेष राज्य का दर्जा छीन लिया है। कश्मीर के नेता लंबे समय तक अपने-अपने घरों में नजरबंद रहे। लंबे अंतराल बाद उनसे केंद्र की बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। अब तालिबान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने कहा है कि उनके पास जम्मू-कश्मीर के मुसलमानों के लिए आवाज उठाने का अधिकार है। पाकिस्तान का समर्थन तालिबान को है वो तालिबान के जरिए कश्मीर में घुसपौठ की कोशिश करेगा। कश्मीर के जरिए पूरे देश के मुसलमानों को सोशल मीडिया पर टारगेट किया जायेगा।
उत्तरप्रदेश सहित पांच राज्यों में होने वाले चुनावों में कश्मीर और तालिबान के जरिए सोशल मीडिया पर खबरे फैलाकर उसे सांप्रदायिक रंग देने की कोशिशें भी होगी जिसकी शुरुआत हो चुकी है। अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने कोरोना काल में सोशल मीडिया के जरिए तबलीगी जमात के कार्यक्रम के जरिए सांप्रदायिकता फैलाने की कोशिश की आलोचना करते हुए कहा है कि सोशल मीडिया प्लेटफार्म फेक न्यूज से भरे हैं। सोशल मीडिया कंपनियों का इस पर कोई नियंत्रण नहीं है। खबरों के जरिये सांप्रदायिकता रंग देने की कोशिश होती है जिससे देश बदनाम होता है।
भारत की चिंता यह है कि अफगान की भूमि का उपयोग भारत विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं किया जाये। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिदंम बागची ने इस संबंध में भारत की चिंता से तालिबान के प्रतिनिधि को अवगत कराया है। अमेरिका, एशिया, चीन जैसी महाशक्तियों के लिए अफगानिस्तान हमेशा से सामारिक ताकत बढ़ाने का केंद्र रहा है। एशिया मूल के बाकी देश भी जिसमें भारत, पाकिस्तान प्रमुख है, तालिबान की प्रत्येक घटना पर नजर रखे हुए हैं। हमारे देश ने अफगानिस्तान में पिछले सालों में करोड़ो रुपये का निवेश किया।ह मारे बीच द्विपक्षीय व्यापार बुरी तरह प्रभावित हुआ है। अफगानिस्तान से सूखे मेवे, फल और औषधिया, जड़ी-बुटियों का आयात होता है। हमारे देश में वहां चाय, काफी, कपास, मिर्च, कपड़े, दवाएं, चिकित्सा उपकरण, आटो पार्टस आदि चीजे जाती है।
दरअसल हमारे देश के अधिकांश राजनीतिक दल तत्कालिक रूप से ऐसे मुद्दों की तलाश में रहते हैं जिससे बड़े जनमानस को प्रभावित किया जा सके। गरीबी हटाओ से लेकर अच्छे दिन आने वाले हैं जैसे मुद्दे जनसंख्या के दबाव और आर्थिक कारणों से मैदानी स्तर पर वह परिणाम नहीं दे सकते, जिससे व्यापक जनमानस प्रभावित हो। धर्म, संप्रदाय, राष्ट्रवाद और क्षेत्रीय अस्मिता, बोली, भाषा ऐसे मुद्दे हैं जो हमेशा शाश्वत रहते हैं जिनसे जनमानस को रातों रात उद्देलित किया जा सकता है। बात भारत-चीन युद्ध की हो या कारगिल विजय की या फिर रामजन्म भूमि विवाद से जुड़ी हो या फिर पुलवामा हमले। तीन तलाक से लेकर, कश्मीर से धारा 370 हटाने की बात हो या फिर गौहत्या की। ऐसा कोई भी मुद्दा, घटना जो तात्कालिक रूप से जनमानस में भय, घृणा और एक दूसरे के प्रति वैंमनस्यता पैदा कर सके वह चुनाव जीतने के लिए बहुत कारगर साबित होता है। इस समय देश कोरोना से जुझ रहा है। राममंदिर के बनने की प्रक्रिया के चलते वह भी अब मुद्दा नहीं रहा। चीन को लेकर वो हाईप नहीं बनती जो पाकिस्तान को लेकर बनती है। ऐसे में तालिबान का घटनाक्रम निश्चित रूप से देश से जोड़कर अलगाववाद और साम्प्रदायिकता की छौंक में गरमाया जा सकता है। चुनाव में कोई न कोई तनाव चाहिए। अब जम्मू-कश्मीर, तालिबान, पाकिस्तान हॉट केक के रूप में मौजूद है जितना चाहे खाओ बाकी सारी बातें भूलकर लोग राष्ट्र के नाम पर फिर एक बार एक साथ वोट डाल ही देंगे।
आप कहते रहिए कोउ नृप होई हमैं का हानि। हानि लाभ का गणित तो यूं ही चलता रहेगा।