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II एक न एक शम्मा अंधेरे में जलाए रखिये : प्रधान संपादक सुभाष मिश्र का कहना है कि देश मोदीजी के साथ चल रहा है, अफसोस उसे बुनियादी सवालों के उत्तर नही मिल रहे

II एक न एक शम्मा अंधेरे में जलाए रखिये : प्रधान संपादक सुभाष मिश्र का कहना है कि देश मोदीजी के साथ चल रहा है, अफसोस उसे बुनियादी सवालों के उत्तर नही मिल रहे

सुभाष मिश्र


अपने-अपने घरों में सिमटे देश के लोगों से देश के प्रधानमंत्री ने कल 5 अप्रैल की रात्रि में एक न एक शम्मा अंधेरे में जलाये रखने की बात कही है। प्रधानमंत्री का यह आव्हान कोरोना वायरस से होने वाली बीमारी के फैलाव को रोकने के लिए लागू लॉकडाउन में अपने-पने घरों में रह रहे, देश के 130 करोड़ भारतीयों से है। प्रधानमंत्री अपने इस संदेश के जरिये देश के लोगों को अंधकार से उजाले की ओर ले जाने की बात कर रह हैं। वे देश की एकजुटता दिखाने का और कोरोना के खिलाफ जंग में कोई अकेला नहीं, पूरा देश एक साथ खड़ा है, ये संदेश देकर मनोवैज्ञानिक उपचार कर रहे हैं।

मोदीजी जननेता हैं और वे बार-बार अपने प्रयोगों से ये साबित करते हैं कि वे देश की नब्ज पहचानते हैं। लोग उनकी बातें मानकर, उस पर अमल भी करते हैं। लोगों ने नोटबंदी के समय उनकी बात मानी। लोगों ने नागरिकता रजिस्टर के समय उनकी बात मानी। संविधान में संशोधन कर धारा 370 हटाने की उनकी बात मानी। हर उस नाजुक मौकों पर बहुमत जनसंख्या ने उनकी बात मानी। जहां उनकी पार्टी को बहुमत नहीं, वहां उन्होंने बहुतेरे तरीके से बहुमत हासिल किया। मोदी जी जो सोच लेते हैं, उसे लागू करने जुट जाते हैं। सवाल यह है कि देश के लोगों में सकारात्मकता पैदा करने के लिए क्या ये तरीके कारगर होंगे!

यदि मोदीजी लोगों को बताते कि कोरोना से निपटने की उनकी तैयारी क्या है, उनकी नीतियां क्या हैं, वे लोगों को जो कठोर कदम उठाये जा रहे हैं, उसके बारे में बताते और जो लोग अपने-अपने घरों में असहाय स्थिति में बैठे हैं, उन्हें सांत्वना देते तो ये बात ज्यादा प्रभावी होती। केवल रौशनी करने से क्या लोगों में सकारात्मकता और राष्ट्रभक्ति का संचार होगा? ये प्रश्न बहुतों के दिमाग में है. कोरोना महामारी से भावनात्मक तरीके से ज्यादा बुद्धिमतता के साथ निपटने की ज्यादा जरूरत होगी। अमेरिका जैसे देश जिसके पास विश्व स्तर की स्वास्थ्य सेवाएं और बुनियादी सुविधाएं थी और उसकी धाक पूरी दुनिया में थी, इस बीमारी के चलते उसकी साख को बट्ठा लगा है।


ऐसे कोरोना समय में मोदी जी विश्व नेता के रूप में पूरी दुनिया में अपने नवाचार के जरिये अपनी छबि बनाना चाहते हैं। आधी दुनिया में फैली कोरोना की बीमारी उनके इस मकसद में उनके लिए काफी मददगार साबित हो रही है। पूरी दुनिया में मीडिया इस बात का डंका पीट रहा है कि मोदी जी दुनिया के सबसे बड़े गणतंत्र के सर्वमान्य लौहपुरूष हैं। मोदीजी ने स्वतंत्रता आंदोलन के पुरोधाओं में से अपने लिए सरदार वल्लभ भाई पटेल को चुना। उनकी आदमकद मूर्ति नर्मदा सरोवर पर लगवाई। मोदीजी के भक्तों और मीडिया से जुड़े बहुत से लोगों और हिन्दु राष्ट्र की अवधारणा में विश्वास करने वाले लोगों का मानना है कि मोदी जी जैसा नेता 'न भूतो ना भविष्यति'

दुष्यंत कुमार ने बहुत पहले बहुत से शेर लिखे थे परंतु आज मैं दो शेर को मौके की नजाकत को देखते हुए कोड कर रहा हूं :
कहां तो तय था चिरागॉ
हर एक घर के लिए
कहां चिराग मयस्सर नहीं
शहर के लिए।
यहां दरख्तों के साये में धूप होती है
चलो यहां से चलें, उम्र भर के लिए

