हिंदी दिवसः हिन्दी में विज्ञान लेखन की समस्याएँ और संभावनाएँ

हिंदी दिवसः  हिन्दी में विज्ञान लेखन की समस्याएँ और संभावनाएँ

बलदाऊ राम साहू

हिन्दी भारत की राजभाषा है, किंतु यह हमारा दुर्भाग्य है कि आज अधिकतर लेखक अपनी बात हिन्दी भाषा में लिखने में संकोच करते हैं और अंग्रेजी में लिखकर अपने आपको गौरवान्वित महसूस करते हैं। विज्ञान लेखन के क्षेत्र में तो यह प्रवृति और अधिक  पायी जाती है। अधिकतर वैज्ञानिक अपना काम अंग्रेजी में संपादित करते हैं, शोध आलेख अंग्रेजी में लिखते हैं और पढ़ते हैं। शायद उन्हें हिन्दी में सोचने का समय ही नहीं मिलता होगा! अंग्रेजी उनके दिलोदिमाग में घर कर गयी है। वे अंग्रेजी के मोहजाल से बाहर निकल नहीं पा रहे हैं। यही कारण है कि हिन्दी में लेखन की संभावनाएँ समाप्त होती जा रही हैं, जो कि हर भारतीय के लिए चिंता का विषय है। जिस देश की 55 प्रतिशत आबादी हिन्दी पढ़ना-लिखना जानती हो और उस देश में हिन्दी भाषा में किसी विषय पर उच्च स्तरीय लेखन का न होना वास्तव में चिंतन का विषय होना चाहिए। यदि आज हम किसी भी विकसित देश की प्रगति को देखे तो स्पष्ट होता है कि उस देश को इस ऊँचाई तक पहुंचाने में उस की राष्ट्रभाषा का बड़ा योगदान है।  भारत जैसे विशाल देश में आज पर्यंत अपनी राष्ट्रभाषा नहीं है।

मुझे यह कहने में बिल्कुल ही संकोच नहीं हैं कि अधिकतर पढ़े-लिखे लोग अंग्रेजी में पढ़ने, लिखने व कार्य करने में गर्व और अपने को सम्मानित महसूस करते हैं। ऐसे व्यक्तियों के क्या कहा जाय समझ से परे है। हाँ! किंतु हमें यह भी समझना होगा कि कहीं हम हिन्दी भाषा की उपेक्षा तो नहीं कर रहे हैं ? यह भी सत्य है कि यदि यही चलता रहा तो हिन्दी लेखन की संभावनाएँ समाप्त हो जाएगी और हम हाथ मलते रह जाएँंगे। विज्ञान लेखन तो दूर हम हिन्दी में इतिहास और भूगोल भी नहीं लिख पाएँगे और आने वाले पीढ़ी भाषायी विकलांगता महसूस करेगी।

प्रायः देखा जा रहा है कि आने वाली पीढ़ियों में हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं में विज्ञान पढ़ने वालों की संख्या कम होती जा रही है। इसे हम बदलते वक्त का तकाजा कहें या पश्चिम का अंधानुकरण। दरअसल वह समय आ गया है जब आने वाली पीढ़ी को अपनी मातृभाषा में काम करने की शुरूआत करनी होगी। इससे न केवल हमारी अपनी भाषा समृद्ध होगी, बल्कि हममें आत्मगौरव का विकास भी होगा।

अक्सर सवाल उठाया जाता है कि यदि हम विज्ञान को अंग्रेजी के अतिरिक्त हिन्दी व अन्य क्षेत्रीय भाषा में पढ़ें व लिखें तो उसकी वैज्ञानिक शब्दावलियाँ नहीं मिल पाती। यह शायद हमारे मन का भ्रम है। जब लेखन ही नहीं होगा तो शब्द आएँगे कहाँ से? शब्दों का अविष्कार आवश्यकता पर निर्भर होता है। जब आवश्यकता महसूस होगी, तब उन तकनीकी शब्दों के लिए नवीन शब्द भी गढ़े जाएँगे। वे शब्द प्रचलन में आएँगे और भाषा को समृद्ध करेंगे। सतत् लेखन से ही भाषा समृद्ध होगी और लेखन की संभावनाएँ विकसित होंगी। कुछ लेखकों का यह भी मानना है कि हिन्दी में तकनीकी शब्दावलियाँ क्लिष्ट होती हैं, यह भी विचारणीय प्रश्न हो सकता है। यदि ऐसा है भी तो हिन्दी में विज्ञान की उपलब्धता के समक्ष चुनौतियों को समझना होगा। विज्ञान को सरल,बोधगम्य और प्रभावी बनाने के लिए उपाय खोजने होंगे। हिन्दी और विज्ञान के अंर्तसंबंध की व्यापकता को भाषायी इतिहास के परिप्रेक्ष्य में जानना होगा। भाषा और भाषा की जटिलता में न अटकते हुए सर्वग्राह्य शब्दावलियों का समावेश करना होगा।

जब हिन्दी भाषा में विज्ञान संबंधित साहित्य की बात की जाती है तो यह कहा जाता है कि आधारभूत सामग्री नहीं है। इसका सीधा अभिप्राय होता है कि हिन्दी में ज्ञान-विज्ञान को कहने की क्षमता नहीं है? ये विचार कुछ पढ़े-लिखे तथाकथित लोगों के होते हैं। यह भ्रम फैलाया जाता है कि यदि आपको विज्ञान को समझना है तो अंग्रजी की शरण लेनी होगी। शायद इन्हें भाषा की समझ नहीं है या फिर अपनी भाषा, संस्कृति और ज्ञान पर भरोसा नहीं है। यहाँ यह कहना लाजिमी होगा कि विश्व में ऐसी कोई भाषा नहीं है जिसमें किसी भी ज्ञान को कहने की क्षमता न हो। छोटी-सी छोटी भाषा वे सभी भाषयी तत्व हैं जो विश्व की उन्नत भाषा में है। बात है परंपरा विकसित करने व प्रयोग में लाने की। जब भाषा प्रयोग में आती है तब स्वतः ही शब्द भंडार में वृद्धि हो जाती है। हिन्दी भाषा में भी विज्ञान लेखन के लिए अपेक्षित प्रयास नहीं किए गए हैं। उनमें निहित प्रमाणिक शब्दावलियों को नहीं खोजा उगाया है। परिणाम स्वरूप हमने प्रमाणिक शब्दावलियों को खोया है। हिन्दी में तकनीकी शब्दवलियों का अभाव नहीं है, बल्कि अपेक्षित प्रयोग न करने के कारण का विलोपन हुआ है।

हिन्दी भाषा में विज्ञान लेखन के संबंध में यह समझना होगा कि भाषा बड़ी उदार होती है, वह किसी भी भाषा के शब्दावली को अपने भीतर समाने की क्षमता रखती है। यदि ऐसा लगता है कि किसी तकनीकी शब्द के लिए हिन्दी में उपयुक्त, सहज और ग्राह्य शब्द नहीं मिल रहे हैं तो जिस भी भाषा में उपयुक्त शब्द हों उसे ज्यों का त्यों लेने में भी संकोच नहीं करना चाहिए और लेखन कार्य को आगे बढ़ाना चाहिए। आज बहुत से पूर्वाग्राही लोग हैं जो भाषा की शुद्धता, अपने ही भाषा के अनुपयुक्त तत्सम शव्दों के प्रयोग के लिए बड़े ही आग्रही होते हैं जो कि किसी भी भाषा के विकास में रोड़ा पैदा करता है। आवश्यकता है ऐसे लेखकों, चिंतकों, अनुसंधानकर्ताओं और पाठकों की जो उदार मन से पढ़ें और लिखें।