एक और दूसरा शेर है-
न हो कमीज तो पांवों से पैर ढंक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं, इस सफर के लिए।


मोदीजी चाहते तो सोशल डिस्टेंसिंग रखते हुए जरूरतमंदों की, पड़ोसियों की मदद करने का आहवान भी कर सकते थे पर निराशा ही हुई। बहुत से लोगों के घरों में चूल्हे नहीं जल पा रहे हैं। बहुत से घरों में रौशनी का इंतजाम नहीं है। गांव के गांव अंधेरे खौफ के साये में हैं। बहुत से परिवारों के लोग जो रोज-रोटी कमाने के लिए देश के अलग-अलग कोने में गये थे और लॉकआउट के कारण पैदल चलने के बावजूद अपने घरों तक नहीं पहुंचे हैं। ऐसे लोग रास्ते में रोककर क्वारेंटीन कर दिये गये। उनके परिवार राष्ट्रीय एकता और अंधेरे समय से निकलने के लिए 5 तारीख की रात को 9 बजे 9 मिनट तक मोबाइल, टॉर्च, दिया, मोमबत्ती से रौशनी कर सच्चे भारतीय होने का परिचय दे पाएगा?

जो लोग अपनी जरूरतों के लिए, रोजी-रोटी के जुगाड़ के लिए सड़क पर दिख रहे हैं, उन्हें देश और समाज का शत्रु मानकर जेल भेज दिया जाएगा। उन्हें लाठी डंडों से पीटा जा रहा है। ऐसा मानना है कि दरअसल ये लोग चलते—फिरते संक्रमण के वायरस हैं जिससे घरों में बंद लोगों को भी कोरोना संक्रमित किया जा सकता है। देश की 130 करोड़ आबादी में से 30 करोड़ के पास ठीक से रौशनी का इंतजाम नहीं हैं तो इसमें किसी भी सरकार की कोई गलती नहीं है। हमारे देश में यह सदियों से बताया जाता रहा है कि सब अपना-अपना भाग्य लेकर पैदा होते हैं.

होइहय वही जो राम रचि राखा,
को करही जतन बढ़ाबई साखा।।

मोदी मंत्र से अभिभूत बहुत सारे लोगों का मानना है कि जब एक साथ 130 करोड़ देशवासी, एक साथ मोमबत्ती, दीया, टॉर्च, मोबाइल की लाईट जलाएंगे तो इससे जो दिव्य प्रकाश पुंज निकलेगा, उससे समूचे वायुमंडल में उपस्थित कोरोना के विषाणु नष्ट हो जाएंगे। यह प्रयोग देशवासियों ने उसी तरह नई ऊर्जा और राष्ट्र भक्ति का संचार करेगा जैसा कि पहले थाली, लोटा और ताली बजाने से हुआ था। मोदीजी में अद्भुत और गजब की नेतृत्व क्षमता है। यह उनका ही करिश्माई जादू है कि अस्पतालों में कोरोना से इलाज की माकूल व्यवस्था नहीं होने, क्वारटाईन किये गये लोगों के खाने-पीने का सही इंतजाम नहीं होने, घर में या बाहर फंसे लोगों के लिए रोटी-रोटी का जुगाड़ नहीं होने पर भी लोग उफ नहीं करके, देशभक्ति दिखाने पर तत्पर हैं।

बहुत से लोग भूखों मर जाएंगे पर बुनियादी सवाल नहीं उठायेंगे। और यदि उठायेंगे भी तो उनकी आवाज नक्कारखाने की तूती की तरह सुनाई नहीं देगी। जबकि देश की जनता से जुड़े बुनियादी सवालों की बात आएगी तो गोदी मीडिया के जरिये देश के सामने ऐसे मसले, मुद्दे ला दिये जाएंगे जिसमें रोटी-रोटी, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य का मुद्दा गौंण हो जाएगा। मां भारती की सेवा में लगे लोगों के लिए यह भावुकता, श्रद्धा और पूजा का दौर है इसलिए सबसे आग्रह है कि राष्ट्रहित में एक साथ खड़े होने और कोरोना के विरूद्ध जारी विश्वव्यापी लड़ाई में विश्व गुरू कहलाने वाले भारत के जननायक मोदीजी की बातों का समर्थन कर उन्हें विश्वनेता बनाने में सहयोग करें।

आप यह काम तारीक बदायुंनी की कहीं गजल को गुनगुनाते हुए भी कह सकते हैं :
एक ना एक शम्मा अंधेरे में जलाये रखिये
सुबह होने को है माहौल बनाये रखिये
जिन हाथों में हमें जख्म-ए निहां पहुंचे हैं
वो भी कहत हैं जख्मों को छुपाये रखिये।
(जख्म-ए-निहॉ : अंदरूनी घाव)

( लेखक दैनिक आज की जनधारा तथा वेब मीडिया हाउस के प्रधान संपादक हैं )