हिन्दी में विज्ञान लेखन हेतु वर्तमान में हिन्दी भाषी विज्ञान लेखकों को वैज्ञानिक शब्दावली विकसित करने तथा हिन्दी भाषा के क्लिष्ट वैज्ञानिक शव्दावलियों को रूपांतरित कर सहज बनना होगा। उदाहरण के लिए भौतिकी में अंग्रेजी शब्द तमसनबजंदबम का हिन्दी पर्याय प्रतिष्टम्भ होता है, जो दुरूह कहा जा सकता है। यदि यह सही में दुरूह है, तो इसे सहज करने के लिए विकल्प भी तलाशना होगा और हिन्ही भाषा के वैज्ञानिक शब्दावली से प्रतिस्थापित करना होगा। इस विषय पर यह  भी समझने की आवश्यकता है कि जब तक शब्द प्रचलन में नहीं होगें, तो क्लिष्टता का भान होगा ही, शब्द महज ध्वनियाँ नहीं होती शब्द संस्कृति का हिस्सा होता है। वह मानस पटल पर रचा-बसा होता है। शब्द प्रयोग में आते हैं तबे उनका नवीन संसार बनता है। शब्दों का एक बड़ा संसार होता है। विज्ञान लेखन के संदर्भ में हमें उसकी उत्पत्ति और प्रभुत्व को समझना होगा। हिन्दी भाषा में विज्ञान लेखन की संभावना को तलाशने के लिए भाषायी गौरव को जगाने की भी आवश्यकता है। यह भी नहीं कि सभी तकनीकी शब्द दुरूह हैं। हिन्दी में बहुत ही सहज और प्रचलित तकनीकी शब्द भी हैं जो हमारे कंठ में रचा-बसा है। जैसे- मदमतहल उर्जा, ेंजमससपजम उपग्रह, तंकपंजपवद विकिरण आदि। ये सहज इसलिए लगते हैं क्यों कि ये निरंतर प्रयोग में हैं।

हिन्दी भाषा में लेखन को प्रोन्नत करने के लिए संस्थागत प्रयासों की भी आवश्यकता है। इसके लिए शासकीय, अशासकीय व निजि प्रयास से योजनाबद्ध ढ़ग से विज्ञान पत्रिकाओं का प्रकाशन, तकनीकी शब्दवलियों का संग्रहण, तकनीकी शब्दकोश का निर्माण, क्षेत्रीय भाषाओं के तकनीकी शब्दों का संकलन और अन्य भाषा की समग्री का हिन्नन  दी भाषा में अनुवाद करके भी हम विज्ञान लेखन को प्रोन्नत कर सकते हैं।

ऐसे भारत सरकार ने इन समस्या के समाधान के लिए 1961 में वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग की गठन की है। आयोग में भाषाविज्ञान के ठोस सिद्धांतों के आधार पर तकनीकी शब्दावली के मानकीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई। आयोग के विद्वानों एवं भाषाविदों के परामर्श से हिन्दी में तकनीकी शब्दावलियों के निर्माण के चार आधार भूत सिद्धांत बनाए -

1. अंतर्राष्ट्रीय शब्दों को यथासंभव उनके प्रचलित रूपों में ही अपनाया जाए और देवनागरी में लिखा जाए।

2. अपनी भाषा में प्रचलित शब्दों को पर्याय के रूप में स्वीकार कर लिया जाए जो अंग्रेजी के तकनीकी शब्दों के लिए पहले से प्रचलित है।

3. आवश्यकता पड़ने पर प्रादेशिक भाषाओं से तकनीकी शब्द ग्रहण कर लिए जाए।

4. आवश्यकता पड़ने पर क्षेत्रीय भाषा के तकनीकी शब्दों को ग्रहण कर लिया जाए। नए शब्द संस्कृत धातुओं के आधार पर निर्मित किए जाए।

यदि ऐसा किया जाए तो निश्चय ही हिन्दी के माध्यम से वैज्ञानिक चेतना भारत के जागरण तक पहुँच सकती है। इसके निराकरण के लिए शिक्षा के माध्यम के रूप में हिन्दी और भारतीय भाषा को अपनाया जाए। पाठ्यपुस्तकों के माध्यम से वैज्ञानिक तकनीकी शब्दावली बच्चों के तक पहुँचेगी और वे प्रयोग में लाएँगे। क्यों कि मातृभाषा प्रत्येक को प्रिय होती है और मातृभाषा के माध्यम से ज्ञान को सहज रूप से समझता है।

 


बलदाऊ राम साहू

न्यू आदर्श नगर,  होटल सांई राम के पास (पोटिया चौक) दुर्ग, छत्तीसगढ़

मोबाइल-9407650458